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आम जानकारी

कपास भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की एक बहुत ही महत्तवपूर्ण रेशे वाली और व्यापारिक फसल है। यह देश के उदयोगिक और खेतीबाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में बहुत ही महत्तवपूर्ण भूमिका निभाती है। कपास कपड़ा उदयोग को प्रारंभिक कच्चा माल उपलब्ध करवाने वाली मुख्य फसल है। कपास भारत के 6 मिलियन किसानों को रोज़ी-रोटी उपलब्ध करवाती है और कपास के व्यापार से लगभ 40-50 मिलियन लोगों को रोज़गार मिलता है। कपास की फसल ज्यादा पानी लेने वाली फसल है और पानी का लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा कपास की सिंचाई करने के लिए प्रयोग किया जाता है। भारत में कपास की खेती मुख्य तौर पर महांराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटका, मध्य प्रदेश, पंजाब, राज्यस्थान, हरियाणा, तामिलनाडू और उत्तर प्रदेश राज्यों में बड़े स्तर पर की जाती है। कपास की पैदावार में गुजरात का पहला स्थान आता है और इसके बाद महांराष्ट्र और फिर पंजाब का नंबर आता है। 

मिली बग
मिली बग : यह पत्तियों के निचली ओर झुंड में पाया जाता है और यह चिपचिपा पदार्थ छोड़ता है। चिपचिपे पदार्थ के कारण पत्तों पर फंगस बनती है, जिससे पौधे बीमार पड़ जाते हैं और काले रंग के दिखाई देते हैं।
 
इसकी रोकथाम के लिए मक्की, बाजरा और जवार की फसलें कपास की फसल के आस पास उगाएं। प्रभावित पौधों को उखाड़कर पानी के स्त्रोतों या खाली स्थानों पर ना फेंके, बल्कि इन्हें जला दें। कपास के खेतों के आस पास गाजर घास ना होने दें, क्योंकि इससे मिली बग के हमले का खतरा बढ़ जाता है। इसे नए क्षेत्रों में फैलने से रोकने के लिए प्रभावित क्षेत्रों वाले इन्सानों या जानवरों को सेहतमंद क्षेत्रों में जाने से रोक लगाएं। शुरूआती समय नीम के बीजों का अर्क 5 प्रतिशत 50 मि.ली. प्रति लीटर + कपड़े धोने वाले सर्फ 1 ग्राम प्रति लीटर प्रभावित पौधों के डब्बों पर डालें। यदि इसका हमला गंभीर हो तो प्रोफैनोफोस 500 मि.ली. प्रति एकड़ को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। एक चम्मच वॉशिंग पाउडर 15 लीटर की टैंकी में मिक्स करें या क्विनलफॉस 25 ई सी 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 3 मि.ली. प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 

जलवायु

  • Season

    Temperature

    21-32°C
  • Season

    Rainfall

    55-100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    27-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-32°C
  • Season

    Rainfall

    55-100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    27-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
सफेद मक्खी
सफेद मक्खी : इसके बच्चे पीले रंग के और अंडाकार आकार के होते हैं, जब कि मक्खी के शरीर का रंग पीला होता है और एक सफेद मोम जैसे पदार्थ से ढका होता है। यह पत्तियों का रस चूसते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह मक्खी पत्ता मरोड़ बीमारी का भी माध्यम बनती है। इसका हमला ज्यादा होने से पत्तों का झड़ना, टिंडो का झड़ना और टिंडों का पूरी तरह से ना खिलना आदि आम तौर पर देशा जा सकता है। इससे पौधों पर फंगस बन जाती है और पौधे बीमार और काले दिखाई देते हैं।
 
एक ही खेत में बार बार कपास ना उगाएं। फसली चक्र के तौर पर बाजरा, रागी, मक्की आदि फसलें अपनायें। फसल के अनआवश्यक विकास को रोकने के लिए नाइट्रोजन का अनआवश्यक प्रयोग ना करें। फसल को समय सिर बोयें। खेत को साफ रखें। कपास की फसल के साथ बैंगन, भिंडी, टमाटर, तंबाकू और सूरजमुखी की  फसल ना उगायें। सफेद मक्खी पर नज़र रखने के लिए पीले चिपकने वाले कार्ड 2 प्रति एकड़ लगाएं। यदि सफेद मक्खी का हमला दिखे तो ट्राइज़ोफॉस 3 मि.ली. प्रति लीटर या थायाक्लोराइड 4.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में या एसेटामीप्रिड 4 ग्राम या एसीफेट 75 डब्लयू पी 20 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी या इमीडाक्लोप्रिड 40 मि.ली. प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में मिलाकर या थायामैथोक्सम 40 ग्राम प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 

