राजस्थान में खरबूजे की खेती

जलवायु

  • Season

    Temperature

    18-30°C
  • Season

    Rainfall

    50-75mm
  • Season

    Sowing Temperature

    18-20°C
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मिट्टी

यह गहरी उपजाऊ और जल्दी पानी का निकास करने वाली मिट्टी में जल्दी बढ़ता है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए चिकनी, रेतली और पानी को जल्दी सोखने वाली मिट्टी अच्छी मानी जाती है। फसल चक्र के अनुसार ही फसल बोनी चाहिए क्योंकि एक ही खेत में बार बार एक ही फसल बोने से मिट्टी के पोषक तत्व और पैदावार भी कम होती है। बीमारियों का खतरा  भी बढ़ जाता है। मिट्टी की पी एच 6-7 होनी चाहिए। नमक की ज्यादा मात्रा वाली खारी मिट्टी इसकी पैदावार के लिए ठीक नहीं है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Hara Madhu: यह देरी से पकने वाली किस्म है। इसके फल का आकार गोल और बड़ा होता है। फल का औसतन भार 1 किलोग्राम होता है। छिल्का हल्के पीले रंग का होता है। टी एस एस की मात्रा 13 प्रतिशत होती है और स्वाद में बहुत मीठा होता है। इसका गुद्दा हरे रंग का, मोटा और रसदार होता है। बीज आकार में छोटे होते हैं। यह पत्तों के ऊपर धब्बे रोग को सहनेयोग्य होता है। इसकी औसतन पैदावार 50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Durgapur Madhu: यह प्रसिद्ध किस्म इसकी मिठास और सुगंध के तौर पर जानी जाती है। यह किस्म जड़ गलन और पत्तों के ऊपर धब्बा रोग की प्रतिरोधक है।
 
RM 50
 
MHY 3
 
MHY 5
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
Arka Jeet
 
Arka rajhans
 
MH 10

Pusa madhurima

D. Madhu Madhuras
 

ज़मीन की तैयारी

मिट्टी के भुरभुरा होने तक तीन से चार बार खेत की जोताई करें। प्रत्येक जोताई के बाद सुहागा फेरें।

बिजाई

बिजाई का समय
खरबूजे की बिजाई के लिए फरवरी के पहले सप्ताह से लेकर मार्च का महीना अनुकूल होता है।
 
फासला
बोने वाली किस्म के आधार पर 3-4 मीटर के बैड तैयार करें बैड पर दो बीज हर मेंड़ पर बोयें और मेंड़ का फासला 60 सैं.मी. होना चाहिए।

बीज की गहराई
बिजाई के लिए 1.5 सैं.मी. गहरे बीज बोयें।
 
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर और दूसरे खेत में पनीरी लगाकर की जा सकती है।
 
पनीरी लगा कर : जनवरी के आखिरी सप्ताह से फरवरी के पहले सप्ताह तक 100 गज की मोटाई वाले 15 सैं.मी. x12 सैं.मी. आकार के पॉलीथीन बैग में बीज बोया जा सकता है। पॉलीथीन बैग में गाय का गोबर और मिट्टी को एक जितनी मात्रा में भर लें। पौधे फरवरी के आखिर या मार्च के पहले सप्ताह बिजाई के लिए तैयार हो जाते हैं। 25-30 दिनों के पौधे को उखाड़कर खेत में लगा दें और पौधे खेत में लगाने के तुरंत बाद पहला पानी लगाना चाहिए।
 

बीज

बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 600-800 ग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
बिजाई से पहले 2 ग्राम कार्बेनडाज़िम प्रति किलोग्राम बीज में डालकर बीज का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज का उपचार करें। बीज को छांव में सुखाकर तुरंत बीज दें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
70-90 100 30

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
30-40 16 16

 

बिजाई के 20-25 दिन पहले खेत में गली हुई रूड़ी की खाद या अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर 6 टन प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन 32-40 किलोग्राम (यूरिया 70-90 किलोग्राम), फासफोरस 16 किलोग्राम (सिंगल सुपर फासफेट 100 किलोग्राम), पोटाश 16 किलोग्राम (म्यूरेट ऑफ पोटाश 30 किलोग्राम) प्रति एकड़ के हिसाब से डालें।
फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन का तीसरा हिस्सा (1/3) बिजाई से पहले डालें। नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा के दो हिस्से बिजाई के 25-30 दिनों के बाद और दूसरा हिस्सा फूल निकलने के समय डालें। पत्तों को छूने से परहेज करें  और मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें।
 
