भारत में मोठ दाल की फसल

आम जानकारी

मोठ दाल को तुर्की दाल या मटकी के रूप में भी जाना जाता है। यह अर्द्ध शुष्क और शुष्क क्षेत्रों की महत्तवपूर्ण फसल है। इस फसल को कई उद्देश्यों के लिए जैसे भोजन, चारे के लिए और हरी खाद के लिए भी प्रयोग किया जाता है। यह फाइबर आहार का उच्च स्त्रोत है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 24 प्रतिशत होती है। राजस्थान, मोठ का मुख्य उत्पादक राज्य है जहां लगभग 86 प्रतिशत क्षेत्र में मोठ की खेती की जाती है। राजस्थान के अलावा इसकी खेती गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र में भी की जाती है। पंजाब, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में इसकी खेती छोटे स्तर पर की जाती है। राजस्थान में चुरू, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, बड़मार, श्रीगंगा नगर, सिकर, जलौर और जयपुर मोठ के मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।

मिट्टी

यह पौधा मिट्टी की विभिन्न किस्मों में उगाया जा सकता है। इसे अच्छे निकास वाली रेतली मिट्टी जो हल्की उपजाऊ और हल्के कार्बनिक पदार्थों वाली हो, में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। क्षारीय और नमक वाली मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

RMO 257: यह 63-65 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके पौधे का कद 33 सैं.मी. होता है। यह किस्म पीले चितकबरे रोग और सफेद मक्खी की प्रतिरोधक है।
 
RMO 40: इसके पौधे का कद 30-40 सैं.मी. होता है। यह किस्म 62 से 65 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह पानी की कमी वाले हालातों को सहन कर सकती है। इसकी औसतन पैदावार 2.4-3.6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RMO 435: यह पानी की कमी वाले हालातों को सहन कर सकती है। इस किस्म का पौधा कटाई के समय भी हरा ही रहता है।
 
RMO 225: यह जल्दी उगने वाली किस्म है। यह 65-67 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह दानों के साथ साथ चारे के उद्देश्य के लिए भी अनुकूल है। इसके दानों की औसतन उपज 2-3.2 क्विंटल और चारे की औसतन उपज 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RMO 423: यह किस्म राजस्थान के मोठ उगाने वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसे दानों के साथ साथ चारे के उद्देश्य के लिए भी अनुकूल है। यह पीले चितकबरे रोग के प्रतिरोधक है और पानी की कमी वाले हालातों को सहन कर सकती है।
 
FMO 96: यह किस्म 58-59 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म बेचने के लिए और अंतरफसली के लिए उपयुक्त है।
 
CAZRI Moth 3: यह किस्म 60-62 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म अधिक सूखे को भी सहन कर सकती है। इसकी औसतन पैदावार 3 से 4.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CAZRI Moth 2: यह किस्म 66-68 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 3 से 4.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CAZRI Moth 1: यह किस्म 73-75 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 3 से 4.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Maru Moth: यह अर्द्ध फैलने वाली किस्म है। यह पूरे राजस्थान में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म 80-85 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह पत्तों के धब्बा रोगों की प्रतिरोधक किस्म है।
 
IPCMO 800: यह किस्म 80-85 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह पश्चिमी राजस्थान में उगाने के लिए उपयुक्त है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
Jadia: यह किस्म 85-90 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह मोठ उगाने वाले सभी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म पीले चितकबरे रोग के संवेदनशील होती है।
 
Jawala: यह किस्म 85-90 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीले चितकबरे रोग के प्रतिरोधी होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

खेत की जोताई करें और दो-तीन बार हैरो फेरें। प्रत्येक जोताई के बाद मिट्टी को समतल करें। राजस्थान में मोठ की खेती रेतली मिट्टी में की जाती है इसलिए कम से कम खेत की तैयारी की जरूरत होती है।

बिजाई

बिजाई का समय
मोठ की बिजाई मॉनसून के शुरू होने पर की जा सकती है। देरी से और अपर्याप्त बारिश होने पर बिजाई बढ़ाकर अगस्त महीने में की जा सकती है।
 
फासला
कतार से कतार में 30 सैं.मी. और पौधे से पौधे में 15-20 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को मिट्टी में 3-5 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
बिजाई सीड ड्रिल की सहायता से की जा सकती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
जब बीजों को दानों के उद्देश्य के लिए बोया जाता है तो 5-7 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें और चारे उद्देश्य के लिए इससे दोहरी बीज मात्रा का प्रयोग करें।
बीज का उपचार
बिजाई से पहले थीरम या कप्तान 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद राइज़ोबियम 25 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यह नाइट्रोजन को स्थिर रखने में मदद करेगा।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
26-52 75-125 -

