राजस्थान में खजूर की खेती

आम जानकारी

खजूर इस धरती पर सबसे पुराना वृक्ष है, जिसकी खेती की जाती है। यह कैलशियम, शूगर, आयरन और पोटाशियम का उच्च स्त्रोत है। यह कई सामाजिक और धार्मिक त्योहारों में प्रयोग किए जाते हैं। इसके अलावा कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं, जैसे कब्ज से राहत, हृदय रोग को कम करना, दस्त को नियंत्रित करना और गर्भावस्था में सहायता करना।
खजूर की खेती मुख्य रूप से अरब देशों, इज़रायल और अफ्रीका में की जाती है। इरान खजूर का मुख्य उत्पादक और निर्यातक है। पिछले दशकों में भारतीय प्रशासन ने काफी प्रयास किए हैं, जिसके तहत खजूर के खेती क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है। भारत में राजस्थान, गुजरात, तामिलनाडू और केरला खजूर के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। राजस्थान में राज्य सरकार ने खजूर की खेती के लिए 12 जिलों को बढ़ावा दिया है, जैसे जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, हनुमान नगर, श्री गंगानगर, नागौर, पाली, जालौर, झुनझुनु, सिरोही और चुरू में खजूर की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए सब्सिडी देती है। खजूर की खेती लगभग 813 हैक्टेयर क्षेत्र के अंतर्गत की जाती है।
 

मिट्टी

इसकी खेती किसी भी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन अच्छी पैदावार और अच्छी उपज के लिए अच्छे निकास वाली, गहरी रेतली दोमट मिट्टी जिसकी पी एच 7-8 हो , उचित रहती है। जिस मिट्टी की 2 मीटर नीचे तक सतह सख्त हो, उन मिट्टी में उगाने से परहेज़ करें। क्षारीय और नमक वाली मिट्टी भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है लेकिन इनमें खजूर की कम पैदावार होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Halawy: यह उच्च उपज वाली किस्म है और राजस्थान के जलवायु में उगाने के लिए उपयुक्त है। खजूर नर्म और ताजी खाने के लिए उपयुक्त होती है। इसकी एक वृक्ष में औसतन 100-125 किलोग्राम पैदावार प्राप्त होती है।
 
Medjool: यह देरी से पकने वाली किस्म है। इसके फल बड़े, लंबकार और मध्यम आकार के होते हैं। इसकी एक वृक्ष में औसतन 75-100 किलोग्राम पैदावार प्राप्त होती है।
यह उच्च उपज वाली और देरी से पकने वाली किस्म है। इसके फल मध्यम से छोटे आकार के और सुनहरे होते हैं। पकने पर नर्म और अधिक स्वाद आता है। इसकी एक वृक्ष में औसतन 80 किलोग्राम पैदावार प्राप्त होती है।
 
Khunezi: यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसके फल लाल रंग के और लंबकार होते हैं। इसकी एक वृक्ष में औसतन 40 किलोग्राम पैदावार प्राप्त होती है।
 
Khadravi: इस किस्म के फल नर्म और पीले रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 60-80 किलोग्राम प्रति वृक्ष प्राप्त होती है।
 
Khalasa: इस किस्म के फल लंबाकार और मध्यम आकार के होते हैं। फल पीले भूरे रंग के होते हैं। फल में मिठास मध्यम, ना ज्यादा कम और ना ज्यादा उच्च होती है।
 
Shamran (Sayer)
 
Zahidi
 
Wild date palm
 
Jamli
 

ज़मीन की तैयारी

मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की दो से तीन बार जोताई करें। मिट्टी के समतल होने के बाद, गर्मियों में 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर आकार के खड्ढे खोदें। इन खड्ढों को दो सप्ताह के लिए खुला रखें। उसके बाद अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर और उपजाऊ मिट्टी से खड्ढों को भरें। क्लोरपाइरीफॉस@20 मि.ली. प्रत्येक खड्ढे में डालें। 

बिजाई

बिजाई का समय
मॉनसून में खजूर की खेती के लिए जुलाई-अगस्त का समय उपयुक्त होता है जबकि बसंत के मौसम में फरवरी-मार्च के महीने में रोपाई पूरी कर लें।
 
फासला
रोपाई के लिए 6मीटर या 8 मीटर के फासले पर 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर आकार के खड्ढे खोदें।
 
बीज की गहराई
रोपाई के लिए 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर आकार के खड्ढे खोदें।
 
बिजाई का ढंग
मुख्य खेत में वानस्पतिक भाग की रोपाई की जाती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
जब कतार से कतार और पौधे से पौधे में 6 मीटर फासले का प्रयोग किया जाता है, तब एक एकड़ में 112 नए पौधों का प्रयोग करें, जबकि 8 मीटर x 8 मीटर के फासले पर 63 नए पौधों का प्रयोग प्रति एकड़ में करें।
 
बीज का उपचार
खड्ढों में जड़ के भाग की रोपाई से पहले जड़ के आधार को IBA 1000 पी पी एम और क्लोरपाइरीफॉस 5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में दो से पांच मिनट के लिए डुबोकर रखें। 
 

प्रजनन

खजूर का प्रजणन जड़ के भाग की सहायता से किया जाता है। मुख्य पौधे से जड़ के भाग या टहनी को लें। रोपाई के 4 या 5 साल बाद पौधे के वनस्पतिक भाग प्राप्त होते हैं। वनस्पतिक भाग का उचित भार 15-20 किलोग्राम होना चाहिए। जड़ के भाग को मुख्य पौधे से अलग करने से छ: महीने या साल पहले अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर, रेत और लकड़ी का बुरादा जड़ के आस-पास डालें। अलग करने के समय पुराने पत्तों को निकाल दें और एक अकेला कट लें।
 
