हलवा कद्दू का उत्पादन

आम जानकारी

यह भारत की प्रसिद्ध सब्जी है जो कि बारिश के मौसम में उगाई जाती है। इसे हलवा कद्दू और कद्दू के नाम से भी जाना जाता है और यह कुकुरबिटेशिअस परिवार से संबंधित है। भारत पेठा के उत्पादन का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। इसे खाना बनाने और मीठा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है यह विटामिन ए और पोटाशियम का अच्छा स्त्रोत है। पेठा आंखों की नज़र तेज करने और रक्तचाप को कम करने में सहायक है और इसकी एंटीऑक्सीडेट विशेषताएं भी हैं। इसके पत्तों, तने, फल का रस और फूलों की औषधीय विशेषताएं भी हैं।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    25-28°C

मिट्टी

कद्दू की फसल को अच्छे निकास वाली दोमट मिट्टी जो जैविक तत्वों से भरपूर होती है, की आवश्यकता होती है। कद्दू की खेती के लिए मिट्टी की पी एच 6-7 उपयुक्त होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Pusa vishwas: यह किस्म IARI द्वारा जारी की गई है। यह उप नमी वाले मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके फल गोलाकार होते हैं जो कि मध्यम आकार के होते हैं, प्रत्येक फल का औसतन भार 5 किलो होता है। यह किस्म 120 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa Alankar: यह किस्म IARI द्वारा जारी की गई है। यह अगेती हाइब्रिड किस्म है जो कि 40-50 दिनों में पक जाती है। इसकी औसतन पैदावार 95-100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Arka Chandan: यह किस्म IIHR, बैंगलोर द्वारा जारी की गई है। इसके फल गोल आकार में होते हैं जिसका संतरी रंग का गुद्दा होता है। प्रत्येक फल का औसतन भार 2-3 किलो होता है। यह किस्म 115-120 दिनों में पक जाती है। इसकी औसतन पैदावार 135 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
PPH-1: यह किस्म 2016 में जारी की गई है। यह ज्यादा जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी बेलें छोटे कद की, छोटे पोर वाली और गहरे हरे रंग के पत्ते होते हैं। इसके फल छोटे और गोल आकार में होते हैं। इसके फल जब अपरिपक्व होते हैं तब धब्बेदार हरे रंग के होते हैं और पकने की अवस्था में ये धब्बेदार भूरे रंग के हो जाते हैं। फल का गुद्दा सुनहरे पीले रंग का होता है। इसकी औसतन पैदावार 206 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
PPH-2: यह किस्म 2016 में जारी की गई है। यह ज्यादा जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी बेलें छोटे कद की, छोटे पोर वाली और गहरे हरे रंग के पत्ते होते हैं। इसके फल छोटे और गोल आकार में होते हैं। अपरिपक्व अवस्था में इसके फल हल्के हरे रंग के और पकने की अवस्था में नर्म भूरे रंग का होता है। फल का गुद्दा सुनहरे पीले रंग का होता है। इसकी औसतन पैदावार 222 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
Punjab Samrat (Released in 2008): इसकी बेलें मध्यम लंबी होती हैं। तना कोणयुक्त और गहरे हरे रंग के पत्ते होते हैं। इसके फल छोटे होते हैं जो कि गोल आकार में होते हैं। अपरिपक्व अवस्था में इसके फल हरे रंग के और पकने की अवस्था में हल्के भूरे रंग का होता है। फल का गुद्दा सुनहरे पीले रंग का होता है। इसकी औसतन पैदावार 165 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CO 2: यह किस्म 1974 में जारी की गई है। प्रत्येक फल का औसतन भार 1.5-2 किलो होता है। फल का गुद्दा संतरी रंग का होता है। इसकी औसतन पैदावार 100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 135 दिनों में पक जाती है।
 
CO1, Arka Suryamukhi, Pusa Viswesh, TCR 011, Ambilli and Arka Chandan पेठे की महत्तवपूर्ण किस्में हैं।
 

ज़मीन की तैयारी

कद्दू की खेती के लिए अच्छी तरह से तैयार ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की जोताई सामान्य ट्रैक्टर से की जाती है।

बिजाई

बिजाई का समय
बीजों को बोने के लिए दिसंबर-जनवरी और जून-जुलाई का समय उपयुक्त होता है।
 
फासला
प्रत्येक जगह में दो बीज बोयें और क्यारियों में 60 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें। हाइब्रिड किस्मों के लिए बीजों को बैड के दोनों ओर बोयें और 45 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
मिट्टी में बीजों को 1 इंच की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
सीधे खेत में बिजाई करें।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत के लिए 400-500 ग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त होती है।
 
