इसबगोल की फसल के बारे में जानकारी

आम जानकारी

ईसबगोल, तना रहित जड़ी बूटी है जो कि भारत की महत्तवपूर्ण औषधीय फसल है। ईसबगोल का नाम फारसी शब्द एस्पोलग से लिया गया है जिसका अर्थ है- घोड़े के कान। इसकी भूसी के कई औषधीय मुल्य हैं। ईसबगोल से तैयार दवाइयों का उपयोग कब्ज, दस्त, बवासीर, अस्थमा, किडनी समस्या आदि के इलाज के लिए किया जाता है। इसके औषधीय मूल्यों के अलावा इसका उपयोग खाद्य उपयोग में किया जाता है। जैसे आइसक्रीम, बिस्कुट और कैंडीज़। भारत ईसबगोल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। भारत में राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा ईसबगोल के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। राजस्थान में इसे व्यापारिक स्तर पर उगाया जाता है और इसके उत्पादन और क्षेत्र में यह राज्य पहले स्थान पर आात है। पाली, जोधपुर, बड़मेर और जलौर राजस्थान में ईसबगोल के मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    20-35°C
  • Season

    Rainfall

    50-125cm
  • Season

    Temperature

    20-35°C
  • Season

    Rainfall

    50-125cm

मिट्टी

इसे मिट्टी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है पर यह अच्छे निकास वाली रेतली दोमट मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। मिट्टी की पी एच 4.7-7.7 होनी चाहिए। मिट्टी में नाइट्रोजन की उच्च मात्रा ईसबगोल की रोपाई के लिए अच्छी होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

RI-87, RI-89, AMB-2, MI-4, TS-1-10, EC 124345
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
GI 1 (Gujarat Isabgol-1): यह किस्म आनंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, गुजरात द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 320-360 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GI 2 (Gujarat Isabgol-2): यह किस्म आनंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, गुजरात द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 360-400 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GI-3 (Gujarat Isabgol-3): यह किस्म एस डी एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी, सरदारखरूशी नगर, गुजरात द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 520 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Niharika: यह किस्म CIMAP, लखनऊ, उत्तर प्रदेश द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 400-480 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Haryana Isabgol-5:  यह किस्म सी सी एस हरियाणा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर , हिसार, हरियाणा द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 400-480 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Jawahar Isabgol-4 (MIB-4): यह किस्म एस डी एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी, सरदारखरूशी नगर, गुजरात द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 520-600 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
MIB 121, HI 34, HI 2, HI 1,
 

ज़मीन की तैयारी

मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की जोताई करें। आखिरी जोताई के समय अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर 40-48 किलो प्रति एकड़ में डालें। मिट्टी को भूमि के आकार में 8-12 मीटर  x मीटर में विभाजित करें।

बिजाई

बिजाई का समय
ईसबगोल की बिजाई के लिए उपयुक्त समय अक्तूबर से नवंबर का महीना होता है। पिछेती बिजाई (दिसंबर के पहले पखवाड़े के बाद) ना करें क्योंकि यह पैदावार में कमी को बढ़ाता है।
 
फासला
पौधे से पौधे में 15 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को 1-2 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
बीजों को बोने के लिए बुरकाव ढंग या कतार में बिजाई ढंग का प्रयोग किया जाता है। बुरकाव करने के बाद बिजाई के समय  झाड़ू की मदद से बीजों को मिट्टी में मिला दें।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 2-3 किलोग्राम बीजों को प्रयोग करें। इसके बीज छोटे होते हैं इसलिए बीजों की मात्रा बढ़ाने के लिए उसमें रेत या खाद मिला ली जाती है।

बीज का उपचार
मिट्टी से पैदा होने वाली फंगस से बचाने के लिए कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम या कप्तान 5 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के लिए PSB + अज़ोटोबैक्टर 200 ग्राम से बीजों का उपचार करें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
45 65 20


तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
20 10 12

 

