ज़मीन की तैयारी
सीताफल की खेती के लिए अच्छी तरह से तैयार ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी के भुरभुरा होने तक मोल्डबोर्ड हल की सहायता से दो बार जोताई करें और समतल करें।
सीताफल की खेती के लिए अच्छी तरह से तैयार ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी के भुरभुरा होने तक मोल्डबोर्ड हल की सहायता से दो बार जोताई करें और समतल करें।
सीताफल का वानस्पतिक नाम “एनोना स्कवामोसाल” है और एनोनासीए परिवार से संबंधित है। यह खाने में स्वाद और सूखी ज़मीन का फसल है। यह विटामिन सी, पोटाशियम, मैगनीशियम और आयरन का उच्च स्त्रोत है। इसके फल में कुछ मात्रा में संतृप्त वसा, सोडियम और कोलैस्ट्रोल की मात्रा होती है। अच्छे पोषक तत्व होने के कारण इसे सेहत के लिए आदर्श फल के रूप में भी जाना जाता है। इसके वृक्ष का कद 4.5-10 मीटर होता है और यह पीले रंग के तुरही के आकार के होते हैं। फूलों से पीले रंग के फूल बनते हैं जो पकने पर भूरे रंग के हो जाते हैं। फल का व्यास 8-16 सैं.मी. होता है। यह ज्यादातर फिलिपिन्स, मिस्र, केंद्रीय अमेरिका और भारत में उगाया जाता है। कोलकाता, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, केरला, कर्नाटक, गुजरात, तेलंगना, आंध्र प्रदेश, अंडेमान और निकोबार मिज़ोरम भारत के सीताफल उगाने वाले मुख्य राज्य हैं। फल कब्ज का उपचार करने के लिए उपयोगी है, गठिया को कम करने और मांसपेशियों की कमज़ोरी से लड़ने में मदद करता है।
रेतली दोमट मिट्टी सीताफल की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है लेकिन चिकनी दोमट मिट्टी भी सीताफल की खेती के लिए उपयुक्त है। हल्के निकास वाली मिट्टी, भारी चिकनी या पथरीली मिट्टी में इसकी खेती ना करें। उस ज़मीन पर भी इसकी खेती करने से परहेज़ करें जहां पहले टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च और अदरक की फसल बोयी गई हो। सीताफल की खेती के लिए हमेशा वह मिट्टी उपयुक्त होती है जिसकी पी एच 7.5 से ज्यादा हो।
| UREA | SSP | MOP |
| 400 | 250 | - |
खेत की तैयारी के समय 30 किलो गली हुई रूड़ी की खाद डालें और मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें। नाइट्रोजन 400 ग्राम, फासफोरस 250 ग्राम प्रति पौधे में डालें। नाइट्रोजन को तीन भागों में पहला जनवरी के महीने में, दूसरा जुलाई के महीने में और तीसरा नवंबर महीने में डालें। फासफोरस को दो भागों में पहला जनवरी में और फिर जुलाई के महीने में डालें।
जब पौधे कलियों या ग्राफ्टिंग विधि से उगाए जाते हैं तो तने को आकार दिया जाता है। तने की अच्छी वृद्धि के लिए कम मात्रा में छंटाई की आवश्यकता होती है। इसके फलस्वरूप लंबे समय तक अच्छी उपज प्राप्त होगी।
यह एक बारानी फसल है इसलिए इसे सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन अगेती कटाई के लिए फूल निकलने के समय सिंचाई दें जैसे मई के महीने में मॉनसून के शुरू होने तक लगातार करें। अच्छे फूल और फल निकलने के लिए फव्वारे से धुंध बनाकर सिंचाई करना अच्छा होता है। इससे तापमान को कम करने और नमी में वृद्धि करने में भी मदद मिलेगी।
शुरूआती 5 वर्षों तक हाथों से गोडाई करें। मिट्टी के तापमान को कम करने के साथ साथ नदीनों के नियंत्रण के लिए मलचिंग भी एक प्रभावी तरीका है।
राजस्थान में, सितंबर-नवंबर महीने में इसकी कटाई की जाती है। वृक्ष तीसरे वर्ष में उपज देना शुरू करता है। इसकी औसतन पैदावार 30 क्विंटल प्रति एकड़ होती है और उच्च घनता वाले क्षेत्रों में इसकी औसतन पैदावार 100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
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