बीज का उपचार
मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बैनलेट या बाविस्टिन 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
74-90 90

25

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASSIUM
33-40 14 15

 

खेत की तैयारी के समय गाय का गोबर 80-90 क्विंटल प्रति एकड़ में डालें। कद्दू की पूरी फसल को नाइट्रोजन 33-40 किलो (यूरिया 74-90 किलो), फासफोरस 14 किलो ( एस एस पी 90 किलो) और पोटाशियम 15 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 25 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा और फासफोरस और पोटाशियम की पूरी मात्रा को बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन को वृद्धि के शुरूआती समय में डालें।

 

 

सिंचाई

सही समय के अंतराल पर उचित सिंचाई आवश्यक होती है। बीज बोने के तुरंत बाद सिंचाई की आवश्यकता होती है। मौसम के आधार पर 6-7 दिनों के अंतराल पर लगातार सिंचाई की आवश्यकता होती है। कुल 8-10 सिंचाई की आवश्यकता होती है।

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों को रोकने के लिए लगातार गोडाई और मिट्टी चढ़ाने की प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। गोडाई कसी द्वारा या हाथों द्वारा की जाती है। पहली गोडाई बिजाई के 2-3 सप्ताह बाद की जाती है। खेत को नदीन मुक्त बनाने के लिए कुल 3-4 गोडाइयों की आवश्यकता होती है।

पौधे की देखभाल

चेपा और थ्रिप्स

  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा और थ्रिप्स : ये कीट पत्तों का रस चूसते हैं जिससे पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं। थ्रिप्स के कारण पत्ते मुड़ जाते हैं और कप के आकार की तरह हो जाते हैं या ऊपर से मुड़ जाते हैं। यदि इसका हमला खेत में दिखे तो थाइमैथोक्सम 5 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 

 

कद्दू की मक्खी
कद्दू की मक्खी : इस कीट के कारण फल पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और सफेद रंग के छोटे कीट फल पर विकसित होते हैं।
कद्दू की मक्खी से फसल के बचाव के लिए नीम तेल 3.0 % की फोलियर स्प्रे करें।
 
सफेद फंगस
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों के ऊपरी धब्बे : पत्तों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। प्रभावित पौधे पर ये धब्बे तने पर भी देखे जा सकते हैं। इसके कीट पौधे को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके ज्यादा हमले से पत्ते गिरने लगते हैं और फल समय से पहले ही पक जाते हैं।
यदि इसका हमला दिखे तो पानी में घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10 लीटर में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।
 
पत्तों के निचली सतह पर धब्बे
पत्तों के निचले धब्बे : यह रोग स्यूडोपरनोस्पोरा क्यूबेनसिस के कारण होता है। इससे पत्तों की निचली सतह पर धब्बेदार और जामुनी रंग के धब्बे देखे जा सकते हैं।
यदि इसका हमला दिखे तो डाइथेन एम 45 या डाइथेन Z-78@400ग्राम प्रति 150 लीटर का प्रयोग इस बीमारी से बचाव के लिए किया जाता है।
 
ਐਂਥਰਾਕਨੌਸ
एंथ्राक्नोस : एंथ्राक्नोस से प्रभावित पत्ते झुलसे हुए दिखने लग जाते हैं।
इससे बचाव के लिए कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यदि इसका हमला खेत में दिखे तो मैनकाजेब 2 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 3 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
सूखा
सूखा : इस बीमारी के कारण जड़ गलन होता है।
यदि इसका हमला दिखे तो डाइक्लोरोफेन 400 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें।
 

फसल की कटाई

मुख्य रूप से फल के छिल्के का हल्का भूरा रंग के होने पर और अंदरूनी गुद्दा सुनहरे पीले रंग के होने पर तुड़ाई की जाती है। लंबी दूरी वाले स्थानों पर ले जाने के लिए पके फलों का अच्छा भंडारण किया जाता है। बिक्री उद्देश्य से अपरिपक्व फलों की कटाई की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 100-165 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

बीज उत्पादन

कद्दू की अन्य किस्मों से फाउंडेशन बीज के लिए 1000 मीटर का और प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए 500 मीटर का फासला रखें। खेत में से बीमार पौधों को निकाल दें। जब फल पक जाते तो  रंग बदल कर गहरा हो जाता है। उसके बाद उन्हें ताजे पानी में हाथों से तोड़ा जाता है और गुद्दे में से बीजों को अलग कर लिया जाता है। जो बीज नीचे सतह पर बैठ जाते हैं उन बीजों को बीज उद्देश्य के लिए इक्ट्ठा कर लिया जाता है।