सरसों फसल की जानकारी

आम जानकारी

यह भारत की चौथे नंबर की तिलहनी फसल है और तिलहनी फसलों में सरसों का हिस्सा 28.6 प्रतिशत है। विश्व में यह सोयाबीन और ताड़ के तेल के बाद तीसरी सब से ज्यादा महत्तवपूर्ण फसल है। सरसों के बीज और इसका तेल मुख्य तौर पर रसोई घर में काम आता है। सरसों के पत्ते सब्जी बनाने के काम आते हैं। सरसों की खल भी बनती है जो कि दुधारू पशुओं को खिलाने के काम आती है। 
राजस्थान में यदि सरसों को सिंचित हालातों में उगाया जाये तो यह लाभदायक परिणाम देती है। इसे अकेले या अंतरफसली के रूप में भी उगाया जा सकता है।
 

जलवायु

  • Season

    Temperature

    22-25°C
  • Season

    Rainfall

    25-40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C
  • Season

    Temperature

    22-25°C
  • Season

    Rainfall

    25-40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C
  • Season

    Temperature

    22-25°C
  • Season

    Rainfall

    25-40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C
  • Season

    Temperature

    22-25°C
  • Season

    Rainfall

    25-40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C

मिट्टी

हल्की से भारी मिट्टी सरसों और सफेद सरसों की खेती के लिए उपयुक्त होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Aashirwad (RK 01-03): यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद 130-140 सैं.मी. होता है। इसमें तेल की मात्रा 39-42 प्रतिशत होती है यह किस्म 120-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Swarn Jyoti (RH 9801): यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद 130-140 सैं.मी. होता है। यह किस्म 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 39-42 प्रतिशत होती है इसकी औसतन पैदावार 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 
 
RGN 73: यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और सामान्य बिजाई के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद 160-170 सैं.मी. होता है। इसमें तेल की मात्रा 40-41 प्रतिशत होती है यह किस्म 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 8.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Lakshmi (RH 8812): यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और सामान्य बिजाई के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद 160-180 सैं.मी. होता है। यह किस्म 140-145 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके दाने बड़े और काले रंग के होते हैं। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होती है इसकी औसतन पैदावार 8.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
VSL 5: यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और सामान्य बिजाई के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद 165-170 सैं.मी. होता है। यह किस्म 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके दाने मध्यम और काले रंग के होते हैं। इसमें तेल की मात्रा 39-40 प्रतिशत होती है इसकी औसतन पैदावार 8-8.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Aravali (RN 393): पौधे का कद 155-165 सैं.मी. होता है। यह किस्म 135-138 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 42 प्रतिशत होती है इसकी औसतन पैदावार 8.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Vansudhara (RH 9304): यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और समय पर बोने के लिए उपयुक्त है। इसके पौधे का कद 180-190 सैं.मी. होता है। यह 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Maya (RK 9902): यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और समय पर बोने के लिए उपयुक्त है। इसके पौधे का कद 165-170 सैं.मी. होता है। यह 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 39-40 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa Jaykisan: इसके पौधे का कद 160-180 सैं.मी. होता है। यह 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 38-40 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 7.2-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa Bold: पौधा मध्यम कद का होता है। इसमें तेल की मात्रा 37-38 प्रतिशत होती है। यह किस्म 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 4.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
T 59(Varuna): इसका पौधा मध्यम कद का होता है। यह किस्म 125-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके दाने मोटे और काले रंग के होते हैं। सिंचित हालातों में यह 6-7 क्विंटल औसतन पैदावार देती है और असिंचित क्षेत्रों में 4-6 क्विंटल औसतन पैदावार देती है।
 
RH 30:  यह सिंचित और असिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। पौधे का कद 196 सैं.मी. होता है। यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है। यह 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 4.8-7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
NRCDR 02: यह उच्च पैदावार वाली किस्म है।
 
NRCHB 101: यह किस्म पिछेती बिजाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
 
NRCDR 601: यह सिंचित क्षेत्रों में समय पर बोने के लिए उपयुक्त है।
 
NRCYS-05-02: यह पीले सरसों की किस्म है।
 
Mustard 30: यह किस्म नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। ज्यादा उपज होने के साथ साथ इसका तेल भी सेहत के लिए अच्छा होता है।
 

ज़मीन की तैयारी

सीड बैड पर बोयी फसल अच्छी अंकुरित होती है। ज़मीन को देसी हल से दो या तीन बार जोताई करें और प्रत्येक जोताई के बाद सुहागा फेरें। बीजों के एकसार अंकुरित होने के लिए बैड नर्म, गीले और समतल होने चाहिए।

बिजाई

बिजाई का समय
असिंचित क्षेत्रों में बिजाई 15 सितंबर से 15 अक्तूबर तक पूरी कर लें जबकि सिंचित क्षेत्रों में बिजाई 10-25 अक्तूबर तक पूरी कर लें।
 
फासला
बिजाई के लिए पौधे से पौधे का फासला 10 सैं.मी. और कतार से कतार का फासला 30-45 सैं.मी. रखें।
 
बीज की गहराई
बीजों को 4-5 सैं.मी. गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
जब एक फसल लेनी हो तो ड्रिल विधि का प्रयोग करें और यदि अंतरफसली लेनी हो तो बिजाई के लिए बुरकाव या ड्रिल विधि का प्रयोग करें।
 
