ਸਨਾ ਫਸਲ ਬਾਗਬਾਨੀ

आम जानकारी

यह एक बहुवर्षी कांटेदार पौधा है, जिसकी लंबाई 40 सैं.मी.- 120 सैं.मी. होती है। यह एक फलीदार पौधा है, जो एक बार उगाने पर 5 वर्षों तक उपज देता है। राजस्थान में इसे सोनामुखी और संस्कृत में मारकंडी आदि के नाम से जाना जाता है। इसका वनस्पतिक नाम केसिया एंग्सटीफोलिया है और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में इसे भारतीय सेन्ना या टिनेवेली सेन्ना के नाम से जाना जाता है। सोनामुखी मूल रूप से अरब मूल का पौधा है और भारत में इसकी पहली बार खेती तामिलनाडू  में की गई थी। वर्तमान में इस पौधे को बड़े स्तर पर केरला और राजस्थान में उगाया जाता है। सनाय की पत्तियां औषधियां बनाने के लिए उपयोग में लायी जाती हैं। सनाय से बनी  दवाइयों का प्रयोग कब्ज, बवासीर और वजन कम करने के लिए किया जाता है।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    50°C (max)
    4°C (min)
  • Season

    Rainfall

    30cm
  • Season

    Temperature

    50°C (max)
    4°C (min)
  • Season

    Rainfall

    30cm

मिट्टी

इसे लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। नमक वाली मिट्टी में इसकी खेती ना करें। रेतली या दोमट मिट्टी में उगाने पर यह फसल अच्छे परिणाम देती है। इस फसल को मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में उगाया जाता है जहां कभी खेती ना की गई हो और जिस खेत में खादों का उपयोग नहीं किया जाता वह इस फसल की उपज के लिए अच्छा है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

ALFT-2: यह किस्म GAU, आनंद द्वारा जारी की गई है। यह देरी से फूल निकालने वाली किस्म है।
 
Anand Late Selection: यह किस्म GAU, आनंद द्वारा जारी की गई है। यह जल्दी फूल निकालने वाली किस्म है।
 
Sonal: यह किस्म CIMAP द्वारा जारी की गई है। यह उच्च उपज वाली किस्म है।
 

ज़मीन की तैयारी

बिजाई से पहले खेत की 2-3 बार जोताई करें। गहरी जोताई करने से बारिश का पानी खेत में स्टोर हो जाता है और पानी की जितनी मात्रा चाहिए वो भी मिल जाती है।

खाद

खादें (किलो प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
70 100 27

 

तत्व (किलो प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
32 16 16

 

खेत की तैयारी के समय रूड़ी की खाद की पूरी मात्रा 4 टन प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन 32 किलो (यूरिया 70 किलो), फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) और पोटाश 16 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 27 किलो) प्रति एकड़ में डालें। फासफोरस, पोटाशियम और नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई के समय शुरूआती खुराक के तौर पर डालें। बाकी बची नाइट्रोजन के दो हिस्से करें। पहला हिस्सा बिजाई के 90-95 दिनों के बाद और दूसरा हिस्सा बिजाई के 120-125 दिनों के बाद डालें।

 

 

 

 

बिजाई

बिजाई का समय
बिजाई के लिए मध्य जुलाई से मध्य सितंबर का महीना उपयुक्त होता है। आखिरी मॉनसून के तुरंत बाद जब खेत में नमी मौजूद हो, तो यह समय बीजों को बोने के लिए उपयुक्त होता है।
 
फासला
कतार से कतार में फासला 30 सैं.मी. से ज्यादा ना रखें
 
बीज की गहराई
बीजों को 1 फीट से ज्यादा गहरा नहीं बोना चाहिए।
 

बीज

बीज की मात्रा 
4-5 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 

खरपतवार नियंत्रण

फसल की वृद्धि के दौरान यदि खेत में नदीनों की वृद्धि ज्यादा हो तो हमें एक बार गोडाई जरूर करनी चाहिए। जब पौधा वृद्धि करने लगे तो खेत में पशुओं को छोड़ देना चाहिए जो घास को खा लेते हैं लेकिन पौधे को नुकसान नहीं पहुंचाते। फसल के वृद्धि करने के बाद नदीनों के नियंत्रण पर विशेष ध्यान की आवश्यकता नहीं होती।

