मूंगफली फसल की जानकारी

आम जानकारी

मूंगफली विश्व की तीसरी और भारत में दूसरी सबसे महत्तवपूर्ण तेल बीज फसल है। इसे कईं ओर नामों से भी जाना जाता है जैसे इर्थनुट्स, ग्राउंडनट्स, गूबर पीस,  मौकीनट्स,  पिगमीनट्स और पिगनट्स। यह लैग्यूम परिवार से संबंधित है।  किस्म और कृषि स्थितियों के आधार पर बीजों में तेल की मात्रा 44-50 प्रतिशत होती है। इसके तेल का उपयोग खाना बनाने, कॉसमैटिक, साबुन बनाना आदि के लिए किया जाता है।
भारत में यह आम तौर पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राज्यस्थान,  गुजरात,  महांराष्ट्र,  कर्नाटक,  आंध्रा प्रदेश और तामिलनाडू में उगाई जाती है। राजस्थान में चित्तौड़गढ़, सावी माधोपुर, अजमेर, जयपुर, उदयपुर, भारतपुर, जाहलावर और टोंक मुख्य मूंगफली उत्पादक जिले हैं।
 

जलवायु

  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-35°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    18-25°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-35°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    18-25°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-35°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    18-25°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-35°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    18-25°C

मिट्टी

अच्छे जल निकास और रेतली दोमट वाली ज़मीन में मूंगफली बीजी जाती है। अच्छे जल निकास वाली मिट्टी, जिसकी पी एच 6.5-7 और उपजाऊ ज़मीनों में इसकी फसल बहुत अच्छी होती है। भारी जमीनें मूंगफली के लिए अनुकूल नहीं हैं क्योंकि भारी ज़मीनों में फलियां कम भरती हैं।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

RS 1: यह फैलने वाली किस्म है। इसके मध्यम आकार के दाने होते हैं। यह किस्म 135-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RSB 103-87: यह अर्द्ध फैलने वाली किस्म है, जिसकी औसतन पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RG 510 (Raj Mungphali): यह फैलने वाली किस्म है। यह 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। मूंगफली मध्यम आकार और गुलाबी रंग की होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 10-12.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RG 425 (Raj Durga): यह अर्द्ध फैलने वाली किस्म है। यह किस्म 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। मूंगफली गुलाबी और सफेद रंग की होती हैं। असिंचित हालातों में औसतन पैदावार 6-8 क्विंटल प्रति एकड़ और सिंचित क्षेत्रों में 12-14.4 क्विंटल प्रति एकड़ देती है। 
 
Girnar 2: यह अर्द्ध फैलने वाली किस्म है। यह किस्म 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके बीज बड़े और हल्के भूरे रंग के होते हैं। सिंचित हालातों में इसकी औसतन पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
TG 37 A: यह गुच्छेदार, जल्दी पकने वाली किस्म है। यह किस्म 100-110 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह हल्की के साथ साथ भारी मिट्टी में भी उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RG 382 Durga: यह फैलने वाली किस्म है। यह 128-133 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह रेतली से दोमट मिट्टी में उगाने के लिए अनुकूल है। इसके दाने बड़े और गुलाबी रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 8.8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
RG 141: यह गुच्छेदार किस्म है। 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके दाने बड़े होते हैं और औसतन पैदावार 4-6.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
JL 24: यह गुच्छेदार, जल्दी पकने वाली किस्म है। यह 90 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी जीवित रह सकती है। यह किस्म तना गलन रोग के प्रतिरोधक है। इसकी औसतन पैदावार 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RS 138: यह अर्द्ध फैलने वाली किस्म है। यह 110-116 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। दाने गहरे गुलाबी रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 6-7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RSV 87: यह अर्द्ध फैलने वाली किस्म है। यह 1120-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह भारी मिट्टी में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके दाने गहरे गुलाबी रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 5.6-6.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GG 7: खरीफ मौसम में इस किस्म की खेती करने की सिफारिश की गई है। इसकी औसतन पैदावार 8.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GG 21: इस किस्म के बीज गहरे और भूरे आकर्षक रंग के होते हैं। इसकी फलियों की उच्च उपज होती है। इसकी गिरियों की औसतन पैदावार 4.9 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

