राजस्थान में अलसी की खेती

आम जानकारी

अलसी (लाईनम यूसीटैटिसिमम) की फसल भारत में व्यापक स्तर पर बीजों की प्राप्ति के लिए की जाती है, जिनमें से तेल निकाला जाता है| इसके बीजों में तेल की मात्रा 33-47% होती हैं| अलसी में चिकनाई ज्यादा होने के कारण इससे रंग-रोगन, जल-रोधक फैब्रिक आदि तैयार किये जाते हैं| कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग खाने के लिए भी किया जाता है| अलसी से तैयार खल को खाद और पशुओं के चारे के लिए प्रयोग किया जाता है| इसका प्रयोग पेपर और प्लास्टिक बनाने के लिए भी किया जाता है|

जलवायु

  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    45-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-21°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-31°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    45-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-21°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-31°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    45-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-21°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-31°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    45-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-21°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-31°C

मिट्टी

यह घनी चिकनी काली मिट्टी और चिकनी दोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है| यह ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में बढ़िया पैदावार देती है| इसके लिए मिट्टी का pH 5.0-7.0 होना चाहिए|

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

T 397 (1984): इस किस्म के पौधे का कद 60-75 सैं.मी. होता है इसकी प्राकृतिक शाखाएं होती हैं।इसके हरे रंग के पत्ते और नीले रंग के फूल होते हैं। इसके गोल मध्यम आकार केफल होते हैं। इसके 1000 बीजों का भार 7.5-8 ग्राम होता है, जिनमें 44 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इसकी औसतन पैदावार 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Jawahar 23 (1985):  इस किस्म के पौधे का कद 45-60 सैं.मी. होता है इसके सफेद रंग के फूल होते हैं जो एक ही समय पर उगते हैं। इसके 1000 बीजों का भार 7-8 ग्राम होता है, जिनमें तेल की मात्रा 43 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किसम सूखा, कुंगी और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधक होती है।
 
LCK 8528: (Shikha) (1998): इसके बीजों की औसतन पैदावार 5-6 क्विंटल और रेशे की उपज 4-5 क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त होती है।
 
RLC 6: (Kiran) (1998): यह किस्म 115-120 दिनों में पक जाती है। सिंचित क्षेत्रों में इसकी औसतन पैदावार 3-4 क्विंटल और असिंचित क्षेत्रों में 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 42-43 प्रतिशत होती है। यह किस्म कुंगी और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधक होती है।
 
LMH: 62 (Padmini) (1999): इसकी औसतन पैदावार 3-4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। बीजों में 42-45 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। यह किस्म पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग के प्रतिरोधी और झुलस और लूसर्न के कुछ हद तक प्रतिरोधी होते हैं। यह किस्म 120-125 दिनों में पक जाती है।

RL 933: (Meera) (2000): इस किस्म के फूल नीले रंग के होते हैं जो कि कुंगी, सूखा और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधी है। इसकी औसतन पैदावार 6-7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। बीजों में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत होती है। इसके दाने गहरे भूरे रंग के होते हैं जो 130 दिनों में पक जाते हैं।

RL 914 (2002): यह पिछेती बिजाई की किस्म है। इसके नीले रंग के फूलों में भूरे रंग के बीज होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, जिसमें तेल की मात्रा 40-42 प्रतिशत होती है। यह किस्म 130-135 दिनों में पक जाती है।
 
Pratap Alsi 1: यह सफेद रंग के फूलों वाली किस्म है जो सिर्फ राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसकी औसतन पैदावार 8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, जिसमें तेल की मात्रा 40-41 प्रतिशत होती है। यह किस्म 130-135 दिनों में पक जाती है।
 
Pratap Alsi 2: यह किस्म सिर्फ राजस्थान के क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह किस्म 128-135 दिनों में पक जाती है और इसकी औसतन पैदावार 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके बीजों में 42 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
LC 2063 (2007): यह किस्म सिंचित क्षेत्रों के लिए बढ़िया मानी जाती है| यह सिंचित क्षेत्रों में 158 और सिंचित क्षेत्रों में 160 दिनों में पक कर तैयार हो जाती हैं| इसके फूल नीले रंग के और ज्यादा मात्रा में होते हैं, | इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं और इनमें 38.4% तेल की मात्रा होती है| यह किस्म पत्तों के सफेद धब्बा रोग की रोधक हैं| इसकी औसतन पैदावार 4-5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|
 
LC 2023 (1998): यह किस्म सिंचित और सिंचित क्षेत्रों के लिए भी बढिया मानी जाती है| इसका कद लम्बा और फूल नीले रंग के होते है| इसके बीजों में तेल की मात्रा 37.5% और औसतन पैदावार 4.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है| यह 155-165 में पक जाती हैं| यह किस्म पत्तों के सफेद धब्बे रोग की रोधक है|
 
Surbhi (KL-1): यह सबसे ज्यादा पैदावार वाली किस्म है, जो कुंगी, गर्दन-तोड़, सूखा और पत्तों के सफेद धब्बे रोग की रोधक है| यह 165-170 दिनों में पक जाती हैं| इसके बीजों में तेल की मात्रा 44% और औसतन पैदावार 3-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|
 
