ਜੈਤੂਨ की काश्त

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

इसकी दो किस्में हैं :

तेल वाली किस्में : Ascolanaterena, Aglandeau, Carolea, Canino, Frontoio, Pendolino.
 
आचार वाली किस्में : Ascolano, Coratina, Cornicobra, Grosseune, Mission, Picholine.
 
इजरायल से आयात की गई किस्में : Barnea, Arbequina, Cortina, Picholine, Picual, Coraniki and Frontoio
 
Ascolanaterena : इस किस्म के वृक्ष सघन और काले रंग के फल होते हैं। यह किस्म ठंड के प्रतिरोधी है।
 
Frontoio : इसके फल मध्यम और जामुनी काले रंग के होते हैं।
Canino : इसके वृक्ष फैलने वाले और फल छोटे आकार के होते हैं।
 
Carolea : इसके वृक्ष छोटे और सघन होते हैं। फल बड़े, अंडाकार और गहरे काले रंग के होते हैं। 
 
Coratina : यह किस्म नमकीन बनाने के लिए उपयुक्त है। इसके फल बड़े और अंडाकार होते हैं। यह किस्म ठंड और सूखे के प्रतिरोधी है।
 
Ascolano : यह किस्म नमकीन बनाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म ठंड के प्रतिरोधी है। इसके फल बड़े, गोल और काले रंग के पके हुए होते हैं। 
 

ज़मीन की तैयारी

खेत की अच्छे से जोताई करें। ज़मीन को डलियों और नदीन मुक्त रखें। जैतून जल जमाव वाले हालातों को सहन नहीं कर सकती इसलिए खेत की तैयारी के समय इसका ध्यान रखें।

बिजाई

बिजाई का समय
बारानी क्षेत्रों में जैतून की खेती के लिए जुलाई से अगस्त का समय उपयुक्त होता है। भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में रोपाई देर से करें। सिंचित क्षेत्रों में इसकी खेती के लिए जनवरी से फरवरी का समय उपयुक्त होता है।
 
फासला
रोपाई से दो महीने पहले हल्की मिट्टी में 90 सैं.मी x 90 सैं.मी. और भारी मिट्टी में 8 मीटर के फासले पर 60 सैं.मी. x 60 सैं.मी. के गड्ढे खोदें।
 
बिजाई का ढंग
नए पौधों को मुख्य खेत में रोपण किया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
जब पौधों में 8 मीटर का फासला रखा जाता है, तब एक एकड़ खेत में 60 वृक्ष लगाए जाते हैं। जब पौधों में फासला 6 मीटर x 5 मीटर रखा जाता है तो पौधों की गिनती 100 वृक्ष प्रति एकड़ रखी जाती है। जब फासला 8 मीटर x 5 मीटर हो तो पौधों की गिनती 132 वृक्ष प्रति एकड़ रखी जाती है।
बीज का उपचार
बिजाई से पहले बीजों की ऊपरी परत उतारने के लिए बीजों को कास्टिक सोडा जिसमें सोडियम हाइड्रोऑक्साइड 10 प्रतिशत होता है, में भिगो दें। रासायनिक उपचार के बाद बीजों को चलते पानी से धोयें।
 

प्रजनन

बीजों के द्वारा प्रजनन : सितंबर-अक्तूबर के महीने में पके फलों को इक्ट्ठा करें। बताए गए ढंग से बीजों का उपचार करें। फिर बीजों को नर्सरी में 15 सैं.मी. के फासले पर कतारों में और बीजों में 5 सैं.मी. के फासले पर बोयें।

कटिंग द्वारा प्रजनन : मूल वृक्ष से 10-15 सैं.मी. लंबी 3-4 शाखाएं इक्ट्ठा करें। रोपाई से पहले 8-10 सैकंड के लिए NAA@500ppm + IBA@3000ppm से कटिंग का उपचार करें। जड़ों के विकसित होने के 11-12 सप्ताह बाद उखाड़ लें फिर नर्सरी में सख्त होने पर बो दें। ग्राफ्टिंग मार्च-अप्रैल के महीने में की जाती है। ग्राफ्टिंग के लिए पैच बडिंग, टी बडिंग तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।
 

कटाई और छंटाई

शुरू के 2-3 वर्षों में कटाई-छंटाई की जरूरत नहीं होती। रोपाई के समय नए पौधों को 10 फीट तक का सहारा दें। नए पौधों की छंटाई के समय मौसम साफ होना चाहिए और बारिश वाला नहीं होना चाहिए। सूखे और पानी की कमी होने पर छंटाई ना करें। फल देने वाले वृक्षों की कटाई के बाद छंटाई करें।
 