एक वर्ष के बाद उसी खेत में मूंगफली बीजने से परहेज़ करें। मूंगफली का अंतरफसली अनाज की फसलों के साथ करें।  बिजाई से पहले खेत को साफ करें और पिछली फसल के बचे कुचे को निकाल दें। 15-20 सैं.मी. की गहराई तक ज़मीन की  जोताई करें और मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए अच्छी तरह जोताई करें। खेती करने के लिए हैरो और हल का प्रयोग करें। बीज बोने के समय 4-4.8 टन और 200 किलोग्राम नीम केक प्रति एकड़ में डालें।

बिजाई

बिजाई का समय
बारानी हालातों में मूंगफली की बिजाई मॉनसून के शुरू होने, जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के पहले सप्ताह में शुरू करें। बिजाई जितनी जल्दी हो सके पूरी कर लें, क्योंकि देरी से बिजाई करने पर पैदावार में कमी आती है।
 
फासला
खरीफ मौसम के लिए अर्द्ध फैलने वाली किस्मों का प्रयोग करें, कतारों में 40-45 सैं.मी. और पौधे से पौधे में 10-15 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें। ना फैलने वाली किस्मों के लिए कतारों में 30 सैं.मी. और पौधों में 10 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
सीड ड्रिल की सहायता से 5 सैं.मी. की गहराई में फलियों को बोयें।
 
बिजाई का ढंग
बीजों को सीड ड्रिल की सहायता से बोया जाता है।
 
ICRISAT ढंग
इस तकनीक में मूंगफली की काश्त चौड़ी मेंड़ और बैडों पर की जाती है। नाली प्रणाली  चौड़े बैडों ओर पॉलीथीन मलचिंग के प्रयोग से मूंगफली का अधिक विकास होता है। 15 सें.मी के अंतर से 60 सें.मी चौड़े बैड बनाए जाते हैं। यदि ज़मीन का क्षेत्र 4.5x6.0 मीटर है तो पांच बैड बनाए जा सकते हैं। बैड बनाने और खाद डालने के बाद काले रंग की पॉलीथीन की चादर बिछा देनी चाहिए। सात माइक्रोन 20 किलो पॉलीथीन की चादर प्रति एकड़ के लिए प्रयोग की जाती है। चादर बिछाने से पहले उस में 30x10 सें.मी के छेद बना देने चाहिए। इस विधि में बीज की मात्रा सामान्य खेती में बीज की मात्रा के समान ही रखी जाती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
किस्म के आधार पर बिजाई के लिए एक एकड़ खेत में 38-40 किलोग्राम बीजों का प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
बिजाई के लिए सेहतमंद गिरियों का प्रयोग करना चाहिए। सूखी छोटी और बीमारी वाली गिरियां बिजाई के लिए प्रयोग ना करें। मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए गिरियों को 5 ग्राम थीरम प्रति किलो या 2-3 ग्राम कप्तान प्रति किलो या 4 ग्राम मैनकोजेब प्रति किलो या कार्बोक्सिन या कार्बनडैज़िम 2 ग्राम प्रति किलो से उपचार कर लें । रासायनिक उपचार करने के बाद बीज को 4 ग्राम टराईकोडरमा विराइड या स्यूडोमोनास फ्लूरोसैंस 10 ग्राम प्रति किलो से उपचार कर लें । बीज उपचार जड़ गलन और तना बीमारियों से नए पौधों की सुरक्षा होती है।
 
 निम्नलिखित में से किसी एक फंगसनाशी या कीटनाशी का प्रयोग करें।
 
फंगसनाशी/कीटनाशी दवाई मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज)
Carbendazim 2gm
Captan 2-3gm
Thiram 5gm
Mancozeb 4gm
Chlorpyriphos 20EC 12.5ml
 

खरपतवार नियंत्रण

अच्छी पैदावार लेने के लिए पहले 45 दिन फसल को नदीनों से बचाना बहुत जरूरी होता है। दो बार फसल में गोडाई करनी चाहिए पहली बीजने के तीन सप्ताह बाद और दूसरी पहली गोडाई के तीन सप्ताह बाद फ्लूक्लोरालिन 600-800 मि.ली.प्रति एकड़ या पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति एकड़ नदीनों के पैदा होने से पहले स्प्रे करें।
मिट्टी चढ़ाना : यह एक जरूरी प्रक्रिया है, जो कि बीजने के 40-45 दिनों के बाद की जाती है। इसकी मदद से पौधे आसानी से मिट्टी में चले जाते हैं जिससे फलियों के विकास में वृद्धि होती है।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
9-18 50-100 13-26