 

  • Season

    Temperature

    21-32°C
  • Season

    Rainfall

    55-100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    27-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-32°C
  • Season

    Rainfall

    55-100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    27-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
थ्रिप्स
थ्रिप्स : छोटे और बड़े थ्रिप्स पत्तों के निचली ओर से रस चूसते हैं। पत्तों का ऊपरला हिस्सा भूरा हो जाता है और निचला हिस्सा चांदी रंग जैसे सफेद हो जाता है।
 
फसल को चेपे, पत्ते के टिड्डे और थ्रिप्स से 8 सप्ताह तक बचाने के लिए, इमीडाक्लोप्रिड 70 डब्लयू एस में 7 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। मिथाइल डैमीटन 25 ई सी 160 मि.ली. बुप्रोफेंज़िन 25 प्रतिशत एस सी 350 मि.ली. फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एस सी 500-1000 मि.ली., इमीडाक्लोप्रिड 70 प्रतिशत डब्लयू जी 10-30 ग्राम, थायामैथोक्सम 25 प्रतिशत डब्लयू जी 30 ग्राम में से किसी एक को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 

मिट्टी

देसी कपास के लिए रेतली दोमट से चिकनी मिट्टी की आवश्यकता होती है और अमेरिकन कपास की किस्मों के लिए दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसे हर तरह की मिट्टी, जिसकी पी एच दर 6-8 होती है, में उगाया जा सकता है। इस फसल की खेती के लिए गहरी, नर्म, अच्छे निकास वाली और उपजाऊ मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। कपास की बिजाई के लिए रेतली, खारी या जल जमाव वाली मिट्टी ठीक नहीं होती। मिट्टी की गहराई 20-25 सैं.मी. से कम नहीं होनी चाहिए।

कमी और इसका इलाज

पत्तों पर लाली आना
शुरूआत में यह जड़ों पर पाई जाती है और फिर पौधे के ऊपर वाले हिस्से पर फैल जाती है। इसे सही खाद प्रबंध से ठीक किया जा सकता है। पत्तों पर मैग्नीशियम सल्फेट 1 किलो, फिर यूरिया 2 किलो प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
नाइट्रोजन की कमी
पौधे का विकास रूक जाता है और कद बोना रह जाता है। निचले पत्ते पीले दिखाई देते हैं। गंभीर हालातों में पत्ते भूरे हो जाते हैं और फिर सूख जाते हैं।
 
फासफोरस की कमी
पत्ते गहरे हरे दिखाई देते हैं। पुराने पत्ते छोटे आकार के हो जाते हैं और इन पर जामुनी और लाल धब्बे पड़ जाते हैं।
पोटाश की कमी
पोटाश की कमी से पत्ते झड़ने शुरू हो जाते हैं और टिंडे भी पूरी तरह नहीं खिलते। पत्ते मुड़ जाते हैं और फिर सूख जाते हैं।
 
जिंक की कमी
इससे पौधे का विकास प्रभावित होता है और पौधे का कद बोना रह जाता है। इसकी शाखाएं सूख जाती हैं और फिर पौधे का सिरा या नए पत्ते खराब हो जाते हैं।
 

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

अमेरिकन कपास की किस्में
 
RS 2013: यह किस्म कपास के पत्ता मरोड़ रोग की प्रतिरोधक है और अमेरिकन सुंडी और तेले की कुछ हद तक प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 125-130 सैं.मी. होता है। यह पीले रंग के फूलों का उत्पादन करती है और इसके मध्यम आकार के टिंडे होते हैं। यह किस्म 165-170 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसके कपास की बीजों की औसतन पैदावार 22-24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है और पिंजाई के बाद 35 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है।
 
RS 810: यह किस्म कपास के पत्ता मरोड़ रोग की प्रतिरोधक है इसका औसतन कद 130-140 सैं.मी. होता है। यह पीले रंग के फूलों का उत्पादन करती है और इसके मध्यम आकार के टिंडे होते हैं। इसके कपास की बीजों की औसतन पैदावार 22-24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है और पिंजाई के बाद 35 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है।
 