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
12-24 12-20 -

 

खेत की तैयारी के समय 60-80 क्विंटल गाय का गला हुआ गोबर प्रति एकड़ में डालें। इससे मिट्टी में पानी को बांध कर रखने की क्षमता बढ़ती है। पूरी फसल को नाइट्रोजन 12-24 किलो (यूरिया 26-52 किलो) और फासफोरस 12-20 किलो (एस एस पी 75-125 किलो) प्रति एकड़ में प्रयोग करें। बिजाई के समय नाइट्रोजन और फासफोरस डालें। 

 

 

खरपतवार नियंत्रण

खेत को साफ और नदीन मुक्त रखें। पहली गोडाई बिजाई के तीन से चार सप्ताह बाद करें। रासायनिक तरीके से नदीनों की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले फ्लूक्लोरालिन 800 मि.ली. प्रति एकड़ में डालें।

सिंचाई

क्योंकि यह बारानी फसल है। इसलिए इसे सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। सिंचाई तब करें जब ज़मीन शुष्क हो।

पौधे की देखभाल

रस चूसने वाले कीड़े (हरा तेला, चेपा और सफेद मक्खी)
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
रस चूसने वाले कीड़े (चेपा, तेला, सफेद मक्खी) :  यदि इसका हमला दिखे तो मैलाथियॉन 375 मि.ली. या डाइमैथोएट 250 मि.ली. या ऑकसीडेमेटन मिथाइल 250 मि.ली को प्रति एकड़ में डालें।
 
सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए थाइमैथोक्सम 40 ग्राम या ट्राइज़ोफॉस 200 मि.ली. को प्रति एकड़ में डालें। यदि जरूरत पड़े तो पहली स्प्रे के 10 दिनों के बाद दूसरी स्प्रे करें।
 
फली छेदक सुंडी
फली छेदक : यह गंभीर कीट है और उपज को भारी नुकसान पहुंचाता है। यदि इसका हमला दिखे तो इंडोक्साकार्ब 14.5 एस सी 200 मि.ली या एसीफेट 75 एस पी 800 ग्राम या स्पिनोसैड 45 एस सी 80 मि.ली. को प्रति एकड़ में डालें। दो सप्ताह के बाद दूसरी स्प्रे करें।
 
पीला चितकबरा रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
पीला चितकबरा रोग : यह सफेद मक्खी के कारण फैलता है। पत्तों पर अनियमित, हरे रंग के धब्बे देखे जा सकते हैं। प्रभावित पौधों पर फलियां विकसित नहीं होती।
 
पीले चितकबरे रोग की प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें। सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए डाइमैथोएट 200 मि.ली. प्रति 150 लीटर या थाइमैथोक्सम 40 ग्राम प्रति एकड़ में स्प्रे करें। यदि आवश्यकता पड़े तो पहली स्प्रे के 10 दिनों के बाद दूसरी स्प्रे करें।
 
बैक्टीरियल पत्तों के धब्बे
बैक्टीरियल पत्तों के धब्बे : पत्तों पर बहुत छोटे अनियमित धब्बे देखे जा सकते हैं। ज्यादा हमला होने पर पत्ते गिरने लग जाते हैं और तने और फलियों पर भूरे रंग के धब्बे देखे जा सकते हैं।
 
बैक्टीरियल पत्तों के धब्बा रोगों की प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें। बिजाई से पहले स्ट्रैप्टोसाइकलिन 0.1 ग्राम प्रति लीटर पानी + कप्तान 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यदि इसका हमला दिखे तो  ब्लीटॉक्स 3 ग्राम प्रति लीटर पानी या ब्लीटॉक्स 3 ग्राम प्रति लीटर + कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 

 

पत्तों के धब्बा रोग
पत्तों के ऊपरी धब्बे रोग : पत्तों के ऊपर सफेद रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। ज्यादा हमला होने पर पूरे तने और पत्तों पर सफेद रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। पत्ते आकार में छोटे और पीले रंग के आते हैं।
 
यदि खेत में इसका हमला दिखे तो पानी में घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो 10 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

कटाई का सही समय तब होता है जब पत्ते सूखने लग जाएं और फलियां हल्की पीली हो जायें। फसल की जड़ों को धूप में 4-5 दिन के लिए सुखायें। सुखाने के बाद फलियों में से दाने अलग कर लें।

कटाई के बाद

दानों को फलियों में अलग कर लें और धूप में सुखायें। जब बीजों में नमी की मात्रा 8-10 प्रतिशत रह जाये तब बीज भंडारण के लिए तैयार होते हैं। अच्छे से सुखाने के बाद बीजों  को हवा बंद बोरियों में भरें।