सौंफ की खेती

आम जानकारी

मुख्य तौर पर राजस्थान और गुजरात राज्यों में सौंफ की खेती एक वर्ष के लिए उत्तरी भारत की रबी फसल के रूप में की जाती है। सौंफ 'एपियेसी' परिवार से संबंधित है। इस वार्षिक फसल का मूल स्थान यूरोप है। इसके बीज सुखाकर मसाले के तौर पर प्रयोग किए जाते हैं। सौंफ फाइबर, विटामिन सी और पोटाशियम का मुख्य स्त्रोत है। यह मांस व्यंजन , सूप आदि को स्वादिष्ट बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।  इसकी पत्तियां सलाद  पर गार्निश के लिए भी प्रयोग किया जाता है। सौंफ की औषधिय विशेषताएं भी हैं। इसे पाचन, कब्ज के उपचार, डायरिया, गले का दर्द और सिरदर्द के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। इसकी खेती रबी फसल के तौर पर की जाती है। भारत में राज्यस्थान, आंध्र प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हरियाणा मुख्य सौंफ उत्पादक राज्य है।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75mm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75mm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
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    Temperature

    20-30°C
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    25-30°C
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    20-25°C
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    20-30°C
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    Rainfall

    50-75mm
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    25-30°C
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    Harvesting Temperature

    20-25°C

मिट्टी

वह मिट्टी जिसमें कार्बनिक पदार्थ उच्च मात्रा में हों, सौंफ की खेती के लिए उपयुक्त है। यह सूखी रेतली मिट्टी और बालुई मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। हल्की मिट्टी में सौंफ की खेती करने से परहेज़ करें। मिट्टी की पी एच 6.5 से 8 तक होनी चाहिए।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Ajmer Fennel 2 (AF 2) :  यह किस्म अजमेर द्वारा जारी की गई है। यह किस्म अगेते मौसम और रबी फसल के रूप में बिजाई के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद लम्बा होता है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 1.9 प्रतिशत होती है। रबी फसल के लिए इसकी औसतन पैदावार 7.5 किलोग्राम प्रति एकड़ होती है। यह किस्म रामुलारिया झुलस रोग को सहनेयोग्य है।
 
RF 101:  यह किस्म 155-160 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RF 125: यह किस्म अक्तूबर से नवंबर के महीने में बोयी जाती है और इसकी कटाई मार्च के महीने में की जाती है। यह किस्म 110-130 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6.6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RF 143: यह किस्म राजस्थान एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी, जोबनेर द्वारा जारी की गई है। पौधा का कद मध्यम लंबा और इसे काली और दोमट मिट्टी में उगाने की सिफारिश की जाती है। यह 500 किलो बीज प्रति एकड़ देती है। बीजों में तेल की मात्रा 1.87 प्रतिशत होती है।
 
RF 145: यह किस्म अक्तूबर से नवंबर महीने में बोयी जाती है और इसकी कटाई मार्च के महीने में की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
RF 178: यह किस्म अक्तूबर से नवंबर महीने में बोयी जाती है और इसकी कटाई मार्च के महीने में की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 5.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RF 205: यह किस्म अक्तूबर से नवंबर महीने में बोयी जाती है और इसकी कटाई मार्च के महीने में की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 5.75 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RF 281: यह किस्म 2012 में एस के एन कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर, जोबनर द्वारा जारी की गई है। यह बीजों की औसतन पैदावार 7.5-8 क्विंटल प्रति एकड़ देती है।
 
PG 35: यह किस्म गुजरात एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी द्वारा जारी की गई है। इसके मध्यम आकार के बालों रहित बीज होते हैं जो कि हरे रंग के होते हैं। पौधे का कद लंबा होता है। यह किस्म पत्तों पर धब्बा रोग, पत्ता झुलस रोग और शूगर बीमारी के कुछ हद तक प्रतिरोधक है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 1.9 प्रतिशत होती है। यह किस्म 215-225 दिनों में परिपक्व हो जाती है और इसकी औसतन पैदावार 5.35 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GF 1 (Gujarat Fennel 1): यह किस्म 255 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म सूखे की हालातों को सहन कर सकती है। इसकी औसतन पैदावार 6.6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GF 2: इसकी औसतन पैदावार 5.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CO 1:  यह किस्म मध्य लंबी और 220 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी खेती खारी और पानी रोकने वाली ज़मीनों में भी की जा सकती है। इसकी औसतन पैदावर 3 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 
 
