जौं की खेती

आम जानकारी

जौं राजस्थान की सबसे ज्यादा उगाने वाली दूसरी फसल है। इसमें सूखे की उच्च प्रतिरोधक क्षमता होती है। जौं का उपयोग मनुष्यों और साथ में पशुओं के द्वारा किया जाता है। इसका प्रयोग बीयर और आयुर्वेदिक दवाइयां आदि बनाने के लिए किया जाता है। राजस्थान में जौं के आटे को गेहू और चने के आटे में मिक्स करके मिस्सी रोटी बनाई जाती है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार जौं के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। राजस्थान में हनुमानगढ़, टोंक, पाली, सवाई माधोपुर, अलवर, भारतपुर, सिकर, जयपुर, भिलवाड़ा, उदयपुर, एमर और गंगानगर मुख्य जौं उत्पादक क्षेत्र हैं।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    12-16°C
    30-32°C
  • Season

    Rainfall

    300-600mm
  • Season

    Sowing Temperature

    12-16°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-32°C
  • Season

    Temperature

    12-16°C
    30-32°C
  • Season

    Rainfall

    300-600mm
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    Sowing Temperature

    12-16°C
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    Harvesting Temperature

    30-32°C
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    12-16°C
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    300-600mm
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    30-32°C
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    12-16°C
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    300-600mm
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    12-16°C
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    Harvesting Temperature

    30-32°C

मिट्टी

जौं को कई प्रकार की मिट्टी जैसे नर्म, हल्की और नमक वाली मिट्टी में भी खेती की जा सकती है। भारी दोमट से रेतली मिट्टी जो कि अच्छे जल निकास वाली हो और हल्की उपजाऊ हो, में भी उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। तेजाबी मिट्टी में जौं की खेती करने से परहेज़ करें।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

RS 6: यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह बारानी इलाकों के साथ साथ सिंचित इलाकों में भी उगाने के लिए अनुकूल है। यह किस्म बीयर बनाने में भी उपयोगी है। इसकी औसतन पैदावार 14-16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RBD 1: यह किस्म राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल है। इसकी औसतन पैदावार 12-14 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Kedar: यह उच्च उपज वाली छोटे कद की किस्म IARI, नई दिल्ली द्वारा जारी की गई है। यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए अनुकूल है। यह कुंगी बीमारी की प्रतिरोधी किस्म है।
 
RD 2552, RD 2592
 
RD 2503, RD 2624
 
RD 2508, RD 2660
 
RD 2035, RD 2668
 
RD 2052, RD 2715
 
NP-13, NP 103, RS-17, RD 31, RD 57, Bilara 2
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
RD 2035, BCU 73 or Rekha, DWRUB 64, RD 2503, DWRB 73
 
PL 751, NARENDRA BARLEY 2, GETANJALI (K1149)
 
Jyoti: यह किस्म कानपुर द्वारा विकसित की गई है। यह 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Karan 201, 264: यें किस्में समस्यात्मक मिट्टी में उगाने के लिए उपयुक्त है। इनकी औसतन पैदावार क्रमश 15 क्विंटल और 18 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RD 2786: यह सिंचित क्षेत्रों में समय पर बोने के लिए उपयुक्त किस्म है। यह किस्म 111 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RD 2794: यह सिंचित क्षेत्रों में समय पर बोने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसे क्षारीय और नमक वाली मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है। यह 121 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

खेत की अच्छे से जोताई करें और नदीनों को नष्ट करें। मिट्टी में नमी की मात्रा बनाए रखने के लिए तवियों से 2-3 बार जोताई करें। तवियों से जोताई करने के बाद मिट्टी को समतल बनाने के लिए और नमी के लिए सुहागा फेरें। पहले बोयी गई फसल की पराली को हाथों से उठाकर नष्ट कर दें ताकि दीमक का हमला ना हो सके।

बिजाई

बिजाई का समय
सिंचित क्षेत्रों में बिजाई 15 से 25 नवंबर तक पूरी कर लें। बारानी क्षेत्रों में जौं की खेती के लिए 15 अक्तूबर से 10 नवंबर का समय अनुकूल होता है।
 
फासला
बिजाई के लिए पंक्ति से पंक्ति का फासला 22.5 सैं.मी. होना चाहिए। यदि बिजाई देरी से की गई हो तो 18-20 सैं.मी. फासला रखें।
 
बीज की गहराई
सिंचाई वाले क्षेत्रों में गहराई 3-5 सैं.मी. रखें और बारिश वाले क्षेत्रों में 5-8 सैं.मी. रखें।
 