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
4-8 8-16 8-16

 

मिट्टी की जांच के आधार पर खादों की मात्रा डालें। मूंगफली की पूरी फसल को नाइट्रोजन 4-8 किलो (यूरिया 9-18 किलो), फासफोरस 8-16 किलो (एस एस पी 50-100 किलो) और पोटाश 8-16 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 13-26 किलो) प्रति एकड़ में डालें।
सिंचित क्षेत्रों में बिजाई से एक या दो सप्ताह पहले जिप्सम 100 किलो प्रति एकड़ में डालें और फिर सिंचाई करें। जिप्सम डालने से फलियां बनने में वृद्धि होती है और फलियां अच्छे से भरती है। मोटे बीजों वाली किस्मों से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए जिप्सम 160 किलो प्रति एकड़ में डालें।
 
पानी में घुलनशील खादें : फलियों के बेहतर भरने के लिए तत्वों के घोल की स्प्रे करना बहुत महत्तवपूर्ण होता है। यह घोल DAP 2-5 सुबह इसे छान लिया जाता है और 32 लीटर के लगभग घोल तैयार होता है। इसे पतला करने के लिए 234 लीटर पानी मिलाया जाता है। जिससे एक एकड़ में स्प्रे करने के लिए 200 लीटर घोल तैयार हो जाता है। प्लैनोफिक्स 4 मि.ली को 15 लीटर पानी में मिलाकर भी स्प्रे किया जा सकता है। यह स्प्रे बिजाई के बाद 25वें और 35वें दिन करें।
 

 

 

सिंचाई

फसल की अच्छी वृद्धि के लिए मौसमी वर्षा के आधार पर दो या तीन बार सिंचाई करनी आवश्यक है। फूल बनने, फली के विकास का समय सिंचाई के लिए नाज़ुक समय होता है। इन अवस्थाओं के समय पानी की कमी ना होने दें।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : कम वर्षा पड़ने की हालत में इस कीड़े का हमला बहुत गंभीर हो जाता है। यह काले रंग के छोटे कीड़े बूटों का रस चूसकर कमज़ोर ओर पीले रंग के कर देते हैं। यह पौधे पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ देते हैं। जो फंगस लगने के कारण काला हो जाता है।
इसे रोकने के लिए रोगोर 300 मि.ली. या इमीडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस एल 80 मि.ली. या मिथाइल डेमेटन 25 प्रतिशत ई सी 300 मि.ली को चेपे के लक्षण दिखने पर स्प्रे करें।
 
सफेद सुंडी
सफेद सूण्डी : यह कीट जून जुलाई में पहले बारिश से मिट्टी में से निकलता है। यह कीट आस पास के वृक्ष जैसे कि बेर, अमरूद, अंगूर की बेल और बादाम आदि पर इकट्ठे होते हैं और रात को पत्तों को खाती है।यह मिट्टी में अंडे देती हैं और उनमें से निकली सफेद सूण्डी मूंगफली की छोटी जड़ों या जड़ों के बालों को खा जाती हैं।
 
इसकी प्रभावित रोकथाम के लिए खेत की मई जून में दो बार जोताई करें ताकि सारे कीड़े ज़मीन से बाहर आ जाएं। फसल जहां तक हो सके अगेती बोयें। बिजाई से पहले बीज को 12.5 मि.ली. कलोरोपाइरीफॉस 20 ई.सी. प्रति किलो गिरियों के हिसाब से उपचार करें । 200 ग्राम कार्बरिल 100 लीटर पानी में घोल कर सूण्डियों पर छिड़काव करें । यह छिड़काव हर बारिश के बाद जुलाई के मध्य करें । बिजाई समय 4 किलो फोरेट या 13 किलो कार्बोफिउरॉन प्रति एकड़ मिट्टी में मिलाएं ।
 
दीमक
बालों वाली सूण्डी : यह कीड़े गिनती में बढ़ने के कारण फसल का बहुत नुकसान करते हैं और पैदावार कम कर देते हैं। छोटी उम्र की भूरी और लाल सूण्डियां झुण्डों में फसल को खाती हैं।
 