Jeevan (DPL-21): यह दोहरे उद्देश्य वाली किस्म है| यह 75 से 85 सैं.मी. के मध्यम कद वाली किस्म है| इसके बीज भूरे रंग के, आकार में दरमियाने और फूल नीले रंग के होते है| यह 175-181 दिनों में पक जाती है| यह किस्म सूखे, कुंगी और पत्तों के सफेद धब्बे रोग की रोधक है| इसकी  औसतन पैदावार 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|

Pusa-3, LC-185, LC-54, Sheela (LCK- 9211), K2 

 

 

ज़मीन की तैयारी

मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए 2-3 बार खेत की जोताई करें और फिर हैरो के साथ 2-3 बार जोताई करें| नमी को बनाये रखने के लिए कसी के साथ मलचिंग करें|

बिजाई

बिजाई का समय
अलग-अलग राज्यों में बिजाई अक्तूबर के पहले पखवाड़े से मध्य नवंबर तक की जाती है| दोहरे उद्देश्य वाली किस्मों की बिजाई नवंबर के पहले सप्ताह में करें। बारानी फसल को अगेती बिजाई की आवश्यकता होती है। अगेती बिजाई, फसल को पत्तों के सफेद धब्बे रोग और कुंगी से बचाती है|
 
फासला
पंक्तियों के बीच का फासला 30 सैं.मी. और पौधों के बीच का फासला 7-10 सैं.मी.का रखें|
 
बीज की गहराई
बीज को 5-8 सैं.मी. गहराई में बोयें|
 
बिजाई का ढंग
अलसी की बिजाई आम तौर पर छींटा विधि या मशीन के द्वारा पंक्तियों में की जाती है|
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए मशीन और कतार में बिजाई विधि द्वारा 6-7.5 किलो बीज की मात्रा का प्रयोग करें। छींटा विधि द्वारा 18 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
वीटावैक्स 2 ग्राम से प्रति किलो bij का प्रयोग करें। बीजों के उपचार द्वारा फसल को तना गलन बीमारी से बचाया जा सकता है।
 
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
25 40 -


तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
12 6 -

 

बिजाई के समय 12 किलो नाइट्रोजन(25 किलो यूरिया) और 6 किलो फासफोरस(40 किलो सुपर फास्फेट) प्रति एकड़ डालें| सिंचित स्थितियों में बिजाई के समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा शुरूआती खाद के रूप में डालें| बाकी बची हुई नाइट्रोजन बिजाई से 35  दिन बाद पहली सिंचाई के साथ डालें|

 

 

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की रोकथाम, नदीन नाशक के द्वारा की जा सकती है| अलसी में पाए जाने वाले मुख्य नदीन जामुनी बूटी, बाथू, गुली-डंडा, सफेद फूलों वाली बूटी, कांटेदार बूटी आदि हैं| आइसोप्रोटिउरॉन 75 डब्लयू पी 500 ग्राम प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में मिलाकर पहली सिंचाई से पहले या बाद या बिजाई के 2 दिन तक स्प्रे करें|

सिंचाई

यदि दो सिंचाइयां उपलब्ध हों तो पहली सिंचाई बिजाई के 40-45 दिनों के बाद शाखाओं के विकसित होने के समय करें और फिर दूसरी सिंचाई बिजाई के 60-75 दिनों के बाद कलियों के विकसित होने के समय करें। यदि एक सिंचाई उपलब्ध हो तो रोपाई के 50-60 दिनों के बाद सिंचाई करें।

पौधे की देखभाल

लूसर्न की सुंडी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
लूसर्न की सुंडी: यह पत्तों और फलियों को नुकसान पहुचाँती है|
रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए सेविन/हेक्साविन 50 डब्लयू पी (कार्बरील)450 ग्राम या मैलाथिऑन 50 ई सी 400 मि.ली. को  80-100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें|
 
कुंगी
  • बीमारियां और रोकथाम
कुंगी: इससे पत्तों के की सतह, फलियां और तने पर गुलाबी धब्बे पड़ जाते हैं|
रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए सल्फर 7 किलो या इंडोफिल (Z-78) 500 ग्राम को 250 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें|
 
 
सूखा
सूखा: यह बीमारी ज्यादातर नई फसल पर हमला करती है| इससे फसल पहले पीली पड़ती है और फिर नष्ट हो जाती है|
रोकथाम: इस बीमारी की रोधक किस्मों का प्रयोग करें|
 

फसल की कटाई

जब इसके फल पूरी तरह से भूरे हो जाए, तब इसकी कटाई करें| इसकी कटाई अप्रैल महीने में की जाती जाती है|

कटाई के बाद

कटाई के बाद पौधों को पैक करें और थ्रेशिंग वाले स्थान पर 4-5 दिन सूखने के लिए रखें| थ्रेशिंग फसल को लठों से कूटकर या फसल के ऊपर बैलगाड़ी को चला कर की जा सकती है|