जोजोबा की काश्त

आम जानकारी

जोजोबा सदाबहार मारूस्थली झाड़ी है यह धीरे धीरे बढ़ती है लेकिन 150 वर्षों तक जीवित रहती है। इसे मुख्य रूप से तेल लेने के उद्देश्य से उगाया जाता है। इसके बीजों से निकाला गया तेल उच्च तापमान और उच्च दबावों पर तेज़  गति मशीनरी के संचालन के लिए ग्रीस के तौर पर उपयोग किया जाता है। इसके अलावा यह सौंदर्य के प्रसाधनों में प्रयोग किया जाता है जैसे बालों के तेल, शैम्पू, साबुन, चेहरे की क्रीम, सनस्क्रीन योगिकों, लिपस्टिक इत्यादि। इसे कम कैलोरी का खाना पकाने वाले तेल, सलाद तेल, वनस्पति तेल के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
 
प्रतिकूल जलवायु के अनुसार महत्तवपूर्ण और ग्रहण करने योग्य होने के कारण राजस्थान सरकार ने जोजोबा की खेतीबाड़ी का कार्य आरम्भ किया । इसकी खेती के साथ राजस्थान के रेतीले इलाकों में ग्रामीण वर्ग के लोगों को रोज़गार मिला और खाली पड़ी ज़मीनें व्यापारक तौर पर प्रयोग होने लगी।
 
 वर्तमान में जोजोबा की खेती लगभग 350 हैक्टेयर क्षेत्र में की जाती है और इसमें से 90 प्रतिशत क्षेत्र राजस्थान का है। झुनझुनू, चुरू, सिकर, जोधपुर और श्री गंगानगर जिलों में जोजोबा की बिजाई की जाती है। इससे पहले ये क्षेत्र इसकी खेती के लिए अयोग्य माने जाते थे। राजस्थान और गुजरात के साथ साथ आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और तामिलनाडू जोजोबा की खेती के लिए संभावित राज्य हैं।
 

जलवायु

  • Season

    Temperature

    25-30°C
  • Season

    Rainfall

    460-650mm
  • Season

    Temperature

    25-30°C
  • Season

    Rainfall

    460-650mm

मिट्टी

इसकी खेती मिट्टी की व्यापक श्रेणी में की जा सकती है। यह अच्छे निकास वाली और मिट्टी में हवादार उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। मिट्टी की पी एच 5 से 8 होनी चाहिए। पौधा अम्लीय और खारी मिट्टी को भी सहनेयोग्य है। भारी और जल जमाव वाली मिट्टी में इसकी खेती ना करें। कम उपजाऊ वाली मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है। उपोष्णकटिबंधीय तटवर्ती भी जोजोबा की खेती के लिए उपयुक्त होते हैं।

ज़मीन की तैयारी

खेत की 2-3 बार जोताई करें, फिर तवियों से जोताई करें, डलियों को तोड़ें और मिट्टी को भुरभुरा करें। खेत को नदीन रहित बनाएं ताकि पानी और खादों का प्रयोग कम हो। तेज हवा के नुकसान से बचाव के लिए उत्तर-दक्षिण दिशा में कतारें बनायें।

बिजाई

बिजाई का समय
बीजों को अक्तूबर और मार्च के महीने में बोयें। पौधे रोपाई के लिए अगले वर्ष के फरवरी और जुलाई महीनों में तैयार हो जाते हैं।
 
फासला
पौधों की रोपाई यदि 500 पौधा प्रति एकड़ में है तो 4 x 2 मीटर का फासला रखें। यदि 1000 पौधा प्रति एकड़ में है तो 2 x 2 मीटर फासले का प्रयोग करें। पौधा का फासला इस तरह रखें ताकि नर पौधों का परागण मादा फूलों से आसानी से हो जाये और अधिक से अधिक पैदावार ली जा सके।  
 
बीज की गहराई
पौधों को 30 सैं.मी x 30 सैं.मी. x 30 सैं.मी. आकार के खड्डों में बोया जाता है।
 
बिजाई का ढंग
बीजों को मुख्य खेत में सीधे बोकर, पौधों का रोपण करके या टिशु कल्चर आदि ढंगों का प्रयोग किया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में नए पौधों के लिए 2-2.4 किलोग्राम ताजे बीजों की आवश्यकता होती है।

बीज का उपचार
बिजाई से पहले बीजों को गर्म या ताजे पानी में 8-10 घंटे के लिए डुबोया जाता है। उसके बाद कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 3-5 मिनट के लिए बीजों का उपचार किया जाता है और फिर बीजों को हवा में सुखाने के बाद बिजाई के लिए प्रयोग किया जाता है।
 

पनीरी की देख-रेख और रोपण

प्रजनन के लिए बीजों, पौधों, जड़ों की कटिंग का प्रयोग किया जाता है। खेत में सीधी बिजाई से पौधे कमज़ोर और  उनका असमान विकास होता है। वे कीटों और बीमारियों के प्रति संवेदनशील भी होते हैं। इसलिए नर्सरी में बिजाई और फिर रोपण एक उपयुक्त और उत्पादक ढंग है। रोपाई करके प्राप्त पौधों की उपज सीधी बिजाई करने से प्राप्त उपज से 20-40 प्रतिशत ज्यादा होती है।
 
