राजस्थान में कुल्थी   की फसल

आम जानकारी

यह एक दलहनी फसल है, जो कि बारानी और कम उपजाऊ भूमि में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसका वानस्पतिक नाम मैकरोटाइलोमा यूनीफलोरम है। इसे खाना पकाने के उद्देश्य से उपयोग किया जाता है और इसे ताजा अंकुरित दाल के रूप में भी खाया जा सकता है। इसमें 22-23 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा होती है। प्रोटीन की मात्रा उच्च होने के कारण इसे पशुओं के भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके काफी स्वास्थ्य लाभ भी हैं। इसका उपयोग सर्दी और खांसी, मधुमेह, पथरी, कब्ज, ब्रोंकाइटिस, सामान्य बुखार और मूत्र रोगों के इलाज करने के लिए किया जाता है।

मिट्टी

यह काली कपास मिट्टी, दोमट मिट्टी और चिकनी मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। यह पथरीली मिट्टी में भी जीवित रह सकती है। इसकी उच्च तेजाबी या क्षारीय मिट्टी में खेती करने से परहेज़ करें।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

KS 2 (1991): यह जल्दी पकने वाली किस्म है जो 80-90 दिनों में परिपक्व हो जाती है। यह किस्म शुष्क क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके मध्यम आकार के बीज होते हैं जो भूरे रंग के होते हैं। बारानी क्षेत्रों में इसकी औसतन पैदावार 2.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
दूसरे राज्यों की किस्में
 
CO 1 (1953): यह किस्म 110 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसके पौधे का कद 30-40 सैं.मी. होता है। इसके दाने चमड़े के रंग जैसे होते हैं (100 दानों का भार 4.6 ग्राम)। यह किस्म बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 3-4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Paiyur 1 (1988): यह किस्म 110 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसके पौधे का कद 35-40 सैं.मी. होता है। इसके दाने हल्के भूरे रंग के होते हैं (100 दानों का भार 3.4 ग्राम)। यह किस्म बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 4-4.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Paiyur 2 (1998): यह किस्म 110-105 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसके पौधे का कद 40-45 सैं.मी. होता है। इसके दाने हल्के भूरे रंग के होते हैं (100 दानों का भार 3.56 ग्राम)। यह किस्म बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 3.5-4.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

कुल्थी की खेती के लिए मिट्टी के भुरभुरा होने तक 3-4 बार जोताई की आवश्यकता होती है।

बिजाई

बिजाई का समय
बीजों को मॉनसून के मौसम में जुलाई से सितंबर महीने में उगाया जाता है।
 
फासला
कतार से कतार में 30 सैं.मी. और पौधे से पौधे में 10-15 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को 1.5-2 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
गड्ढा खोदकर
बुरकाव विधि
 

 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ में 8-10 किलो बीजों का प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए किसी भी फंगसनाशी जैसे कार्बेनडाज़िम या थीरम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। 
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA PHOSPHORUS POTASH
8 16 #

 

खेत की तैयारी के समय अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद 50 क्विंटल प्रति एकड़ में मिट्टी में डालें। यूरिया 8 किलो, फासफोरस 16 किलो प्रति एकड़ में खाद का प्रयोग करें। इस फसल के लिए पोटाश की जरूरत नहीं होती।

 

सिंचाई

खेत में नमी रखने के लिए तुरंत सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बीज बोने के तुरंत बाद दें। अगली, जीवन बचाव सिंचाई बीज बोने के तीसरे दिन करें। इन सिंचाइयों के साथ जब भी सिंचाइयों की जरूरत पड़े, सिंचाई करें। फूल के विकसित होने, फलियां भरने और बीजों के विकसित होने के समय सिंचाई की जरूरत होती है।

खरपतवार नियंत्रण

45 दिनों तक लगातार गोडाई और कही की मदद से मिट्टी चढाएं और खेत को नदीन मुक्त रखें। यदि नदीनों की रोकथाम ना की जाये तो यह फसल में 70-90 प्रतिशत तक पैदावार को कम कर देता है। रोपाई के दो से तीन दिन बाद नदीनों के अंकुरण से पहले फ्लूक्लोरालिन (बसालिन) 800 मि.ली को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

पौधे की देखभाल

तने की मक्खी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
तने की मक्खी : यदि इसका हमला दिखे तो क्विनलफॉस 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 2 स्प्रे करें। दूसरी स्प्रे पहली स्प्रे के 10 दिनों के बाद करें।
 
चेपा, पत्ते का टिड्डा और सफेद मक्खी
चेपा, पत्ते का टिड्डा और सफेद मक्खी : यदि इनका हमला दिखे तो मिथाइल डेमाटोन या डाइमैथोएट या ओबेरॉन 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
जड़ गलन
  • बीमारियां और रोकथाम
जड़ गलन : इस बीमारी से पौधे जल्दी और पूरी तरह सूख जाते हैं। पत्ते पीले रंग के हो जाते हैं।
फसल को जड़ गलन से बचाने के लिए थीरम 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करना चाहिए।
 
पत्तों के धब्बे
पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग : यदि इनका हमला दिखे तो इस बीमारी से बचाव के लिए बवास्टिन घोल 1 प्रतिशत की स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

जब फलियां पूरी तरह सूख जायें तो वे कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। इनकी औसतन पैदावार 3-4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।