मसूर फसल का उत्पादन

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की रोकथाम के लिए दो गोडाई, पहली 30 दिन और दूसरी 60 दिनों के अंतराल पर करें। 45-60 दिनों तक खेत को नदीन मुक्त रखें ताकि फसल अच्छा विकास करे और ज्यादा पैदावार दे। इसके इलावा स्टंप 30 ई सी 550 मि.ली. बीजने के दो से तीन दिनों के अंदर अंदर छिड़काव करें और इसके साथ एक गोडाई 50 दिनों के बाद करें जो कि नदीनों की रोकथाम के लिए अनुकूल है।                             

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
12 50 -

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
5 8 -

 

नाइट्रोजन 5 किलो (12 किलो यूरिया), फासफोरस 8 किलो (50 किलो सुपर फासफेट) कर मात्रा प्रति एकड़ में बिजाई के समय डालनी चाहिए। बिजाई से पहले बीजों को राइज़ोबियम से उपचार कर लेना चाहिए। यदि बिजाई से पहले बीजों का राइज़ोबियम से उपचार नहीं किया है तो फासफोरस की मात्रा दोगुनी कर देनी चाहिए।
 

 

 

 

 

सिंचाई

मसूर को आमतौर पर बारानी इलाकों में उगाया जाता है। मौसम के हिसाब से इसे दो या तीन पानी की जरूरत पड़ती है। पहला पानी बीजने से चार हफ्ते बाद और दूसरा पानी फूल लगने के समय लगाएं। फूल और फलियां बनने वाले पड़ाव पर भी सिंचाई बहुत जरूरी है।

पौधे की देखभाल

फली छेदक
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
फली छेदक सुंडी : यह सुंडी पत्ते, डंडियां और फूलों को खाती है। यह मसूर की खतरनाक सुंडी है और पैदावार का बहुत नुकसान करती है। इसकी रोकथाम के लिए हेक्ज़ाविन 900 ग्राम 50 डब्लयु पी को 100 लीटर पानी प्रति एकड़ में मिलाकर फूल लगने के समय छिड़काव करें। यदि जरूरत हो तो तीसरा छिड़काव 3 हफ्तों बाद कर सकते हैं।
 

आम जानकारी

यह एक महत्तवपूर्ण प्रोटीन युक्त दालों वाली फसल है। इसे ज्यादातर मुख्य दाल के तौर पर जो कि दो भागों द्वारा बनी होती है, खायी जाती है। यह दाल गहरी संतरी, और संतरी पीले रंग की होती है। इसे बहुत सारे पकवानों में प्रयोग किया जाता है। मसूर से कल्फ, कपड़ा और छापा बनाने का पदार्थ भी मिलता है। इसे गेहूं के आटे में मिलाकर ब्रैड और केक भी बनाये जाते हैं। भारत, दुनिया में सब से अधिक मसूर पैदा करने वाला देश है। तकरीबन 12000 हैक्टेयर क्षेत्र में मसूर की खेती की आधुनिक तकनीकों से की जाती है, जिससे कि फसल की पैदावार में वृद्धि होती है।

कुंगी
  • बीमारियां और रोकथाम
कुंगी : इससे टहनियां, पत्ते और फलियों के ऊपर हल्के पीले रंग के उभरे हुए धब्बे पड़ जाते हैं। ये धब्बे ग्रुप के रूप में नज़र आते हैं। छोटे धब्बे धीरे धीरे बड़े धब्बों में बदल जाते हैं। कई बार प्रभावित पौधा पूरी तरह सूख जाता है। इससे बचाव के लिए रोग की प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें।  400 ग्राम एम-45 को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें।
 

जलवायु

  • Season

    Temperature

    18-20°C
  • Season

    Rainfall

    100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    18-20°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    22-24°C
झुलस रोग
झुलस रोग : इससे टहनियां और फलियों के ऊपर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। ये धब्बे धीरे धीरे लंबे आकार के बनते हैं। कईं बार ये धब्बे गोलाकार का रूप ले लेते हैं। बचाव के लिए बीमारी रहित बीज का प्रयोग करें और पौधे को नष्ट कर दें। इसकी रोकथाम के लिए 400 ग्राम बवास्टिन को 150 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ पर छिड़काव करें।

 

 
  • Season

    Temperature

    18-20°C
  • Season

    Rainfall

    100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    18-20°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    22-24°C