बीज प्रजनन की तरह ही जड़ के साथ प्रजनन की कुछ सीमाएं होती हैं। राजस्थान में प्रजनन उद्देश्य के लिए टिशु कल्चर तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। टिशू कल्चर से प्राप्त पौधे बहुत महंगे होते हैं लेकिन राजस्थान सरकार ड्रिप किसानों को 75 प्रतिशत सब्सिडी उपलब्ध करवाती है।
 

अंतर-फसलें

पहली कटाई के लिए 4 से 5 वर्ष आवश्यक होते हैं। इनके बीच ग्वार, धान, मिर्च, मटर, बैंगन आदि को अंतरफसली के तौर पर लिया जा सकता है।

खाद

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

dung

(kg)

NITROGEN

(gm)

PHOSPHORUS

(gm)

POTASH

(gm)

SULPHUR

(gm)

25 750 125 125 50

 

प्रत्येक वर्ष के अगस्त-सितंबर महीने में 40-50 किलो गाय का गला हुआ गोबर प्रति पौधे में डालें। खजूर को नाइट्रोजन खाद 500-1500 ग्राम प्रति पौधा बिजाई से पहले और फूल निकलने के समय आवश्यक होती है। प्रत्येक वर्ष फासफोरस 500-1000 ग्राम और पोटाश 250-500 ग्राम भी प्रति पौधे में डालें।
10 वर्ष के पौधे के लिए अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर 25 किलो, नाइट्रोजन 750 ग्राम, फासफोरस 125 ग्राम और पोटाश 125 ग्राम और सल्फर 50 ग्राम प्रति पौधे में अगस्त-सितंबर के महीने में डालें।
 

 

खरपतवार नियंत्रण

खेत को साफ और नदीन मुक्त रखें। नदीनों की तीव्रता के आधार पर निराई और गोडाई करें। नदीनों की रोकथाम के लिए मल्च का प्रयोग करें।

सिंचाई

नई बोयी फसल के लिए तीन महीने तक नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। गर्मियों में सात दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें जबकि सर्दियों में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। फूल निकलने, फल बनने और पकने की अवस्थाओं पर सिंचाई की कमी ना होने दें। मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखें। कम से कम पानी प्रयोग करने के साथ साथ खरपतवार नियंत्रण के लिए मलचिंग एक प्रभावी तरीका है। पौधे के आधार पर काली पॉलीथीन की शीट चढ़ाएं।

पौधे की देखभाल

दीमक
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
दीमक : दीमक की रोकथाम के लिए ड्रिप सिंचाई के द्वारा क्लोरपाइरीफॉस डालें।
 
छोटे मुंह वाला पतंगा
छोटे मुंह वाला पतंगा : इससे बचाव के लिए डेल्टामैथरीन 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो स्प्रे करें। फल निकलने के समय पहली स्प्रे करें।
 
पक्षी
पक्षी : जब फसल पकने की अवस्था तक पहुंच जाती है, तब पक्षी फल को नुकसान पहुंचाते हैं। गच्छों को पतली तार के जाल से ढकें।
 
सफेद लाल कीट
सफेद/लाल कीट : प्रभावित शाखाओं और पत्तों पर से कीटों को निकालकर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। यदि इसका हमला दिखे तो एक्टामिप्रिड 60 ग्राम या इमीडाक्लोप्रिड 60 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
ग्राफिओला पत्तों के धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
ग्राफिओला पत्तों के धब्बे : यह रोग नमी हालातों में फंगस की कमी के कारण होता है। पत्तों के दोनों ओर सलेटी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।
इसकी रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या मैनकोजेब 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर फोलियर स्प्रे करें।
 
आल्टरनेरिया पत्तों के धब्बे
आल्टरनेरिया झुलस रोग : यदि इस रोग का हमला दिखे तो मैनकोजेब+ कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दूसरी स्प्रे करें।
 
फल का गलना : फल पकने की अवस्था में बारिश या नमी का होना फल गलने के मुख्य कारण हैं।
फल पकने की अवस्था में गुच्छों को कागज़ से ढक दें। कुछ फलों को मध्य में से तोड़ लें क्योंकि ये गीले फलों को सुखाने के लिए हवा प्रदान करते हैं।
 

फसल की कटाई

रोपाई के चार से पांच साल बाद खजूर का वृक्ष पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाता है। फल की तुड़ाई की तीन अवस्थाएं होती हैं पहली जब फल पकने की अवस्था में होते हैं। दूसरी, जब फल ताजे होते हैं। तीसरी जब फल नर्म और पके हुए होते हैं और सूखी अवस्था जब फल सूख जाते हैं। राजस्थान में चूहड़ा या पिंड खजूर के लिए फलों की तुड़ाई फल पकने की अवस्था में की जाती है। मॉनसून का मौसम शुरू होने से पहले तुड़ाई पूरी कर लें।

कटाई के बाद

फल पकने की अवस्था में तुड़ाई के बाद फलों को साफ पानी से धोयें। चूहड़ा बनाने के उद्देश्य के लिए इन्हें धूप में सूखाया जाता है या ड्रायर से 40-45 डिगरी सैल्सियस के तापमान पर 80-120 घंटों के लिए सुखाएं।