RST 9: इस किस्म के हल्के हरे रंग के पत्ते और हल्के पीले रंग के फूल होते हैं। इसका औसतन कद 130-140 सैं.मी. होता है। यह किस्म 160-200 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसके टिंडे का औसतन भार 3.5 ग्राम होता है। इसकी पिंजाई के बाद रूई की उच्च प्रतिशतता प्राप्त होती है। इस किस्म की पहली सिंचाई 50 दिनों के बाद की जा सकती है।
 
RS 875: इसका औसतन कद 100-110 सैं.मी. होता है। इसके मध्यम आकार के टिंडे होते हैं जिनका औसतन भार 3.5 ग्राम प्रति टिंडा होता है। इस किस्म की तेल की मात्रा बाकी सिफारिश की गई किस्मों से अधिक होती है। यह किस्म 150-160 दिनों में परिपक्व हो जाती है।
 
Ganganagar Ageti: इसका औसतन कद 120-150 सैं.मी. होता है। इसके गहरे हरे रंग के पत्ते और हल्के पीले रंग के फूल होते हैं। इसके मध्यम आकार के टिंडे होते हैं जिनका औसतन भार 2.5 ग्राम प्रति टिंडा होता है। यह किस्म 170-180 दिनों में परिपक्व हो जाती है।
 
Bikaneri Narma: इसका औसतन कद 160-200 सैं.मी. होता है। इसके मध्यम आकार के टिंडे होते हैं जिनका औसतन भार 2.0 ग्राम प्रति टिंडा होता है। यह किस्म 160-200 दिनों में परिपक्व हो जाती है।
 
Bioseed Bunty BG II: यह उच्च उपज वाली अमेरिकन बी टी कपास की किस्म है। पौधे का कद 150-170 सैं.मी. होता है। इसकी औसतन पैदावार 8.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RCH 650BG II: यह उच्च उपज वाली अमेरिकन बी टी कपास की किस्म है। यह टिंडे की सुंडी और तंबाकू सुंडी के प्रतिरोधी किस्म है। पौधे का कद 150-160 सैं.मी. होता है। इसकी औसतन पैदावार 8.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
MRCH - 6304 BG I: यह उच्च उपज वाली अमेरिकन बी टी कपास की किस्म है। यह टिंडे की सुंडी और तंबाकू सुंडी के प्रतिरोधी किस्म है। यह किस्म 165-170 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Bioseed 6588 BG-II: इसके पौधे का कद 150-175 सैं.मी. होता है। यह टिंडे की सुंडी और तंबाकू सुंडी के प्रतिरोधी किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 10-11.2 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
अमेरिकन कपास की हाइब्रिड किस्में
 
Maru Vikas: यह अमेरिकन कपास की उच्च उपज वाली किस्म है। इसका औसतन कद 135-145 सैं.मी. होता है। इसके मध्यम आकार के पत्ते होते हैं जो कि रंग में हरे और हल्के पीले रंग के फूल होते हैं। मध्यम आकार के टिंडे होते हैं, जिनका औसतन भार 4.5 ग्राम प्रति टिंडा होता है। यह किस्म 170-180 दिनों में परिपक्व हो जाती है और पिंजाई के बाद 35 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है।
 
LHH 144
 
Sankar 4: यह एक हाइब्रिड किस्म है। इसके रेशे की लंबाई 1.06 से 1.10 इंच होती है। रेशा नर्म और सफेद रंग का होता है।

Varahlakshmi: यह एक हाइब्रिड किस्म है। इसके रेशे की लंबाई 2.2 से 3 सैं.मी. होती है।
 
देसी कपास की किस्में
 
RG 8: इसके हल्के पीले रंग के फूल होते हैं जिनके पंखुड़ी के अंदर की तरफ लाल धब्बे मौजूद होते हैं। इसके पत्ते तंग और अंडाकार आकार के होते हैं। यह अगेती पकने वाली किस्म है जिसके कपास के बीजों की औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 
 
RG 18: यह किस्म 160-170 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसके पत्तों का रंग जामुनी, गुलाबी रंग के फूलों में गहरे लाल रंग के धब्बे और मध्यम आकार के टिंडे, जिनका औसतन भार 2.2 ग्राम होता है। यह जड़ गलन के प्रतिरोधी किस्म होती है। इसके बीजों की औसतन पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ और पिंजाई के बाद 38 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है।

VIRNAR: यह देसी कपास की मध्यम समय की किस्म है। इसके रेशे की लंबाई 0.88 से 0.96 इंच होती है। पिंजाई के बाद 37 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है।
 
