धनिये की फसल

आम जानकारी

धनिया भारत की एक महत्तवपूर्ण मसाले वाली फसल है। इसके बीजों, तने और पत्तों का प्रयोग अलग अलग पकवानों को सजाने और स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। इसके पत्तों में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता है। घरेलू नूस्खों में इसका प्रयोग दवाई के तौर पर किया जाता है। इसे पेट की बिमारियों, मौसमी बुखार, उल्टी, खांसी और चमड़ी के रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है। भारत धनिये के बीजों  का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक है।भारत में इसकी सब से ज्यादा खेती राजस्थान में की जाती है। मध्य प्रदेश, आसाम, और गुजरात में भी इसकी खेती की जाती है। पूरे देश में राजस्थान 44 प्रतिशत धनिये का उत्पादन करता है। राजस्थान में कोटा मुख्य धनिया उत्पादक जिला है। इसके अलावा एस माधोपुर, बरन झालावाड़, चितौड़गढ़, करौली मुख्य धनिया उत्पादक राज्य हैं।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    10-15°C
  • Season

    Rainfall

    75-100mm
  • Season

    Sowing Temperature

    22-28°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    10-26°C
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    10-15°C
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    10-26°C
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    10-26°C

मिट्टी

इसे मिट्टी की कई किस्मों, जिनमें कार्बनिक पदार्थ उचित मात्रा में होते हैं, में उगाया जा सकता है, पर यह अच्छे निकास वाली दोमट या रेतली दोमट मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। इसके अच्छे विकास के लिए मिट्टी की पी एच 6 से 8 की आवश्यकता होती है। लवण वाली और क्षारीय मिट्टी धनिये की खेती के लिए अनुकूल नहीं होती।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

CS 6: यह उच्च उपज वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 4.12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Acr 1: यह किस्म 140-145 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह तना पित्त गलन के प्रतिरोधी किस्म है। इस किस्म की वृद्धि बाकी किस्मों की वृद्धि से ज्यादा होती है। इसकी औसतन पैदावार 4.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RCr 20: यह किस्म 100-110 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म राजस्थान की बारानी और भारी मिट्टी वाले क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म तना पित्त रोग के प्रतिरोधी है और इसके दाने मोटे होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 3.6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

RCr 41: यह किस्म 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 3.7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RCr 435: यह जल्दी उगने वाली किस्म है। यह 110-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके बीज मोटे, मध्यम आकार के होते हैं। यह सिंचित क्षेत्रों में बोने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म जड़ गलन और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों के प्रतिरोधी किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 4.2 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RCr 436: यह जल्दी उगने वाली किस्म है। यह 90-100 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके बीज मोटे होते हैं। यह किस्म जड़ गलन और नेमाटोड के प्रतिरोधी किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 4.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RCr 446: इसके बीज मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म तना पित्त रोग के प्रतिरोधी है। इसकी औसतन पैदावार 4.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
GC 1: इसके दाने मध्यम आकार के, गोल और पीले रंग के होते हैं। यह किस्म 112 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म सूखा और पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों को सहनेयोग्य है। इसकी औसतन पैदावार 4.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GC 2: यह किस्म लंबी और अर्द्ध फैलने वाली है, इसके मध्यम आकार के दाने होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 5.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CO 1: यह छोटे कद की किस्म है। इसके बीज छोटे आकार के, भूरे रंग के दाने होते हैं। यह किस्म 100-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 2 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CO 2: यह मध्यम आकार की पीले भूरे दानों वाली किस्म है। यह किस्म 90-100 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 2.08 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Sindhu: यह किस्म 100 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 4.2 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

सब से पहले ज़मीन की दो तीन बार हल से अच्छी तरह जोताई करें। इसके बाद सुहागे की मदद से ज़मीन को समतल कर देना चाहिए। आखिरी बार हल जोतने से पहले ज़मीन में 40 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से रूड़ी की खाद मिलानी चाहिए।

बिजाई

बिजाई का समय
धनिया रबी के मौसम की फसल है। इसकी बिजाई के लिए 15 अक्तूबर से 15 नवंबर का समय अनुकूल होता है।

फासला
कतार से कतार का 30 सैं.मी. या पौधे से पौधे का 15 सैं.मी. फासला रखें।
 
बीज की गहराई
बीज की गहराई 3 सैं.मी. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
 
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई के लिए पोरा ढंग का प्रयोग किया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 8-10 किलो बीजों का प्रयोग करें।
बीज का उपचार
जल्दी अंकुरन के लिए बीजों को बिजाई से पहले अच्छी तरह रगड़ लेना चाहिए ताकि इसके ऊपर की ओर से अनावश्यक छिल्कें उतर जायें। बिजाई से पहले बीजों को 8 से 12 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रख देना चाहिए। फसल को जड़ गलन और पौधे सूखने की बिमारी से बचाने के लिए बीजों को 4 ग्राम टराइकोडरमा विराइड स्यूडोमोनास फलोरसैंस प्रति किलोग्राम बीज में मिला देना चाहिए।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
80 75 15

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN
PHOSPHORUS POTASH
40 12 8

 