वर्ष में दो बार अक्तूबर और मार्च महीने में नर्सरी तैयार करें।विश्वसनीय स्त्रोतों से खरीदे गए अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का प्रयोग करें। बीजों को पॉलीथीन (बैग) के लिफाफों में तैयार करें। लिफाफे (बैग) लगभग 23 x 10 सैं.मी. आकार के और मोटाई 300 गेज होनी चाहिए। इनमें रेतली मिट्टी के साथ अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर 3:1 में डालें।पानी के निकास के लिए लिफाफों के आधे से नीचे वाले हिस्से पर 6-8 छेद बनायें। बिजाई के बाद दिन में दो बार पानी दें ताकि लिफाफों में नमी बने रहे। जब पौधे एक महीने के हो जायें तो एक दिन में एक बार पानी दें। पौधों को मजबूत बनाने के लिए, पौधों का स्थान नर्सरी में दो बार बदलें। जब पौधे 5 महीने के हो जायें, तब वे रोपाई के लिए तैयार होते हैं। प्रति खड्ढे में दो पौधे लगाएं और अगर जड़ का भाग लगाना हो तो एक खड्ढे में एक पौधा लगाएं। मादा पौधों की 10 कतारों के लिए, एक कतार नर पौधों की रखें।
 

अंतर-फसलें

बिजाई के शुरूआती वर्षों के दौरान, अतिरिक्त आय प्राप्त करने के लिए अंतरफसली भी अपनाई जा सकती है। छोटे कद वाली फसलों को ज्यादा खाद और पानी की आवश्यकता नहीं होती और रेगिस्तान में उगाने के लिए भी उपयुक्त होती हैं इसलिए इन्हें अंतरफसली के रूप में भी लिया जा सकता है। मोठ, चने, हरी मूंग, इमली, मूंगफली और ककड़ी परिवार से संबंधित सब्जियां आदि को जोजोबा के साथ अंतरफसली के तौर पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
65 95 50

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS
POTASH
30 15 30

 

पहले वर्ष में नाइट्रोजन 30 किलो (यूरिया 65 किलो), फासफोरस 15 किलो (एस एस पी 95 किलो) और पोटाश 30 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 50 किलो) प्रति एकड़ में डालें। पौधे की वृद्धि और विकास के साथ खादों की मात्रा बढ़ाकर नाइट्रोजन और पोटाश 6 किलो प्रति एकड़ में और फासफोरस 4 किलो प्रति एकड़ में डालें। खादों को दो भागों में आधी खाद की मात्रा जुलाई-अगस्त में और दूसरी मात्रा फरवरी महीने में डालें।

 

 

सिंचाई

पौधे की अच्छी व्यवस्था के लिए, शुरूआती दिनों में जैसे कि दो वर्षों तक हल्की सिंचाई करें। पूरी तरह से विकसित पौधों को सिंचाई मिट्टी की बनतर, जलवायु और पौधों को आवश्यक पानी के आधार पर दें। परिपक्व पौधे पानी की कमी वाले हालातों को सहन कर सकते हैं, लेकिन यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो समय पर सिंचाई करें। यह पौधे की अच्छी वृद्धि और अच्छी उपज में मदद करेगा।
फूल निकलने और बीजों का पकना सिंचाई के लिए गंभीर अवस्थाएं होती हैं। पानी की कमी होने पर, फूल निकलने और बीजों के पकने की अवस्था के दौरान 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई दें।
जोजोबा की खेती के लिए ड्रिप सिंचाई एक कुशल ढंग है।
 

कटाई और छंटाई

जून और जुलाई में कटाई के बाद, अच्छी उत्पादकता के लिए टहनियों और शाखाओं में हल्की छंटाई हर साल करें।

पौधे की देखभाल

दीमक
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
दीमक : इसे सामान्य तौर पर नए पौधों की अवस्था में पाया जाता है।
आखिरी जोताई के समय दीमक से प्रभावित खेत में फोरेट 4-5 किलो प्रति एकड़ में डालें।
यदि दीमक का हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी @1 लीटर को  प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
पौधों की जड़ों का गलना
पौधों की जड़ों का गलना : यह नये पौधे निकलने की अवस्था में पायी जाने वाली बीमारी है, जिससे पौधे मर भी जाते हैं।
यदि इसका हमला दिखे तो कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम + स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 1 ग्राम + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
 

फसल की कटाई

यह बिजाई के चौथे वर्ष से लेकर 150 वर्षों तक उपज देता है। तुड़ाई हाथों से ही की जाती है। पके फलों की तुड़ाई हाथों से की जाती है। सभी फल एक समय पर परिपक्व नहीं होते इसलिए फलों के पकने पर ही तुड़ाई की जाती है।

कटाई के बाद

जोजोबा के पूरे फल में 36 प्रतिशत छिल्का, 64 प्रतिशत बीज और 50 प्रतिशत तेल होता है। पके फलों की तुड़ाई के बाद, फलों के ऊपर से रेत/मिट्टी, पत्थर, मिट्टी की गीली परत, छोटी टहनियां और पत्तों को हटा दें। बीजों को साफ करें और धूप में सुखाएं और पी सी सी के सूखे फर्श पर रखें।