 
 

बीज

बीज की मात्रा
सूखे असिंचित क्षेत्रों के लिए 1.5-2 किलो बीजों का प्रयोग प्रति एकड़ में करें और सिंचित क्षेत्रों के लिए 1.2-1.6 किलो बीजों का प्रयोग प्रति एकड़ में करें।
 
बीज का उपचार
बीज को मिट्टी के अंदरूनी कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए बीजों को 3 ग्राम थीरम से प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचार करें। चेपा और रंगीली भुंडी से फसल को बचाने के लिए इमीडाक्लोप्रिड 8 मि.ली. से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।
 

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की संख्या को देखते हुए दो सप्ताह के अंतराल पर दो से तीन गोडाई और दो निराई करें।

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
40 75 On soil test results

 

तत्च (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
20 12-16 On soil test results

 

बिजाई के तीन से चार सप्ताह पहले 8-10 टन रूड़ी की खाद और गाय का गला हुआ गोबर मिट्टी में खादों के सही प्रयोग के लिए मिट्टी की जांच करवायें। सिंचित हालातों में 20 किलो नाइट्रोजन (40 किलो यूरिया) और 12-16 किलो फासफोरस (सुपर फासफेट 75 किलो) का प्रयोग करें। पोटाश्यिम का प्रयोग केवल मिट्टी में इसकी कमी होने पर ही करें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें और नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा पहली सिंचाई के समय डालें। दानों की उपज बढ़ाने के लिए 10-15 प्रतिशत के साथ थियोरिया 0.05 प्रतिशत की स्प्रे करें।

 

 

 

 

सिंचाई

बिजाई के 30-40 दिनों के बाद पहली सिंचाई करें और दूसरी सिंचाई बिजाई के 70-80 दिनों के बाद करें। मिट्टी की किस्म और पानी की उपलब्धता के आधार पर सिंचाई करें।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : ये कीट पौधे का रस चूसते हैं। जिस कारण पौधा कमज़ोर और छोटा रह जाता है और फलियां सूखकर छोटी रह जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए समय सिर बिजाई करनी चाहिए। नाइट्रोजन वाली खादों का प्रयोग कम करें। जब खेत में चेपे का नुकसान दिखे तो कीटनाशक जैसे थाइमैथोक्स@80ग्राम या क्विनलफॉस 250 मि.ली. या ऑक्सीडेमेटन मिथाईल 40 ग्राम को 100-125 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
चितकबरी सुंडी
चितकबरी सुंडी : यह फसल को अंकुरन और पकने के समय नुकसान करती है। यह पत्तों का रस चूसती है जिस कारण वे सूख जाते हैं। बिजाई के तीन चार हफ्तों बाद सिंचाई करने से इस कीड़े की संख्या को कम किया जा सकता है। यदि खेतों में इसका नुकसान दिखे तो मैलाथियॉन 400 मि.ली. प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
बालों वाली सूण्डी
बालों वाली सुंडी : यह सुंडी पत्तों को खाती है और उन्हें पूरी तरह नष्ट कर देती है। यदि खेत में इसका नुकसान दिखे तो मैलाथियॉन 5 प्रतिशत डस्ट 10 किलो प्रति एकड़ या डाइक्लोरवॉस 200 मि.ली. को 100-125 लीटर पानी में प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
झुलस रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
झुलस रोग : पौधे के पत्तों, फूलों, तनों और फलियों पर गहरे भूरे रंग के गोल धब्बे पड़ जाते हैं। ज्यादा हमले की सूरत में तने का ऊपर वाला हिस्सा और फलियां झड़ जाती हैं। बिजाई के लिए रोधक किस्मों का प्रयोग करें। बिमारी के आने पर इंडोफिल एम-45@400 ग्राम को 150 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो 15 दिनों के बाद एक ओर स्प्रे करें।
 
पत्तों के निचले धब्बे
पीले धब्बों का रोग : पत्तों के निचली ओर सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। पत्ते हरे और पीले रंग के हो जाते हैं। पिछली फसल के बचे कुचे को नष्ट करें। फसल और इंडोफिल एम 45, 250 ग्राम को 100 लीटर पानी के साथ प्रति एकड़ 15 दिनों के फासले पर चार बार स्प्रे करें।
 
सफेद कुंगी
सफेद कुंगी : पौधे के पत्तों, तनों और फूलों के ऊपर सफेद रंग के दाने दिखाई देते हैं। प्रभावित भाग फूल जाता है। यदि खेत में नुकसान दिखे तो रोकथाम के लिए मैटालैक्सिल 8 प्रतिशत + मैनकोजेब 64 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो 10-15 दिनों के बाद एक ओर स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

फसल पकने के लिए 110-140 दिनों का समय लेती है। फसल की कटाई फलियां पीली और बीज सख्त होने पर करें। बीजों के झड़ने को रोकने के लिए कटाई सुबह के समय करें। द्राती की मदद से बूटो को ज़मीन के नज़दीक से काटें। फिर 7-10 दिनों के लिए फसल को सूखने के लिए रखें और सूखने के बाद गहाई करें।

कटाई के बाद

साफ किए बीज चार से पांच दिनों के लिए धूप में सुखाएं या जब तक पानी की मात्रा 8 प्रतिशत तक ना आ जाये। बीजों को सुखाने के बाद बोरियों में या ढोल में डालें।