T 397 (1984): इस किस्म के पौधे का कद 60-75 सैं.मी. होता है इसकी प्राकृतिक शाखाएं होती हैं।इसके हरे रंग के पत्ते और नीले रंग के फूल होते हैं। इसके गोल मध्यम आकार केफल होते हैं। इसके 1000 बीजों का भार 7.5-8 ग्राम होता है, जिनमें 44 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इसकी औसतन पैदावार 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
Jawahar 23 (1985): इस किस्म के पौधे का कद 45-60 सैं.मी. होता है इसके सफेद रंग के फूल होते हैं जो एक ही समय पर उगते हैं। इसके 1000 बीजों का भार 7-8 ग्राम होता है, जिनमें तेल की मात्रा 43 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किसम सूखा, कुंगी और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधक होती है।
LCK 8528: (Shikha) (1998): इसके बीजों की औसतन पैदावार 5-6 क्विंटल और रेशे की उपज 4-5 क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त होती है।
RLC 6: (Kiran) (1998): यह किस्म 115-120 दिनों में पक जाती है। सिंचित क्षेत्रों में इसकी औसतन पैदावार 3-4 क्विंटल और असिंचित क्षेत्रों में 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 42-43 प्रतिशत होती है। यह किस्म कुंगी और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधक होती है।
LMH: 62 (Padmini) (1999): इसकी औसतन पैदावार 3-4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। बीजों में 42-45 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। यह किस्म पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग के प्रतिरोधी और झुलस और लूसर्न के कुछ हद तक प्रतिरोधी होते हैं। यह किस्म 120-125 दिनों में पक जाती है।
RL 933: (Meera) (2000): इस किस्म के फूल नीले रंग के होते हैं जो कि कुंगी, सूखा और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधी है। इसकी औसतन पैदावार 6-7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। बीजों में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत होती है। इसके दाने गहरे भूरे रंग के होते हैं जो 130 दिनों में पक जाते हैं।
RL 914 (2002): यह पिछेती बिजाई की किस्म है। इसके नीले रंग के फूलों में भूरे रंग के बीज होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, जिसमें तेल की मात्रा 40-42 प्रतिशत होती है। यह किस्म 130-135 दिनों में पक जाती है।
Pratap Alsi 1: यह सफेद रंग के फूलों वाली किस्म है जो सिर्फ राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसकी औसतन पैदावार 8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, जिसमें तेल की मात्रा 40-41 प्रतिशत होती है। यह किस्म 130-135 दिनों में पक जाती है।
Pratap Alsi 2: यह किस्म सिर्फ राजस्थान के क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह किस्म 128-135 दिनों में पक जाती है और इसकी औसतन पैदावार 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके बीजों में 42 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है।
दूसरे राज्यों की किस्में
LC 2063 (2007): यह किस्म सिंचित क्षेत्रों के लिए बढ़िया मानी जाती है| यह सिंचित क्षेत्रों में 158 और सिंचित क्षेत्रों में 160 दिनों में पक कर तैयार हो जाती हैं| इसके फूल नीले रंग के और ज्यादा मात्रा में होते हैं, | इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं और इनमें 38.4% तेल की मात्रा होती है| यह किस्म पत्तों के सफेद धब्बा रोग की रोधक हैं| इसकी औसतन पैदावार 4-5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|
LC 2023 (1998): यह किस्म सिंचित और सिंचित क्षेत्रों के लिए भी बढिया मानी जाती है| इसका कद लम्बा और फूल नीले रंग के होते है| इसके बीजों में तेल की मात्रा 37.5% और औसतन पैदावार 4.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है| यह 155-165 में पक जाती हैं| यह किस्म पत्तों के सफेद धब्बे रोग की रोधक है|
Surbhi (KL-1): यह सबसे ज्यादा पैदावार वाली किस्म है, जो कुंगी, गर्दन-तोड़, सूखा और पत्तों के सफेद धब्बे रोग की रोधक है| यह 165-170 दिनों में पक जाती हैं| इसके बीजों में तेल की मात्रा 44% और औसतन पैदावार 3-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|
Jeevan (DPL-21): यह दोहरे उद्देश्य वाली किस्म है| यह 75 से 85 सैं.मी. के मध्यम कद वाली किस्म है| इसके बीज भूरे रंग के, आकार में दरमियाने और फूल नीले रंग के होते है| यह 175-181 दिनों में पक जाती है| यह किस्म सूखे, कुंगी और पत्तों के सफेद धब्बे रोग की रोधक है| इसकी औसतन पैदावार 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|
Pusa-3, LC-185, LC-54, Sheela (LCK- 9211), K2