जब वृक्ष पुराना हो जाये छंटाई की आवृति बढ़ा दें। छंटाई के बाद प्रभावित जख्मों पर बॉर्डीऑक्स का घोल डालें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

Age

FYM

(Kg)

CAN

(gm)

SSP

(gm)

MOP

(gm)

1st year 10 300 300 80
2nd year 15 600 600 160
3rd year 20 900 900 240
10th year 50 3000 3000 800

 

तत्व (ग्राम प्रति एकड़)

Age

FYM

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
1st year 10 75 50 50
2nd year 15 150 100 100
3rd year 20 225 150 150
10th year 50 750 500 500

 

एक वर्ष के पौधे के लिए गाय के गले हुए गोबर या रूड़ी की खाद 10 किलो, नाइट्रोजन 75 ग्राम (कैलशियम अमोनियम नाइट्रेट 300 ग्राम), फासफोरस 50 ग्राम (एस एस पी 300 ग्राम) और पोटाश 50 ग्राम (म्यूरेट ऑफ पोटाश 80 ग्राम) प्रति वृक्ष में डालें। प्रत्येक वर्ष तत्वों की दोहरी मात्रा दें और रूड़ी की खाद और गाय के गले हुए गोबर की मात्रा 5 किलो प्रत्येक वर्ष बढ़ा दें।
 
सिंचित क्षेत्रों के लिए रूड़ी की खाद की पूरी मात्रा, फासफोरस और पोटाश की खाद अक्तूबर महीने में डालें और बारानी क्षेत्रों के लिए रूड़ी की खाद, फासफोरस और पोटाश खादों को सर्दियों की बारिश आने पर दें।
 
नाइट्रोजन खाद की तीन खुराकें दें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा सर्दियों की बारिश आने पर या फलों वाले वृक्षों से पके फलों की कटाई के समय दें। नाइट्रोजन की दूसरी 1/4 मात्रा फूल निकलने के दो महीने पहले और नाइट्रोजन की आखिरी मात्रा मॉनसून आने पर (जून-जुलाई) में दें।
 

 

 

सिंचाई

इस फसल की वृद्धि के समय 100 सैं.मी. की वर्षा की आवश्यकता होती है। फूल निकलने, खिलने और फलों के निकलने की अवस्था सिंचाई के लिए महत्तवपूर्ण होती है। फूल निकलने के दो सप्ताह पहले सिंचाई करें ताकि फूल अच्छे से खिलें और कलियां कम से कम गिरें। फूल खिलने के समय भी सिंचाई करें और फल के आने पर भी सिंचाई आवश्यक है। गर्म और सूखे हालातों में भी सिंचाई आवश्यक है।

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की वृद्धि को रोकने और मिट्टी को हवादार बनाने के लिए गोडाई और निराई करें। नदीनों की रासायनिक रोकथाम के लिए उनकी तीव्रता के आधार पर ग्लाइसोफेट 800-1000 मि.ली. को  150 लीटर पानी में मिलाकर वृद्धि के दौरान दो तीन बार डालें। घास के नदीनों की रोकथाम के लिए सिमाज़िन + ड्यूरॉन 800 ग्राम प्रति एकड़ में डालें।

पौधे की देखभाल

जैतून की मक्खी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
जैतून की मक्खी : जैतून की फसल का गंभीर कीट है, जिसके कारण फसल को बहुत नुकसान होता है। लार्वा फलों को अपना भोजन बनाता है जिससे फल गिर जाते हैं और गुद्दा सड़ जाता है।
 
इसके हमले की जांच के लिए पीले स्टिकी जाल का प्रयोग करें।
 
जड़ गलन
  • बीमारियां और रोकथाम
जड़ गलन :  यह ज्यादातर मिट्टी से होने वाली फंगस के कारण होता है। प्रभावित वृक्ष कमज़ोर हो जाता है और पत्तों के ऊपर पतली छतर बन जाती है। छाल और बाहरी जड़ का रंग बदल जाता है। कई हालातों में वृक्ष मर भी जाता है।
 