VAGAD KALYAN (RB-423): यह जल्दी पकने वाली किस्म है। बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल है। पौधा 80-90 सैं.मी. लंबे होते हैं। टिंडे मध्यम आकार के होते हैं।
 
RBDV-7 (Pratap Kapi-1): बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल है। पौधे का कद 130 सैं.मी. होता है। टिंडे मध्यम आकार के, एक सिरा तीखा होता है।
 
PST 9: यह मध्यम समय की किस्म है। इसका तना और पत्ते हरे रंग के होते हैं। इसके रेशे की लंबाई 22.5 मि.मी. होती है और पिंजाई के बाद 33 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है।
 
देसी कपास की हाइब्रिड किस्में
 
RAJDH 9: यह किस्म 2005 में जारी की गई थी। इस किस्म का औसतन कद 130-140 सैं.मी. होता है। इसके हरे रंग के पत्ते, पीले रंग के फूल और अंडाकार आकार के टिंडे होते हैं। इसके बीजों की औसतन पैदावार 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ होती है और पिंजाई के बाद 39 प्रतिशत रूई प्राप्त होती है। यह किस्म 160-170 दिनों में परिपक्व हो जाती है।
 

फसल की कटाई

जब टिंडे पूरी तरह खिल जायें तो रूई की चुगाई करें। सूखे टिंडों की चुगाई करें, रूई सूखे हुए पत्तों के बिना ही चुगें। खराब टिंडों को अलग से चुगें और बीज के तौर पर प्रयोग करने के लिए रखें। पहली और आखिरी चुगाई आमतौर पर कम क्वालिटी की होती है, इसलिए इसे अच्छा लाभ लेने के लिए बाकी की फसल के साथ ना मिलाएं। चुगे हुए टिंडे साफ और सूखे हुए होने चाहिए। चुगाई ओस सूखने के बाद करें। चुगाई हर 7-8 दिनों के बाद लगातार करें, ताकि रूई के धरती पर गिरने से पहुंचाने वाली नुकसान से बचाया जा सके। अमेरिकन कपास को 15-20 दिनों और देसी कपास को 8-10 दिनों के फासले पर चुगें। चुगे हुए टिंडों को मंडी ले जाने से पहले अच्छी तरह साफ करें।

ज़मीन की तैयारी

फसल की अच्छी पैदावार और अच्छे अंकुरण के लिए ज़मीन को अच्छी तरह तैयार करना जरूरी होता है। रबी की फसल को काटने के बाद तुरंत खेत को पानी लगाना चाहिए। इसके बाद खेत की हल से अच्छी तरह जोताई करें और फिर सुहागा फेर दें। ज़मीन को तीन वर्षों में एक बार गहराई तक जोतें, इससे सदाबहार नदीनों की रोकथाम में मदद मिलती है और इससे मिट्टी में पैदा होने वाले कीड़ों और बीमारियों को भी रोका जा सकता है।

कटाई के बाद

चुगाई के बाद भेड़ों, बकरियों और अन्य जानवरों को कपास के खेतों में चरने के लिए  छोड़ दें ताकि ये जानवर सुंडियों से प्रभावित टिंडों और पत्तों को खा सकें। आखिरी चुगाई के बाद छटियों को जड़ों सहित उखाड़ दें। सफाई रखने के लिए पौधों के बाकी हिस्से मिट्टी में दबा दें। छटियां बांधने से पहले बंद टिंडों को धरती पर मारकर या तोड़कर अलग कर दें और जला  दें ताकि सुंडी के लार्वे को नष्ट किया जा सके। चुगाई के बाद छटियों को उखाड़ने के लिए दो खालियां बनाने वाले ट्रैक्टर से जोताई करें।

बिजाई

बिजाई का समय
बिजाई के लिए अप्रैल से मध्य मई का समय उपयुक्त होता है।
 
फासला
अमेरिकन कपास के लिए कतार से कतार का फासला 60 सैं.मी. और पौधे से पौधे का फासला 45 सैं.मी. रखें। देसी कपास की किस्म के लिए कतार से कतार का फासला 45 सैं.मी. और पौधे से पौधे का फासल 30 सैं.मी. रखें।
 
बीजों के अंकुरन ना होने और नए पौधों के नष्ट होने के कारण कुछ फासले पड़ जाते हैं इन्हें भरने के लिए 2-3 पानी में भिगोये हुए बीजों या अंकुरन के बाद एक सेहतमंद नए पौधे को बोयें। बिजाई के दो सप्ताह बाद कमज़ोर, बीमार, प्रभावित नए पौधों को निकालकर सेहतमंद नए पौधे की रोपाई करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को बोने के लिए 4-5 सैं.मी. की गहराई होनी चाहिए।
 