 इस कीट के पतंगों को मारने के लिए 3 या 4 रोशनी यंत्रों का प्रयोग करें। अण्डों के झुण्ड को इकट्ठा करके मार दें। सूण्डियों के फैलने को रोकने के लिए कीड़ों से प्रभावित खेत में 30 से.मी. गहरे और 25 से.मी. चौड़े गड्ढे खोदें । सारे खेत में  ज़हर की गोलियां शाम के समय बिखेर दें । जहरीली गोलियां बनाने के लिए 10 किलो चावल का आटा 1 किलो गुड़ और 1 किलो क्यूनोफॉस मिला दें । बड़ी सूण्डियों को मारने के लिए 200 मि.ली. डाईक्लोरोईस 100 ई.सी. 400 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
मूंगफली के पत्तों का सुरंगी कीट
मूंगफली पत्ता छेदक : छोटी सूण्डियां पत्तों में सुराख कर देती हैं और पत्तों पर जामुनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। सूण्डियां पत्ते में छेद करके उस के अंदर रहती हैं। गंभीर नुकसान में खेत खराब हुआ दिखाई देता है। 
इस कीड़े के पतंगों को मारने के लिए 12 रोशनी यंत्रों का प्रयोग करें। डाईमैथोएट 30 ई.सी. 300 मि.ली. या 50 ई.सी. 400 मि.ली. मालाथियोन या मिथाईल डीमीटिन प्रति एकड़ का प्रयोग करें।
 
दीमक
दीमक : यह कीट फसल की जड़ों और तने के नीचे भागों का नुकसान करता है  और पौधे की मौत हो जाती है। दीमक मूंगफली में छेद कर देता है और गिरियों को नुकसान करता है। गंभीर नुकसान होने से पौधा सूखना शुरू हो जाता है। अच्छी तरह गली हुई रूड़ी का प्रयोग करना चाहिए। फसल की कटाई देर से ना करें। बीज को 6.5 मि.ली. क्लोरोपाइरीफॉस प्रति किलो से उपचार से दीमक का खतरा कम हो जाता है। विशेष खतरे वाले इलाकों में 2 लीटर क्लोरोपाइरीफॉस प्रति एकड़ बीज बीजने पर मिट्टी में डालें।
 
फली छेदक
फली छेदक : छोटे बूटों में छेद करके मल से भरी दिखाई देती हैं। सूण्डियां पहले सफेद रंग की होती हैं ओर फिर भूरे रंग की हो जाती हैं। 
 
गंभीर इलाकों में मैलाथियोन 5 डी 10 किलो प्रति एकड़ या कार्बोफिरॉन 3 प्रतिशत सी जी 20 किलोग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में बिजाई से 40 दिन पहले डालें।
 
टीका और पत्तों के ऊपर धब्बा रोग
  • बीमारियां और उनकी रोकथाम
पत्तों के ऊपर धब्बों का रोग : पत्ते के ऊपरी हिस्से पर गोल धब्बे और आस पास पीले रंग के चक्र होते हैं। 
 
इस बीमारी से बचाने के लिए सही बीज का चुनाव करना चाहिए। सेहतमंद और बेदाग गिरियों को ही प्रयोग करना चाहिए। बीजने से पहले बीज को 5 ग्राम थीरम या 3 ग्राम इंडोफिल एम 45 प्रति किलो गिरी के हिसाब से उपचार करें। फसल के ऊपर सलफेट प्रति एकड़ 500 से 750 ग्राम 200-300 लीटर पानी में मिलाके छिड़काव करें। यह छिड़काव अगस्त के पहले सप्ताह में शुरू करें और कुल 3-4 छिड़काव 5-15 दिनों के फासले पर करें। सिंचित फसल के लिए 50-60 ग्राम बाविस्टिन/डैरोसिल 50 डब्लयू.पी. स्प्रे को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। जब फसल 40 दिनों की हो जाए तब 15-15 दिनों के फासले पर तीन छिड़काव करें।
 
बीज गलन या जड़ गलन
बीज का गलना : यह बीमारी फंगस के कारण पैदा होती है। फंगस से नए बूटे मिट्टी में निकलने के समय गल जाते हैं और मर जाते हैं। इससे बचने के लिए बीज का उपचार बहुत जरूरी होता है। बीज को 3 ग्राम कप्तान या थीरम प्रति किलो से उपचार करें।
 
आल्टरनेरिया झुलस रोग
झुलस रोग : पौधे के पत्तों पर हल्के भूरे रंग और काले रंग के गोल धब्बे पड़ जाते हैं। ज्यादा हमले की हालत में तने का ऊपरी हिस्सा और फलियां झड़ जाती हैं पत्ते के ऊपर छोटी, गोल ओर पानी से भरी धारियां होती हैं। 
 