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई बुरकाव ढंग और मशीन द्वारा की जाती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
सिंचाई वाले क्षेत्रों में बीज की मात्रा 35 किलोग्राम प्रति एकड़ और बारानी क्षेत्रों में बीज की मात्रा 45 किलोग्राम प्रति एकड़ का प्रयोग करें।

बीज का उपचार
क्षारीय और लवण वाले क्षेत्रों में बिजाई से पहले बीजों को 24 घंटे के लिए सामान्य तापमान पर पानी में भिगो कर रखें। फंगस से बचाने के लिए विटावैक्स या थीरम 3 ग्राम से, प्रति किलो बीजों का उपचार करें। बीजों को दीमक रहित बनाने के लिए 250 मि.ली. फॉरमैथियोन को 5.3 लीटर पानी में मिलाकर उपचार करना चाहिए।
 

खरपतवार नियंत्रण

अच्छी फसल और अच्छी पैदावार के लिए शुरू में ही नदीनों की रोकथाम बहुत जरूरी है। इस फसल में चौड़े और तंग पत्तों वाले नदीने आते हैं। चौड़े पत्तों वाले नदीनों की रोकथाम के लिए खेतों में नदीन आने के बाद 250 ग्राम 2, 4-डी 100 लीटर पानी में मिलाकर बीजने के 30-35 दिनों के बाद प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
बारीक पत्तों जैसे नदीनों की रोकथाम के लिए आइसोप्रटीउरन 75 प्रतिशत डब्लयु पी 500 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी या पैंडीमैथालीन 30 प्रतिशत ई सी 1.4 लीटर प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
24-35 50 -

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHSOPHORUS POTASH
12-16 8 As per soil test results

 

बीज बोने से 1 महीना पहले अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर 4-6 टन प्रति एकड़ में डालें।
बारानी क्षेत्रों के लिए नाइट्रोजन 12-16 किलो (यूरिया 24-35 किलो), फासफोरस 8 किलो (एस एस पी 50 किलो) प्रति एकड़ में डालें। सिंचित क्षेत्रों के लिए नाइट्रोजन 24-32 किलो (यूरिया 52-70 किलो), फासफोरस 12 किलो (एस एस पी 75 किलो) प्रति एकड़ में डालें।
 
फासफोरस की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन का एक तिहाई हिस्सा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन के दो हिस्से पहला सिंचाई के समय और दूसरा फूल आने के समय डालें।
 

 

 

सिंचाई

जौं को दो से तीन सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। नए पत्ते निकलने के समय, पौधे के विकास के समय और बालियां निकलने के समय पानी की कमी ना होने दें। इन अवस्थाओं पर पानी की कमी पैदावार में बहुत नुकसान करती है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए बीज लगाने से लेकर दुधिया अवस्था तक मिट्टी के अंदर जड़ों वाले भाग में 50 प्रतिशत तक नमी बनाएं रखें।

पहली सिंचाई बिजाई के 25-30 दिनों के बाद जड़ें बनने के समय करें। दूसरी सिंचाई फूलों के गुच्छे आने पर करें।

पौधे की देखभाल

सैनिक सुंडी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
सैनिक सुंडी : यह सुंडी हल्के हरे रंग की होती है और बाद में पीले रंग की बन जाती है। यह सुंडी पत्ते को ऊपर की ओर से खाती है या सारा पत्ता खा जाती है। इसके अंडे रूई की तरह पत्ते के ऊपर नज़र आते हैं। एक ऋतु में 3-4 पीढियां नज़र आती है।
 
रोकथाम : कुदरती ढंग से ही हमला करने वाले कीड़ों की रोकथाम की जा सकती है। बैसीलस थरूजीनसिस स्प्रे बहुत लाभदायक है। लक्षण दिखाई देने पर मैलाथियॉन 5 प्रतिशत 10 किलोग्राम प्रति एकड़ या क्विनलफॉस 1.5 प्रतिशत 250 मि.ली. का प्रति एकड़ छींटा दें। फसल कटने के बाद नदीनों नष्ट कर दें।
 
पतली सुंडी
पतला कीड़ा : यह सुंडियां हल्के हरे रंग की होती हैं। यह अपना जीवन 1-4 साल तक पूरा करती हैं। यह सुंडियां तने को मोड़ देती हैं और तने का शिखर सफेद रंग का हो जाता है।
 