Hisar Swarup: यह किस्म हरियाणा एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी, हिसार द्वारा जारी की गई है। यह देरी से पकने वाली किस्म है, जो कि 175-185 दिनों में पक जाती है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 1.6 प्रतिशत होती है। इसके बीजों की औसतन पैदावार 6.60 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Azad saunf 1: यह किस्म जड़ गलन और झुलस रोग के प्रतिरोधी है।
 
Pant Madhurika
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
RF 35: यह किस्म लंबी और 225 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पत्तों के धब्बा रोग और शूगरी रोग की प्रतिरोधक है। इसकी औसतन पैदावार 5.2 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RF 201: इसकी औसतन पैदावार 5.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
 
 

ज़मीन की तैयारी

एक अच्छा सीड बैड तैयार करें। दरमियानी मिट्टी में दो से तीन बार जोताई करें।  तीन से चार बार जोताई भारी मिट्टी के लिए करें। प्रत्येक जोताई के बाद सुहागा फेरें।

बिजाई

बिजाई का समय
लंबे समय की फसल के लिए अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े में बिजाई पूरी कर लें। रोपण विधि से  जून-जुलाई के महीने में बिजाई की जाती है और अगस्त-सितंबर के महीने में कटाई की जाती है। अच्छी उपज के लिए देरी से बिजाई करने पर परहेज़ करें।
 
फासला
बारानी हालातों में दो पंक्तियों में फासला 45 सैं.मी. और दो फसलों में 10 सैं.मी. का फासला होना चाहिए।
 
बीज की गहराई
3-4 सैं.मी. की गहराई में बीज बोने चाहिए।
 
बिजाई का ढंग
सौंफ की बिजाई सीधे तौर पर की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसकी पहले पनीरी लगाई जाती है और बाद में मुख्य खेत में रोपण कर दिया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 3-4 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
बाविस्टिन दवाई 2 ग्राम प्रति किलो बीजों के लिए प्रयोग करें और फिर बिजाई करें।
 

खाद

Apply well decomposed cowdung@4-6 qtl/acre in soil at time of land preparation. Apply Nitrogen@35kg/acre in form of Urea@15 kg/acre in two to three equal splits. First nitrogen application is as basal dose, apply remaining dose of Nitrogen 30 and 60 days after sowing. Use of phosphorus fertilizer is based upon soil test results; apply it if its deficiency is observed.

सिंचाई

अच्छे अंकुरन के लिए बिजाई से पहले सिंचाई करें। पहली सिंचाई बिजाई के 7-8 दिनों के बाद करें। मिट्टी की किस्म और जलवायु के अनुसार  20-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। फूल लगने और बीज बनने के समय फसल को पानी की कमी ना होने दें।

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की तीव्रता के अनुसार खेत की एक या दो बार गोडाई करें। नदीनों की रोकथाम के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति एकड़ में डालें। पहली गोडाई बिजाई के 30 दिनों के बाद करें, दूसरी और तीसरी गोडाई आवश्यकता पड़ने पर करें।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
 चेपा : यदि इसका हमला दिखे तो डाइमैथोएट 30 ई सी 2 मि.ली या मिथाइल डैमेटोन 25 ई सी 2 मि.ली को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 
पत्तों के धब्बा रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर सफेद धब्बे : यदि इसका हमला दिखे तो सलफर 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

किस्म के अनुसार फसल 180 दिनों में (अप्रैल के अंत और मई के अंत में)कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब गुच्छों का रंग हरे से हल्का पीला हो जाता है, तब इसकी कटाई करें। इसकी कटाई गुच्छे तोड़कर की जाती है। उसके बाद इन्हें 1-2 दिन के लिए धूप में सुखाया जाता है और 8-10 दिनों के लिए छांव में रख दिया जाता है।