जब फसल 10-15 दिनों की हो जाये तो फसल के अच्छे विकास और पैदावार के लिए 19:19:19+ सूक्ष्म तत्व 2-3 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। फूलों के झड़ने से रोकने और फसल का 10 प्रतिशत पैदावार बढ़ाने के लिए शुरूआती फूलों के दिनों में हयूमिक एसिड 3 मि.ली.+एम ए पी (12:61:00) 5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। सालीसाइकिल एसिड (4-5 एसप्रिन गोलियां 350एम जी) प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर फूलों के बनने और पकने के समय 30 दिनों के फासले पर 1-2 बार स्प्रे करें। बिजाई के 55 दिनों के बाद 13:00:45, 100 ग्राम+हैक्साकोनाज़ोल 25 मि.ली. प्रति 15 लीटर पानी के हिसाब से फल के पहले विकास के पड़ाव और सफेद धब्बा रोग से बचाने के लिए स्प्रे करें। बिजाई के 65 दिनों के बाद फल के आकार, स्वाद और रंग को बढ़ाने के लिए 00:00:50, 1.5 किलोग्राम प्रति एकड़ 100 ग्राम को प्रति 15 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 

 

 

सिंचाई

बीजों के जल्दी अंकुरण के लिए बिजाई के तुरंत बाद सिंचाई करें। बाकी की सिंचाई 5-7 दिनों के अंतराल पर करें। फसल पकने के समय तब सिंचाई करें जब आवश्यक हो। जरूरत से ज्यादा पानी नहीं लगाना चाहिए। सिंचाई के समय खरबूजे के फल पर पानी नहीं पड़ना चाहिए। भारी मिट्टी में ज्यादा सिंचाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह पौधे को जरूरत से ज्यादा बढ़ा देता है। ज्यादा मिठास के लिए कटाई से 3-6 दिन पहले सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा और थ्रिप्स : यह कीड़े पौधे के पत्तों का रस चूस लेते हैं जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और लटक जाते हैं। ये कीड़े पत्तों को ऊपर की तरफ मोड़ देते हैं।
 
यदि खेत में इसका हमला दिखे तो थाइमैथोक्सम 5 ग्राम में 15 लीटर पानी डालकर छिड़काव करें यदि रस चूसने वाले कीटों और पत्तों के ऊपरी और निचले धब्बे रोगों का हमला दिखे तो थाइमैथोक्सम की स्प्रे करें और 15 दिनों के बाद दुबारा स्प्रे करें और स्प्रे करने के 15 दिन बाद डाइमैथोएट 10 मि.ली. + टराइडमोरफ 10 मि.ली. को  10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
पत्ते में छेद करने वाला कीड़ा
पत्ते का सुरंगी कीड़ा : यह पत्तों के सुरंगी कीड़े हैं जो कि पत्तों में लंबी सुरंगे बना देते हैं और पत्तों से अपना भोजन लेते हैं। यह प्रकाश संश्लेषण क्रिया और फलों के बनने को प्रभावित करते हैं।
 
इसकी रोकथाम के लिए एबामैक्टिन 6 मि.ली. को प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
फल की मक्खी
फल की मक्खी : यह बहुत नुकसानदायक कीड़ा है। मादा मक्खी फल की ऊपर वाली सतह पर अंडे देती है और बाद में वे कीड़े फल के गुद्दे को खाते हैं। जिस कारण फल गलना शुरू हो जाता है।
 
प्रभावित फल को खेत में से उखाड़कर नष्ट कर दें। यदि नुकसान नज़र आये तो शुरूआती समय में नीम सीड करनाल एकसट्रैट 50 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के फासले पर 3-4 बार मैलाथियॉन 20 मि.ली.+100 ग्राम गुड़ को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करते रहें।
 
लाल भुंडी
लाल भुंडी : यह लाल रंग का कीट नए पत्तों को अपना भोजन बनाकर नुकसान पहुंचाती है। इसके ज्यादा हमले से फल पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
 
यदि इसका हमला दिखे तो एसीफेट 75 एस पी 0.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। जरूरत पड़ने पर एसीफेट की दूसरी स्प्रे 15 दिनों के अंतराल पर करें।
 