खेत की तैयारी के समय गाय का गला हुआ गोबर 4-8 टन प्रति एकड़ में डालें।  धनिये की पूरी फसल को नाइट्रोजन 25 किलो (55 किलो यूरिया), फासफोरस 12 किलो (एस एस पी 75 किलो), पोटाश 8 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 15 किलो ) प्रति एकड़ में डालें। फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन को बिजाई के बाद दो हिस्सों में पहला 30वें दिन और दूसरा 75वें दिन डालें। जब फसल को बीज उद्देश्य के लिए उगाया जाये तो नाइट्रोजन 30 किलो प्रति एकड़ में डालें। 65 किलो नाइट्रोजन को दो भागों में बिजाई के समय आधी और बाकी बची नाइट्रोजन को फूल निकलने के समय डालें। 
 
मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा जानने के लिए हमेशा मिट्टी की जांच करवायें।
 
फसल के जल्दी विकास के लिए बिजाई के 15 से 20 दिन बाद 20 मि.ली. टराईकोटानोल हारमोन को 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। फसल के अच्छे ओर तेज विकास के लिए NPK (19:19:19)@75gm की दर के हिसाब से 15 लीटर पानी में घोल तैयार करके बिजाई के 20 दिनों के बाद स्प्रे करना चाहिए। अनुकूल पैदावार के लिए बिजाई के 40 से 50 दिन बाद 50 मि.ली. बरासीनोलाइड को 150 लीटर पानी में घोल तैयार करके प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। दूसरा स्प्रे 10 दिनों के बाद करना चाहिए। 45 ग्राम मोनो अमोनियम फासफेट 12:61:00 को 15 लीटर पानी में घोलकर पौधों के तनों के ऊपर छिड़काव करना चाहिए। यह पौधे के अच्छे विकास और प्रफुल्लता के लिए लाभदायक होता है।
 

 

 

खरपतवार नियंत्रण

बिजाई के पहले पड़ाव के समय धनिये की फसल के लिए नदीन गंभीर समस्या होते हैं। नदीनों की रासायनिक रोकथाम के लिए बूटीनाशकों जैसे पैंडीमैथालीन 1 लीटर या फ्लूक्लोरालिन 800 मि.ली को प्रति एकड़ में डालें। पहली गोडाई बिजाई से 4 सप्ताह बाद और दूसरी 5 से 6 सप्ताह बाद करनी चाहिए।

सिंचाई

धनिये की अच्छी फसल के लिए मिट्टी की किस्म, बारिश और वातावरण के अनुसार चार से पांच बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है। पहली सिंचाई बिजाई के 30 दिनों के बाद करनी चाहिए। इसके बाद 60 से 70, 80 से 90, 100 से 105 और 110 से 150 दिनों के बाद सिंचाई करनी चाहिए। फसल को फूल और फल लगने के समय ज़मीन में आवश्यक नमी बनाई रखना बहुत जरूरी होता है।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीड़े और रोकथाम
चेपा : फसल के ऊपर इस कीड़े का हमला दिखाई देने पर 6 मि.ली. इमीडाक्लोप्रिड या 4 ग्राम थाइमैथेाक्सम को 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।
 
पत्तों के धब्बा रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर सफेद धब्बे : इसका हमला होने पर धनिये के पत्तों के ऊपर की तरफ सफेद रंग के धब्बे पड़ने शुरू हो जाते हैं।
इसके लक्ष्ण दिखाई देने पर 20 ग्राम  घुलनशील सलफेट को प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर 10 दिनों के फासले पर फिर छिड़काव करना चाहिए। या 100 मि.ली. पैनकोनाज़ोल 10 ई.सी. का प्रति 200 लीटर पानी में घोल तैयार करके छिड़काव करना चाहिए।
 
दानों का गलना
दानों का गलना : बीजों को लगने वाली फफूंदी से बचाने के लिए बिजाई के 20 दिनों बाद 400 ग्राम कार्बेनडाज़िम का प्रति एकड़ के हिसाब से छिट्टा देना चाहिए।
 
जड़ गलन
जड़ गलन : फसल की जड़ को गलने से बचाने के लिए 60 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से नीम का पेस्ट मिट्टी में मिलाना चाहिए। इसके इलावा बीजों में 4 ग्राम/kg of seeds टराईकोडरमा विराइड मिलाना चाहिए। जड़ गलन के लक्ष्ण दिखाई देने पर मिट्टी में 5 ग्राम कार्बेनडाज़िम या 2 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का एक प्रति लीटर पानी में घोल तैयार करके मिट्टी में डालना चाहिए।
 

फसल की कटाई

फसल की ऊंचाई 20 से 25 सैं.मी. की होने पर हरे पत्तों को काटना शुरू कर देना चाहिए। एक फसल को तीन से चार बार काटा जा सकता है। बीज की पैदावार के लिए बीजी गई फसल अप्रैल महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। फसल के फल हरे रंग में ही काट लेने चाहिए। क्योंकि ज्यादा पकने की सूरत में इसका पूरा मूल्य नहीं मिल पाता।

कटाई के बाद

कटाई के बाद 6-7 दिनों के लिए फसल को धूप में सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए। पूरी तरह सूखने के बाद फसल की गहाई करके बीजों को साफ करके अलग कर लेना चाहिए।