सिंचाई

वे क्षेत्र, जहां पर सिंचाई की सुविधा हो, या वे क्षेत्र जहां खेतों में कई दिनों से पानी भरा हुआ हो वे इस फसल की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होते और ना ही लाभप्रद होते हैं। इसकी जड़ें ज़मीन में गहराई में उगती है और एक बार जड़ों के विकसित होने पर वे पानी को खुद ही ढूंढ लेती हैं। इसका प्रभाव ये पड़ता है कि फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। इसी तरह बिजाई के बाद इस फसल को ज्यादा ध्यान और देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती।

पौधे की देखभाल

सफेद चींटिया
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
सफेद चींटिया : यह कीट फसल की अलग अलग अवस्थाओं पर, पौधे की वृद्धि से लेकर पकने तक हमला करता है। इससे पौधे को ज्यादा नुकसान पहुंचता है जिससे जड़ें कमज़ोर हो जाती हैं और आसानी से उखाड़ी जा सकती हैं। जड़ें अचानक सूख जाती हैं और मर भी जाती हैं। यदि जड़ों को इस कीट से आधा नुकसान हुआ हो तो पौधा पीले रंग का नज़र आता है। 
इसकी रोकथाम के लिए 1 लीटर क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी को 20 किलो रेत में मिलाकर बुरकाव करें और फिर उसके बाद हल्की सिंचाई करें।
 
कुतरा सुंडी
कुतरा सुंडी : यह फसल की शुरूआती अवस्था पर हमला करती है। यह सुंडी पौधे की शुरूआती अवस्था में आधार को काट देती है। ये कीट रात में हमला करती है और दिन में दरारों में और पत्थरों के नीचे छिप जाते हैं। कुतरा सुंडी के अंडों की रोकथाम के लिए ट्राइकोग्रामा को लगातार सप्ताह में 3 बार छिड़कें। जब इसके लक्षण दिखें तो मैलाथियोन 5 प्रतिशत 10 किलो या क्विनलफॉस 1.5 प्रतिशत को 250 मि.ली. में मिलाकर प्रति  एकड़ में छिड़कें। कटाई के बाद नदीनों और बची हुई जड़ों को निकाल दें।
 
फलियां खाने वाली सुंडियां
फलियां खाने वाली सुंडियां : यदि इनका हमला दिखे तो बचाव के लिए कार्बरिल 4 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 70-80 दिनों के बाद स्प्रे करें।
 
उखेड़ा रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
उखेड़ा रोग : नमी वाली और हल्के निकास वाली मिट्टी के कारण उखेड़ा रोग होता है।  यह मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारी है। तना पानी को ज्यादा सोखता है और हल्की मिट्टी में तना सूखा हुआ नज़र आता है। पौधे अंकुरन से पहले ही मर जाते हैं। यदि इसका हमला नर्सरी में नए पौधों पर हो तो पौधों का बहुत नुकसान होता है।
सूखे की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 250 ग्राम मिट्टी के नज़दीक छिड़कें या कार्बेनडाज़िम 200 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। पौधों को सूखने से बचाने के लिए ट्राइकोडरमा बायो फंगस 2.5 ग्राम को 500 लीटर पानी में मिलाकर पौधों की जड़ों के नज़दीक छिड़काव करें।
 
पत्तों के धब्बे
पत्तों पर धब्बे और झुलस रोग : यदि इनका हमला दिखे तो  इनसे बचाव के लिए बैनलेट 0.1 प्रतिशत की स्प्रे बिजाई के 70-80 दिनों के बाद स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

बिजाई के 100-120 दिनों के बाद कटाई की जाती है। पौधे को ज़मीनी स्तर से ऊपर 3 सैं.मी. तक काटें। कटाई के लिए तीखे चाकू का प्रयोग करें। अधिक उपज के लिए बिजाई के 100-120 दिनों में पहली कटाई की जाती है और पहली कटाई के 60-75 दिनों के अंतराल पर की जाती है। वर्ष में इसकी 4 बार कटाई की जाती है। इसके सूखे पत्तों की पैदावार 165 किलो और फलियों की पैदावार 330-410 किलो प्रति एकड़ होती है।