पत्तों के धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों के ऊपर की तरफ सफेद धब्बे : कई बार पौधे के पत्तों और तने की  ऊपर वाली सतह पर सफेद रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। इसके परजीवी पौधे को भोजन की तरह खाते हैं। इस रोग के ज्यादा बढ़ने से पत्ते झड़ने लगते हैं और फल समय से पहले ही पकने लग जाते हैं।
 
इसका नुकसान दिखने पर पानी में घुलनशील सल्फर 20 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के फासले पर 2-3 बार छिड़काव करें।
 
एंथ्राक्नोस
एंथ्राक्नोस : इस रोग से पौधों के पत्ते झुलसे हुए नज़र आते हैं।
 
इसकी रोकथाम के लिए कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यदि खेत में नुकसान दिखे तो मैनकोजेब 300 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 400 ग्राम को प्रति लीटर पानी के हिसाब से मिलाकर स्प्रे करें।
 
अचानक सूखा
अचानक सूखा : यह बीमारी पौधे के किसी भी पड़ाव पर हो सकती है। शुरूआत में पौधा कमज़ोर और पीले रंग का हो जाता है और बीमारी बढ़ने तक पूरा सूख जाता है।
 
इससे बचाव के लिए खेत में ज्यादा पानी ना खड़ने दें। प्रभावित पौधों को खेत में से उखाड़ देना चाहिए। ट्राइकोडरमा विराइड 10 किलोग्राम प्रति एकड़ को 50 किलोग्राम एफ आइ एम या रूड़ी की खाद में मिलाकर खेत में डालें। यदि नुकसान बढ़ जाये तो मैनकोजेब या कॉपर आक्सी क्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लीटर या कार्बेनडाज़िम या थाइओफिनेट - मिथाइल 1 ग्राम को प्रति  लीटर पानी के हिसाब से करें।
 
पत्तों के निचले धब्बे
पत्तों के निचली तरफ सफेद धब्बे : यह बीमारी आमतौर पर खरबूजे पर पायी जाती है। इस बीमारी से पत्तों का ऊपर वाला हिस्सा पीला हो जाता है और धीरे धीरे पीलापन बढ़ना शुरू हो जाता है और पत्तों को बीच वाला हिस्सा भूरे रंग का हो जाता हैं पत्तों के निचले हिस्से में हल्के नीले रंग की फंगस नज़र आती है। बादलवाइ, बारिश और नमी वाले मौसम में यह बीमारी ज्यादा बढ़ती हैं।
 
यदि खेत में नुकसान दिखे तो मैटालैक्सल 8 प्रतिशत+मैनकोजेब 64 प्रतिशत डब्लयु पी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना  चाहिए।
 

फसल की कटाई

हरा मधु किस्म की कटाई उस समय करें जब फल पीले रंग के हो जायें। दूसरी किस्मों की कटाई मंडी की दूरी के अनुसार की जाती है। यदि मंडी की दूरी ज्यादा हो तो जब फल हरे रंग का हो तब ही कटाई कर देनी चाहिए। यदि मंडी नज़दीक हो तो फल आधा पकने पर ही कटाई करनी चाहिए। जब तना थोड़ा सा ढीला सा नज़र आये उसे हाफ स्लिप कहते हैं।

कटाई के बाद

कटाई के बाद  फलों का तापमान और गर्मी कम करने के लिए उन्हें ठंडा किया जाता है। फलों को उनके आकार के हिसाब से बांटा जाता है। खरबूजों को कटाई के बाद 15 दिनों के लिए 2 से 5 डिगरी सैल्सियस तापमान और 95 प्रतिशत पर रखा जाता है इसके बाद जब यह पूरा पक जाता है तो इसे 5 से 14 दिनों के लिए 0-2.2 डिगरी सैल्सियस तापमान और 95 प्रतिशत नीम में रखा जाता है।

आम जानकारी

यह भारत की महत्तवपूर्ण सब्जियों वाली फसल है। इसे कईं अच्छी मानी जाने वाली किस्मों की मां भी माना जाता है। खरबूजा इरान, अनाटोलिया और अरमीनिया का मूल है। खरबूजा विटामिन ए और विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है। इसमें 90 प्रतिशत पानी और 9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होते हैं। भारत में खरबूजा उगाने वाली सब्जियों में पंजाब, तामिलनाडू, महांराष्ट्र और आंध्र प्रदेश भी शामिल हैं।