रोकथाम : क्विनलफॉस 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
चेपा
चेपा : इसकी रोकथाम के लिए 4-6 हज़ार क्राइसोपरला प्रीडेटर प्रति एकड़ या 50 ग्राम नीम का घोल प्रति लीटर का प्रयोग करें। बादलवाई होने पर इसका हमला ज्यादा होता है। इसकी रोकथाम के लिए थाईमैथोक्सम या इमीडाक्लोप्रिड 300 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
बालियों का कीड़ा
बालियों का कीड़ा : बालग कीड़ों की रोकथाम के लिए दिन के समय रोशनी यंत्र लगाएं। फूल से बालियां बनने पर 5 फेरोमोन टरैप प्रति एकड़ पर लगाएं। गंभीर हालत में 1 ग्राम मैलाथियॉन या कार्बरिल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
घास का टिड्डा
घास का टिड्डा : नाबालिग और बालिग टिड्डे पत्ते को खाते हैं। नाबालिग हरे भूरे रंग के होते हैं और शरीर पर धारियां होती हैं।
 
रोकथाम : फसल की कटाई के बाद सारे पौधों को खेत में से हटा दें और अच्छी तरह सफाई कर दें। इसके अंडों को मारने के लिए गर्मियों में खेत की जोताई कर दें। जिससे धूप के कारण अंडे मर जाते हैं। गंभीर हालातों में 400 ग्राम कार्बरिल 50 डब्लयु पी की प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
थ्रिप्स
थ्रिप्स : यह अक्सर सूखे मौसम में नज़र आती है। इसके गंभीर रूप् का पता करने के लिए 6-8 नीले स्टिकी टरैप प्रति एकड़ लगाएं। इसके हमले को कम करने के लिए 5 ग्राम वर्टीसिलियम लैकानी प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। गंभीर हालातों में इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल या फिप्रोनिल 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर या फिप्रोनिल 80 प्रतिशत डब्लयु पी 2.5 मि.ली. को प्रति लीटर हिसाब से पानी में मिलाकर या 1 ग्राम एसीफेट 75 प्रतिशत डब्लयु पी को प्रति लीटर पानी के हिसाब से स्प्रे करें या 1 ग्राम थाइमैथोक्सम 25 प्रतिशत डब्लयु पी को प्रति लीटर पानी के हिसाब से मिलाकर खेत में डालें।
 
सफेद धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
सफेद धब्बे : इस बीमारी से पत्ते, तने और फूलों वाले भाग के ऊपर सफेद आटे जैसे धब्बे पड़ जाते हैं यह धब्बे बाद में सलेटी और भूरे रंग के हो जाते हैं और इससे पत्ते के अन्य भाग सूख जाते हैं इस बीमारी का हमला ठंडे तापमान और भारी नमी में बहुत होता है। घनी फसल, कम रोशनी और सूखे मौसम में इस बीमारी का हमला बढ़ जाता है।
बीमारी आने पर 2 ग्राम घुलनशील सल्फर प्रति लीटर पानी में या 200 ग्राम कार्बेनडाज़िम प्रति एकड़ में छिड़काव करें। गंभीर नुकसान होने पर 1 मि.ली. प्रॉपीकोनाज़ोल प्रति लीटर पानी मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
धारियों का रोग
धारियों का रोग :  पीली कुंगी से बचाव के लिए रोग रहित किस्मों की बिजाई करें। मिश्रित खेती और फसली चक्र अपनाएं। ज्यादा मात्रा में नाइट्रोजन का प्रयोग ना करें। लक्षण दिखाई देने पर 15-25 किलो सल्फर प्रति एकड़ का छींटा दें या 2 ग्राम मैनकोज़ेब प्रति लीटर या 1 मि.ली. प्रॉपीकोनाज़ोल प्रति लीटर को पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
 
कांगियारी
पत्तों की कांगियारी : यह बीज से पैदा होने वाली बीमारी है। यह बीमारी हवा द्वारा फैलती है यह बीमारी ठंडे और नमी वाले मौसम में फूल आने पर पौधे के ऊपर हमला करती है। बीज को फंगीनाशी जैसे कि कार्बोक्सिन 75 डब्लयु पी 2.5 ग्राम के साथ प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचार करें। ज्यादा बीमारी पड़ने पर कार्बेनडाज़िम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज, टैबुकोनाज़ोल 1.25 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के लिए प्रयोग करें। यदि नमी की मात्रा कम हो तो बीजों को टराईकोडरमा विराईड 4 ग्राम प्रति किलोग्राम और कार्बोक्सिन की मात्रा 1.25 ग्राम प्रति किलोग्राम के हिसाब से उपचार करें।
 

फसल की कटाई

फसल किस्म के अनुसार मार्च के आखिर और अप्रैल में पक जाती है। फसल को ज्यादा पकने से बचाने के लिए समय के अनुसार कटाई करें। फसल में नमी 25-30 प्रतिशत होने पर फसल की कटाई करें। बीज को छांव के नीचे रखें।

कटाई के बाद

जौं सिरका और शराब बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।