बिजाई का ढंग
देसी कपास की बिजाई के लिए सीड ड्रिल का प्रयोग करें जब कि हाइब्रिड और बी टी कपास के लिए डिबलिंग ढंग का प्रयोग करें। आयताकार रोपाई के मुकाबले वर्गाकार रोपाई ज्यादा लाभदायक होती है। बीजों के अंकुरन ना होने और नए पौधों के नष्ट होने के कारण कुछ फासले पड़ जाते हैं इन्हें भरने के लिए 2-3 पानी में भिगोये हुए बीजों या अंकुरन के बाद एक सेहतमंद नए पौधे को बोयें। बिजाई के दो सप्ताह बाद कमज़ोर, बीमार, प्रभावित नए पौधों को निकालकर सेहतमंद नए पौधे की रोपाई करें।
 

बीज

बीज की मात्रा
हाइब्रिड और बी टी कपास के लिए 1 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें, जब कि देसी किस्मों के लिए 3-5 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। 
 
बीज का उपचार
अमेरिकन कपास का बीज हल्के रेशे से ढका होता है। इसके रेशे को बिजाई से पहले हटा दें, ताकि बिजाई के समय कोई मुश्किल का सामना ना करना पड़े। इसे रासायनिक और कुदरती दोनों ढंग से हटाया जा सकता है।
कुदरती ढंग से रेशा हटाने के लिए बीजों को पूरी रात पानी में भिगोकर रखें, फिर अगले दिन गोबर और लकड़ी के बुरे या राख से बीजों को मसलें। फिर बिजाई से पहले बीजों को छांव में सुखाएं।
रासायनिक ढंग बीज के रेशे पर निर्भर करता है। शुद्ध सल्फ्यूरिक एसिड (उदयोगिक ग्रेड) अमेरिकन कपास के लिए 400 ग्राम प्रति 4 किलो बीज और देसी कपास के लिए 300 ग्राम प्रति 3 किलो बीज को 2-3 मिनट के लिए मिक्स करें इससे बीजों का सारा रेशा उतर जायेगा। फिर बीजों वाले बर्तन में 10 लीटर पानी डालें और अच्छी तरह से हिलाकर पानी निकाल दें। बीजों को तीन बार सादे पानी से धोयें और फिर चूने वाले पानी (सोडियम बाइकार्बोनेट 50 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) से एक मिनट के लिए धोयें। फिर एक बार दोबारा धोयें और छांव में सुखाएं।
रासायनिक ढंग के लिए धातु या लकड़ी के बर्तन का प्रयोग ना करें, बल्कि प्लास्टिक का बर्तन या मिट्टी के बने हुए घड़े का प्रयोग  करें। इस क्रिया को करते समय दस्तानों का प्रयोग जरूर करें।
रस चूसने वाले कीटों के हमले से बचाने के लिए 15-20 दिनों तक इमीडाक्लोप्रिड या थाइमैथोक्सम 5-7 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।
 
फंगसनाशी दवाई  मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज)
Imidacloprid 5-7ml
Thiamethoxam 5-7gm
 
 

खरपतवार नियंत्रण

पौधों में ज्यादा फासला होने के कारण फसल पर नदीनों का गंभीर हमला होता है। अच्छी पैदावार के लिए फसल की बिजाई के बाद 50-60 दिनों तक फसल का नदीन रहित होना जरूरी है, नहीं तो फसल की पैदावार में 60-80 प्रतिशत कमी आ सकती है। नदीनों की असरदार रोकथाम के लिए हाथों से, मशीनी और रासायनिक ढंगों के सुमेल का उपयोग होना जरूरी है। बिजाई के 5-6 सप्ताह बाद या पहली सिंचाई करने से पहले हाथों से गोडाई करें। बाकी गोडाई प्रत्येक सिंचाई के बाद करनी चाहिए। कपास के खेतों के आस पास गाजर बूटी पैदा ना होने दें, क्योंकि इससे मिली बग के हमले का खतरा ज्यादा रहता है।
बिजाई के बाद नदीनों के पैदा होने से पहले ही पैंडीमैथालीन 25-33 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे करें। बिजाई के 6-8 सप्ताह बाद जब पौधों का कद 40-45 सैं.मी. हो तो पेराकुएट (ग्रामोक्सोन) 24 प्रतिशत डब्लयू एस सी 500 मि.ली. प्रति एकड़ या ग्लाइफोसेट 1 लीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें नदीन नाशक 2, 4-डी से कपास की फसल काफी संवेदनशील होती है। बेशक इस नदीननाश्क की स्प्रे नज़दीक के खेत में की जाए, तो भी इसके कण उड़ कर कपास की फसल को बहुत ज्यादा नुकसान पहंचा सकते हैं। नदीन नाशक की स्प्रे सुबह या शाम के समय में ही करनी चाहिए। 
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA DAP or SSP MOP
Varieties 44 20 63 #
Bt and Non Bt 90 40 120