ईसबगोल की पूरी फसल को नाइट्रोजन 20 किलो (यूरिया 45 किलो), फासफोरस 10 किलो (एस एस पी 65 किलो) और पोटाश 12 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 20 किलो) प्रति एकड़ में आवश्यकता होती है।
 
नाइट्रोजन की आधी और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन को बिजाई के एक महीना बाद डालें।
 

 

 

सिंचाई

भारी मिट्टी के मुकाबले हल्की मिट्टी को ज्यादा संख्या में सिंचाई की आवश्यकता होती है। मिट्टी की किस्म, जलवायु के आधार पर ईसबगोल फसल को 7-10 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। बिजाई के तुरंत बाद, हल्की सिंचाई करें। इससे बीजों का अंकुरण जल्दी होगा। यदि अंकुरण ठीका ना हो तो एक ओर सिंचाई करें। दूसरी और तीसरी सिंचाई बिजाई के 30वें और 70वें दिन करें। डंडियां बनने के समय सिंचाई के लिए महत्तवपूर्ण होता है। आखिरी सिंचाई दुधिया अवस्था में करें। 

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की तीव्रता के आधार पर हाथों से गोडाई करें। बिजाई के दो महीनों में 2-3 गोडाई की आवश्यकता होती है। बिजाई के 20-25 दिनों के आद पहली गोडाई करें।

पौधे की देखभाल

सफेद सुंडी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
सफेद सुंडी : यदि इसका हमला दिखे तो 10 प्रतिशत फोरेट 4 किलो या क्विनलफॉस 300 मि.ली. या क्लोरपाइरीफॉस 1.5-2.0 मि.ली के साथ नमी वाली मिट्टी में डालें।
 
चेपा
चेपा : यदि इसका हमला बिजाई के 50-60 दिनों के बाद देखा जा सकता है। इसका हमला दिखने पर ऑक्सीडेमेटन मिथाइल 2.5 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। आवश्यकतानुसार 12-15 दिनों के अंतराल पर दूसरी स्प्रे करें।
 
पत्तों के धब्बा रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग : पत्तों के ऊपर और प्रभावित पौधे के तने के ऊपर भी सफेद रंग के धब्बे देखे जा सकते हैं। इसके हमले के कारण पत्ते गिरने लगते हैं।
यदि इसका हमला दिखे तो पानी में घुलनशील सलफर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर 10-14 दिनों के अंतराल पर 2-3 स्प्रे करें।
 
राइज़ोक्टोनिया सूखा
राइज़ोक्टोनिया सूखा : एक निवारक उपाय के रूप में कप्तान 5 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। फसल के ऊपर भी कप्तान 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। सात दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।
 
पत्तों के निचले धब्बे
पत्तों के निचली ओर धब्बे : यह ईसबगोल की गंभीर बीमारी है, जो कि नोक बनने के समय दिखाई देती है। नमी और बादलवाई वाले मौसम में यह बीमारी होती है।
इसकी रोकथाम के लिए बिजाई के 30 दिन बाद कॉपर युक्त फंगसनाशी जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्राम या डाइथेन एम 45, 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 10-15 दिनों के अंतराल पर तीन बार स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

किस्म के आधार पर बिजाई के 4-5 महीने बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई का सही समय तब होता है जब नोक अपना रंग बदलकर भूरे रंग में और निचला पत्ता पीले रंग का हो जाता है। उंगलियों के बीच दबाने पर दाने बाहर निकल आते हैं। कटाई सुबह के समय 10 बजे के बाद करें। कटाई ज़मीनी स्तर से करें।

कटाई के बाद

कटाई के बाद फसल को इक्ट्ठा करें और फर्श पर 1-2 दिन के लिए खिलार दें। सुखाने के बाद ट्रैक्टर या बैल से दानों को अलग कर लें। मील्ज़ में उत्पाद बनाने के समय बीजों से उसका छिल्का उतार दिया जाता है। 
 
बीजों की औसतन पैदावार 360-600 किलो और भूसी की पैदावार 90-150 किलो प्रति एकड़ प्राप्त होती है।