फसल की कटाई

कटाई सही समय पर करनी चाहिए, जब पौधे के पत्ते सूख जाएं और फलियां पक जाएं तब फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। देरी करने से फलियां झड़नी शुरू हो जाती है। इसकी कटाई द्राती से करें। दानों को साफ करके धूप में सुखाकर 12 प्रतिशत नमी पर स्टोर कर लें।

  • Season

    Temperature

    18-20°C
  • Season

    Rainfall

    100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    18-20°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    22-24°C
  • Season

    Temperature

    18-20°C
  • Season

    Rainfall

    100cm
  • Season

    Sowing Temperature

    18-20°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    22-24°C

मिट्टी

यह हर तरह की मिट्टी में उग सकती है पर क्षारीय, नमक वाली और जल जमाव वाली मिट्टी में नहीं उग सकती। मिट्टी नदीन और जड़ रहित होनी चाहिए ताकि बीज एक जैसी गहराई में बोये जा सकें।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Pant Lentil-4 (PL 81-17): यह किस्म 1993 में जारी की गई है, इसकी औसतन पैदावार 6.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है और 140-145 दिनों में परिपक्व हो जाती है। यह किस्म कुंगी और सूखे को सहनेयोग्य है।

IPL 406 (Angoori): यह किस्म 2007 में IIPR द्वारा जारी की गई है। यह उत्तरी राजस्थान में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 120-155 दिनों में परिपक्व हो जाती है। यह कुंगी और सूखे को सहनेयोग्य किस्म है।
 
Pant Lentil 8 (PL 063): यह किस्म 2010 में जारी की गई है। इसकी औसतन पैदावार 5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 135 दिनों में परिपक्व हो जाती है। यह किस्म कुंगी, सूखे और फली छेदक के प्रतिरोधी है।

दूसरे राज्यों की किस्में
 
Haryana Masur 1: यह पूरे हरियाणा में बोने के लिए अनुकूल किस्म है। यह कीटों और बीमारियों के प्रतिरोधी है। यह किस्म 140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6.5-7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Sapna: यह दरमियाने समय की किस्म हरियाणा के सिंचित क्षेत्रों में बोने के लिए अनुकूल है। यह 140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके दाने मोटे, समतल, और सलेटी रंग के होते हैं जिन पर गहरे काले रंग के धब्बे होते हैं। यह फली छेदक के प्रतिरोधी है। इसकी औसतन पैदावार 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Garima: यह सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में उगाई जा सकती है। इसके पत्ते चौड़े और गहरे हरे रंग के होते हैं। इसके दाने सपना किस्म के दानों से बड़े होते हैं। यह किस्म 135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Bombay 18:  यह किस्म 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 4-4.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
DPL 15: यह किस्म 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 5.6-6.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
DPL 62: यह किस्म 130-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
L 4632
 
K 75: यह किस्म 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 5.6-6.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa 4076: यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Lens 4076 (Shivalik) : यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 5. 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Pusa Vaibhav: यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 8-9.6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pant Lentil 7: यह किस्म 147 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

सीड बैड तैयार करने के लिए हल्की मिट्टी, कम जोताई की आवश्यकता होती है। भारी मिट्टी में एक गहरी जोताई के बाद 3-4 क्रॉस हैरो से जोताई करनी चाहिए। मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए 2-3 जोताई पर्याप्त होती है। पानी के अच्छे बहाव के लिए सुहागा मारना बहुत जरूरी है। फसल बीजने के समय खेत में सही नमी होनी चाहिए।

बिजाई

बिजाई का समय
बिजाई नवंबर महीने में पूरी कर लेनी चाहिए। बिजाई में देरी करने से पैदावार में कमी आती है।
 
फासला
पंक्तियों में बीज 22 सैं.मी. की दूरी पर बोने चाहिए और देरी से बिजाई करने की हालतों में पंक्तियों की दूरी कम करके 18 सैं.मी. कर देनी चाहिए।
 
बीज की गहराई
बीजों को 3-4 सैं.मी. गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
बिजाई के लिए पोरा ढंग या खाद और बीज वाली मशीन का प्रयोग करें। इसके इलावा इसकी बिजाई हाथों से छींटा देकर की जा सकती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
बीज की मात्रा 12.15 किलोग्राम प्रति एकड़ होनी चाहिए। पिछेती बिजाई के लिए मोटे किस्म के बीजों की मात्रा 18-20 किलोग्राम प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
बिजाई से पहले बीजों को कप्तान या थीरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचार करें।
 

निम्नलिखित में से किसी एक फंगसनाशी या कीटनाशी का प्रयोग करें।
 
फंगसनाशी दवाई  मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज)  
Captan 3gm
Thiram 3gm