#

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASSIUM
Varieties 20 10 #
Bt and Non Bt 40 20

#

 

खादें और सिंचाई के साधनों के सही उपयोग और अच्छी तरह से की जोताई से कीड़ों को पैदा होने से पहले ही रोका जा सकता है कीड़ों के कुदरती दुश्मनों की भी रक्षा की जा सकती है। पौधे के उचित विकास और ज्यादा टिंडे वाली टहनियों की प्रफुल्लता के लिए, मुख्य टहनी के बढ़ रहे हिस्से  को लगभग 5 फुट की ऊंचाई से काट दें। देसी कपास की किस्मों क लिए नाइट्रोजन 20 किलो (यूरिया 44 किलो) और फासफोरस 10 किलो (एस एस पी 63 किलो) प्रति एकड़ में डालें। हाइब्रिड कपास की किस्मों के लिए खादों की दोहरी मात्रा नाइट्रोजन 40 किलो और फासफोरस 20 किलो प्रति एकड़ में डालें। मिट्टी की जांच के आधार पर पोटाश डालें। फासफोरस की पूरी मात्रा और पोटाश यदि जरूरत हो तो  और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बिजाई से पहले आखिरी जोताई के समय डालें। नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा फूल निकलने के समय डालें। यदि मिट्टी में जिंक की कमी हो तो जिंक सल्फेट 10 किलो मिट्टी में बीज बोने से पहले डालें।
 
घुलनशील खादें : यदि बिजाई के 80-100 दिनों के बाद फसल को फूल ना निकलें या फूल कम हों तो फूलों की पैदावार बढ़ाने के लिए ज्यादा सूक्ष्म तत्व खाद 750 ग्राम प्रति एकड़ प्रति 150 लीटर पानी की स्प्रे करें। बी.टी किस्मों की पैदावार बढ़ाने के लिए बिजाई के 85, 95 और 105 दिनों के बाद 13:0:45 के अनुसार 10 ग्राम या पोटाश 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे शाम के समय करें। अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए 
पोटाशियम 10 ग्राम प्रति लीटर और डी.ए.पी. 20 ग्राम प्रति लीटर (पहले फूल खिलने के प्रत्येक 15 दिनों के फासले पर 2-3 स्प्रे) की स्प्रे करें। कई बार वर्गाकार लार्वा गिरता है और इससे फूल झड़ने शुरू हो जाते हैं, इसकी रोकथाम के लिए प्लानोफिक्स (एन ए ए) 4 मि.ली. और ज्यादा सूक्ष्म तत्व 120 ग्राम, मैगनीश्यिम सल्फेट 150 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी की स्प्रे करें। यदि खराब मौसम के कारण टिंडे झड़ते दिखाई दें तो इसकी रोकथाम के लिए 100 ग्राम 00:52:34+30 मि.ली. हयूमिक एसिड (12 प्रतिशत से कम)+6 मि.मी. स्टिकर को 15 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के फासले पर तीन स्प्रे करें। आज कल पत्तों में लाली बहुत ज्यादा दिख रही है, इसका मुख्य कारण पौष्टिक तत्वों की कमी है। इसे खादों के सही उपयोग से ठीक किया जा सकता है। इस तरह करने के लिए 1 किलो मैग्नीशियम सल्फेट की पत्तियों पर स्प्रे करें और इसके बाद यूरिया 2 किलो को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 

 

 