फसल के हमले के समय 3 ग्राम मैनकोजेब प्रति लीटर या 3 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड प्रति एकड़ कार्बनडैज़िम प्रति लीटर का प्रयोग करना चाहिए।
 
कुंगी
कुंगी : पत्तों के नीचे की ओर सफेद और बादामी रंग के दाने से बन जाते हैं। यह पौधे के प्रत्येक हिस्से पर होती है। बीमारी फूल से लेकर मूंगफली तक पहुंच जाती है। बीमारी वाले पौधों के हिस्से मोटे और सूख जाते हैं पर पौधे से लगे रहते हैं। 
 
बीमारी आने पर रोकथाम के लिए 400 ग्राम मैनकोजेब या 400 ग्राम कलोरीथिनोल या 1000 ग्राम घुलनशील सल्फर प्रति एकड़ स्प्रे करें। जरूरत पड़ने पर दूसरी स्प्रे 15 दिनों के बाद करें।
 

कमी और इसका इलाज

पोटाशियम की कमी:
पत्ते पूरी तरह से नहीं बढ़ते और सही आकार नहीं लेते। पत्तों के सिरे और किनारों पर पीलापन आ जाता है। पोटाशियम की कमी के लिए म्यूरेट ऑफ पोटाश खाद 16-20 किलो प्रति एकड़ में डालें।
 
कैल्शियम की कमी:
यह कमी ज्यादातर हल्की मिट्टी में और ज्यादा पी एच वाली मिट्टी में होती है। इसकी कमी से पौधे पूरी तरह नहीं बढ़ते और मुड़े हुए नज़र आते हैं। कैल्शियम की कमी के लिए जिप्सम 200 किलो प्रति एकड़ पैग फॉरमेशन की हालत में प्रयोग करें।
लोहे की कमी:
यदि ज्यादा कमी हो तो सल्फेट 5 ग्राम + सिटरिक एसिड 1 ग्राम प्रति लीटर पानी से एक सप्ताह के फासले पर स्प्रे करते रहें। स्प्रे तब तक जारी रखें जब तक कमी पूरी ना हो जाये।
 
जिंक की कमी:
इसकी कमी से पौधे के पत्ते गुच्छे की शक्ल में आ जाते हैं। पत्तों का विकास रूक जाता है और छोटे नज़र आते हैं। जिंक की कमी के लिए जिंक सल्फेट 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। यह स्प्रे 7 दिनों के फासले पर 2-3 बार करते रहें।
 
सल्फर की कमी:
जवान पौधे का विकास रूक जाता है और कमी से पौधे छोटे नज़र आते हैं उनपर भी पीलापन आ जाता है। पौधे के पकने में देरी होती है।
सल्फर की कमी से बचाव के लिए जिप्सम 200 किलो प्रति एकड़ पौधे लगाने के समय प्रयोग करें।
 

फसल की कटाई

फलियां पीली पड़ने और पत्ते गिरना फसल की कटाई का सही समय होता सही कटाई के समय मिट्टी और फसल में पूर्ण नमी होनी चाहिए ताकि फसल ज्यादा पकने से बच जाये। उखाड़ी गई फसल के छोटे छोटे ढेरों को कुछ दिनों के लिए खेत में पड़े रहने दें। इसके बाद फसल को एक स्थान से इकट्ठी करके रोजाना दो तीन बार 2-3 दिनों के लिए तरंगली से झाड़ते रहें और टांगर से मूंगफली और पत्ते अलग कर लें। मूंगफली और पत्तों को इकट्ठा करके ढेरी लगा दें। 4-5 दिनों तक संभालने से पहले धूप में सुखा लें। 
 
 

कटाई के बाद

मूंगफली को साफ और छांट कर बोरियों में भर दें। हवा के अच्छे बहाव के लिए 10 बोरियों को चिनवा दें। बोरियों को गलने से बचाने के लए बोरियों के नीचे लकड़ी के टुकड़े रख दें।
 
गिरियां तैयार करना : भारत कच्ची गिरियों के साथ साथ खाने वाली गिरियों, पक्की नमक वाली गिरियों, तली हुई गिरियों और सूखी गिरियों के लिए भी जाना जाता है।