बिजाई से पहले नीम केक 60 किलो प्रति एकड़ मिट्टी में मिलायें। जड़ गलन के हमले को कम करने के लिए टी विराइड 4 ग्राम से प्रति किलोग्राम बीजों का उपचार करें। यदि इसका हमला दिखे तो प्रभावित पौधे के आधार पर कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर डालें और साथ में आस-पास के सेहतमंद पौधों पर भी डालें।
 
पत्तों पर धब्बा रोग
पत्तों पर धब्बा रोग : यह पत्तों के अंदर सफेद रंग की फंगस पैदा करता है, जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और बाद में गिर जाते हैं।
 
यदि खेत में इसका हमला दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या मैनकोजेब 2.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रत्येक 15 दिनों के अंतराल पर 3 से 4 बार स्प्रे करें। 
 
कैंकर
कैंकर : टहनियों पर गोल आकार के जख्म बन जाते हैं और ये शाखाओं और तनों को नष्ट कर देते हैं। 
 
पौधे का कैंकर से बचाने के लिए 18 ग्राम COC के साथ स्ट्रैप्टोसाइक्लिन 6 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 30 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।  
 
सूखा

सूखा : यह जैतून की फसल की गंभीर फंगस वाली बीमारी है। विकास के मौसम में पत्तों का झड़ना इसके मुख्य लक्षण हैं। कई हालातों में वृक्ष पूरा सूख जाता है और सूखकर मर जाता है।

बिजाई से पहले बीजों को थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर उपचार करें। बुरी तरह से प्रभावित क्षेत्रों में अगेती बिजाई ना करें। प्रभावित क्षेत्र को कार्बेनडाज़िम 5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित क्षेत्र में डालें।

पत्तों पर आंख जैसे गोल धब्बे
पत्तों पर आंख जैसे गोल धब्बे : इसे पक्षी की आंख जैसे धब्बों के रूप में भी जाना जाता है। यह पत्तों पर हमला करता है। पत्तों पर हरे से काले रंग के गोल धब्बे पड़ जाते हैं। कई हालातों में ये धब्बे फलों और तनों पर भी देखे जा सकते हैं।
 
इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। बिजाई से पहले मिट्टी को अच्छी तरह धूप लगवायें।
 

फसल की कटाई

कटाई सही समय पर करनी जरूरी है। यदि समय से पहले कटाई की जाये तो फल में तेल की मात्रा कम और यदि देर से बिजाई की जाये तो ज्यादा पके फलों में तेल के साथ तेजाब की मात्रा भी हो जाती है। 
आचार बनाने के उद्देश्य के लिए फूल निकलने के 29-30 सप्ताह बाद कटाई करें। कटाई के समय फल की कठोरता, रंग कड़वापन और तीखापन इसकी कटाई की अवस्था दर्शाता है।
फल जामुनी काले रंग में बदल जाता है।
 

कटाई के बाद

राजस्थान ने जैतून के तेल का अपना ब्रान्ड  "Raj Olive Oil" लॉन्च किया है। यह भारत में पहला जैतून तेल का उत्पाद है।

मिट्टी

इसे मिट्टी की व्यापक किस्मों में उगाया जा सकता है। अच्छी उपज के लिए अच्छे निकास वाली, गहरी, उपजाऊ दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी अनुकूल होती है। मिट्टी का पी एच 6-7.5 होना चाहिए। जल जमाव वाली मिट्टी में इसकी खेती करने से परहेज़ करें।

आम जानकारी

जैतून सदाबहार है और इसकी दुनिया भर में खेती की जाती है। इसे मुख्य रूप से तेल उद्देश्य के लिए उगाया जाता है। इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने योग्य होता है, जिसके बहुत सारे स्वास्थ्य लाभ हैं। यह विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है। कोलेस्ट्रोल, रक्तचाप को नियंत्रित करता है, कैंसर आदि को रोकता है। बेशक इसे हज़ारों सालों से जाना जाता है लेकिन भारत में इसके व्यापारिक खेती सीमित स्तर पर ही है। इसके स्वास्थ्य लाभ और अंतराराष्ट्रीय बाज़ार में मांग को देखते हुए भारत ने बड़े पैमाने पर जैतून की खेती को प्रोत्साहन करने का फैसला किया है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में जैतून की खेती के नए प्रोजैक्ट शुरू किए गए हैं। राजस्थान सरकार ने जैतून की खेती के लिए विभिन्न सबसिडी  की घोषणा की है। राजस्थान में 800 हैक्टेयर के लगभग क्षेत्र में जैतून की खेती की जाती है।