सिंचाई

कपास की फसल को बारिश की तीव्रता के अनुसार चार से छः सिंचाई की जरूरत होती है। पहली सिंचाई बिजाई के चार से छः सप्ताह बाद करें। बाकी सिंचाइयां दो या तीन सप्ताह के फासले पर करें। छोटे पौधों में पानी खड़ा ना होने दें। फूल और टिंडे गिरने से बचाने के लिए, फूल निकलने  और फूल लगने के समय फसल को पानी की कमी नहीं रहने देनी चाहिए। जब टिंडे 33 प्रतिशत खिल जायें उस समय आखिरी सिंचाई करें और इसके बाद फसल को सिंचाई के द्वारा पानी ना दें।
 
जब भी फसल की सिंचाई के लिए खारे पानी का उपयोग किया जाये, तो सिंचाई करने से पहले पानी की जांच प्रमाणित लैबोरेटरी से करवाएं और उनकी सलाह के अनुसार  ही पानी में जिप्सम या पाइराइट का उपयोग करें। सूखे वाली स्थितियों में खालियां बनाकर और एक  क्यारी छोड़कर सिंचाई करें। सूक्ष्म सिंचाई सिस्टम अपनाएं (जहां भी संभव हो), इससे सिंचाई वाला पानी  बचाने में सहायता होती है।
 

पौधे की देखभाल

मुरझाना
  • बीमारियां और उनकी रोकथाम
मुरझाना : इससे पौधे मध्यम और पीले पड़ जाते हैं और इसके बाद पत्ते झड़ने शुरू हो जाते हैं। पहले पीलापन पत्तों के बाहरले हिस्से पर पड़ता है और बाद में अंदर वाले हिस्से पर पड़ना शुरू हो जाता है। प्रभावित पौधों को फल जल्दी लगते हैं। और इसके टिंडे भी छोटे होते हैं इससे रंग काला और छाल के नीचे बने छल्ले जैसा हो जाता है। इसका हमला किसी भी समय हो सकता है।
 
इस रोग की रोकथाम के लिए रोधक किस्मों का प्रयोग करें एक ही खेत में लगातार कपास की फसल ना उगाएं। उचित फसली चक्र अपनाएं। पानी के निकास का पूरा प्रबंध रखें। ट्राइकोडरमा विराइड फॉरमूलेशन 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। इसकी रोकथाम के लिए थायोफैनेट मिथाइल 10 ग्राम और यूरिया प्रत्येक 50 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर पौधों की जड़ों के नज़दीक डालें।
 
पत्तों पर धब्बे
झुलस रोग : इससे पत्तों पर छोटे, पीले से भूरे, गोलाकार या बेढंगे मोटे मोटे धारियों वाले धब्बे पड़ जाते हैं। प्रभावित पत्ते सूखकर झड़ने शुरू हो जाते हैं। जिससे टिंडे गलने लग जाते हैं और झड़ जाते हैं। पौष्टिक तत्वों की कमी और सूखे से प्रभावित पौधों पर इस बीमारी का ज्यादा हमला होता है।
 
इस बीमारी की रोकथाम के लिए टैबुकोनाज़ोल 1 मि.ली. प्रति लीटर या ट्राइफलोकसीसट्रोबिन+ टैबुकोनाज़ोल 0.6 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे बिजाई के 60वें, 90वें, और 120वें दिन बाद करें। यदि बीमारी खेत में दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कप्तान 500 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ स्प्रे करें या कार्बेनडाज़िम 12 प्रतिशत + मैनकोज़ेब 63 प्रतिशत डब्लयू पी 25 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
पत्तों पर धब्बा रोग
पत्तों पर धब्बा रोग : इससे पत्तों पर गोलाकार लाल धब्बे पड़ जाते हैं, जो कि बाद में बड़े होकर बीच में से सफेद और सलेटी रंग के हो जाते हैं। यह धब्बे गोल होते हैं और बीच बीच में लाल धारियां होती हैं। धब्बों के बीच में सलेटी रंग के गहरे दाने बन जाते हैं, जिस कारण वह सलेटी रंग के दिखाई देते हैं।
 
यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो फसल पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर या मैनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे 15 दिनों के फासले पर 3-4 बार करें।
 
एंथ्राक्नोस
एंथ्राकनोस : इस बीमारी से पत्तों पर छोटे, लाल या हल्के रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। तनों पर जख्म बन जाते हैं। जिससे पौधा कमज़ोर हो जाता है। यह बीमारी टिंडों पर कभी भी हमला कर सकती है और बाद में यह बीमारी रूई और टिंडे के अंदर वाले बीज पर नुकसान करती है। इस बीमारी से प्रभावित टिंडों पर छोटे, पानी जैसे, गोलाकार, लाल - भूरे धब्बे पड़ जाते हैं।
 
इस बीमारी की रोकथाम के लिए बिजाई से पहले प्रति किलो बीजों को कप्तान या कार्बेनडाज़िम 3-4 ग्राम से उपचार करें। खेत में पानी खड़ा ना होने दें। यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो प्रभावित पौधों को जड़ों से उखाड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। फिर कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।
 
जड़ गलन
जड़ गलन : इससे पौधा अचानक और पूरा सूख जाता है। पत्तों का रंग पीला पड़ जाता है। प्रभावित पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सकता है। मुख्य जड़ के अलावा कुछ अन्य जड़ें ताजी होती हैं जो कि पौधे की जकड़ बनाए रखती हैं और बाकी की जड़ें गल जाती हैं।
 
बिजाई से पहले मिट्टी में नीम केक 60 किलो प्रति एकड़ में डालें। जड़ गलने के हमले की संभावना कम करने के लिए ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो प्रभावित पौधों और साथ के सेहतमंद पौधों के निचली ओर कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम प्रति लीटर डालें।
 
अमेरिकन सुंडी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
अमेरिकन सुंडी : यह सुंडी पत्ते के ऊपरी और निचली ओर अंडे देती है। अंडे में से निकली सुंडी का रंग शुरू में पीला सफेद होता है, इसका सिर भूरा काला होता है। बाद में इसके शरीर का रंग गहरा हो जाता है और उसके बाद इसका रंग भूरे रंग में तबदील हो जता है। इस सुंडी के हमले से टिंडों में गोल छेद हो जाते हैं। इन छेदों के बाहरी ओर सुंडी का मल दिखाई देता है। अकेला लार्वा 30-40 टिंडों को नुकसान पहुंचा सकता है। इन हमलों की जांच के लिए रोशनी वाले कार्डों या फेरोमोन कार्ड का प्रयोग करें।
 
कपास की फसल लगातार एक खेत में ना लगाएं, बल्कि बदल बदल कर फसल उगाएं। कीड़ों का हमला रोकने के लिए हरी मूंग, काले मांह, सोयाबीन, अरिंड, बाजरा आदि को कपास की फसल के साथ या उसके आस पास लगाना फायदेमंद रहता है। कपास बोने से पहले, पहली फसल के बचे कुचे को अच्छी तरह निकाल दें। पानी का सही मात्रा में प्रयोग करें और नाइट्रोजन खाद का ज्यादा प्रयोग ना करें। इसकी रोकथाम के लिए रोधक किस्में उगाएं अमेरिकन सुंडी की रोकथाम के लिए कुदरती ढंग ना अपनाएं। यदि हमला ज्यादा हो तो उपलब्धता अनुसार साइपरमैथरिन या डैल्टामैथरिन या फैनवेलरेट या लैंबडा साइहैलोथ्रिन में से किसी एक को 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित फसल पर स्प्रे करें। टिंडे की सुंडी की उचित रोकथाम के लिए एक ग्रुप के कीटनाशक की स्प्रे एक बार ही करें।
 
तेला
तेला : नए जन्मे और बड़े तेले पत्तों के निचली ओर से रस चूस लेते हैं, जिससे पत्ता मुड़ जाता है। इसके बाद पत्ते लाल या भूरे हो जाते हैं और फिर सूखकर गिर पड़ते हैं। जड़ों के नजदीक कार्बोफियूरन 3 जी 14 किलो या फोरेट 10 जी 5 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से नमी वाली मिट्टी में डालें। जब फसल का उपरला हिस्सा पीला पड़ने लगे और पौधे के 50 प्रतिशत तक पत्ते मुड़ जायें तो कीटनाशक की स्प्रे करें। इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 40-50 मि.ली. या थायोमैथोक्सम 40 ग्राम या एसेटामीप्रिड 75 ग्राम प्रति एकड़ प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 
 
धब्बेदार सुंडी
धब्बेदार सुंडी : इसकी सुंडी या लार्वा हल्के हरे काले चमकदार रंग का होता है और शरीर पर काले रंग की धारियां होती हैं। सुंडी के हमले के कारण फूल निकलने से पहले ही टहनियां सूख जाती हैं और फिर झड़ जाती हैं। यह टिंडों में छेद कर देती हैं और फिर टिंडे गल जाते हैं।
 
यदि इसका हमला दिखे तो रोकथाम के लिए प्रोफैनाफॉस 50 ई सी 500 मि.ली. प्रति 200 लीटर पानी की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।