अरंडी की जानकारी

आम जानकारी

अरंडी मुख्य रूप से इसके बीजों के लिए उगाया जाने वाला वार्षिक पौधा है। इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने के लिए प्रयोग नहीं होता है, पर इसका उद्योगिक स्तर पर काफी प्रयोग होता है। इसका उपयोग साबुन बनाने, स्याही प्रिंट करने और लुबरीकैंट के रूप में किया जाता है। इसके अलावा औषधीय और प्रकाश उद्देश्य से भी इसका उपयोग किया जाता है। तेल निकालने के बाद बाकी बचे तेल केक को जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। भारत अरंडी का मुख्य उत्पादक देश है और भारत में गुजरात, आंध्र प्रदेश और राजस्थान मुख्य अरंडी उत्पादक राज्य हैं।

मिट्टी

व्यापारिक खेती के लिए कम उपजाऊ भूमि का प्रयोग अरंडी की खेती के लिए किया जाता है पर यह गहरी, अच्छे निकास वाली, उपजाऊ, हल्की तेजाबी रेतली दोमट मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। मिट्टी की पी एच 5 से 8.5 होनी चाहिए।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

GCH 7: यह हाइब्रिड किस्म सिंचित हालातों में उगाने के लिए उपयुक्त है, इसकी औसतन पैदावार 13-14.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह नेमाटोड के प्रतिरोधक किस्म है।
 
D.C.S 9 (Jyoti) : सिंचित हालातों में यह 10-11 क्विंटल प्रति एकड़ औसतन पैदावार देती है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 45 प्रतिशत होती है।
 
R.H.C 1: यह हाइब्रिड किस्म सिंचित और असिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 49 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 12-14 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
G.C.H 5: यह हाइब्रिड किस्म सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 49 प्रतिशत होती है। इसकी सिंचित हालातों में औसतन पैदावार 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
G.C.H 4: यह हाइब्रिड किस्म 210-240 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह जड़ गलन बीमारी की प्रतिरोधक किस्म है। सिंचित हालातों में उगाने पर यह 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ औसतन पैदावार देती है।
दूसरे राज्यों की किस्में
 
Gujarat Castor -2:  किस्म
 
DCH -32 (Deepti): हाइब्रिड
 
GCH-177 (Deepak): हाइब्रिड
 
DSP 222: हाइब्रिड
 
DCH-519: यह हाइब्रिड किस्म सिंचित और बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म सूखे के प्रतिरोधी है।
 

ज़मीन की तैयारी

गर्मियों में खेत की तीन से चार बार गहरी जोताई करें। इससे नदीनों को खत्म करने और मिट्टी में नमी रखने में मदद मिलेगी। डलियों को तोड़ने के लिए जोताई के बाद तवियों से जोताई करें। फिर मिट्टी के स्तर को समतल करें ताकि खेत में पानी ना खड़ा रह सके।

बिजाई

बिजाई का समय
अरंडी को पूरे वर्ष उगाया जा सकता है, जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो। अरंडी की खेती के लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह से लेकर अगस्त का पहला सप्ताह उपयुक्त होता है।
 
फासला
फासला किस्म और बिजाई के समय पर आधारित होता है। सिंचित हालातों में 90सैं.मी.x60 सैं.मी. या 120 सैं.मी.x 60 सैं.मी.फासले का प्रयोग करें। जब कि बारानी हालातों में 60 सैं.मी.x45 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को ज्यादा गहराई में बोने से परहेज़ करें। इन्हें 5 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर की जाती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
यह बिजाई के ढंग पर आधारित होती है। यदि बीजों को हल के पीछे डालना है तो ज्यादा बीजों की मात्रा 4.5 से 6 किलोग्राम प्रति एकड़ में आवश्यकता होती है। यदि गड्ढा खोदकर बिजाई की जाए तो 2.5 से 3.3 किलोग्राम प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है।
 
बीज का उपचार
फसल को मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। 
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

  UREA SSP MOP
Rainfed 35 50 -
Irrigated 70 100

-

 

 तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

  NITROGEN PHOSPHORUS
POTASH
Rainfed 16 8 -
Irrigated 32 16

-

 

बरानी क्षेत्रों के लिए : नाइट्रोजन 16 किलो (यूरिया 35 किलो), फासफोरस 8 किलो (एस एस पी 50 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची यूरिया की आधी मात्रा को बिजाई के 30 दिनों के बाद डालें।
 
सिंचित क्षेत्रों के लिए : नाइट्रोजन 32 किलो (यूरिया 70 किलो), फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा बीजों को बोने से पहले डालें। बाकी बची नाइट्रोजन को दो भागों में बिजाई के बाद 35वें और 90वें दिन डालें।
 
तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए बीज बोने से पहले सल्फर 16 किलो प्रति एकड़ में डालें।
 

 

 

सिंचाई

अरंडी की पूरी फसल को 17-20 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। बारिश के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। बारिश की तीव्रता और नियमितता के आधार पर सिंचाई दें। पहली सिंचाई बिजाई के बाद 60-75 दिनों के बाद करें। पौधों में फूल निकलने के समय पानी की कमी ना होने दें। पकने की अवस्था में सिंचाई बंद कर दें।

खरपतवार नियंत्रण

शुरूआती अवस्था में नदीनों की रोकथाम बहुत महत्तवपूर्ण है। बिजाई के 20वें और 50वें दिन बाद हाथों से दो बार गोडाई करें। बिजाई के दूसरे और तीसरे दिन बाद पैंडीमैथालीन 1 लीटर को 250 लीटर पानी में मिलाकर डालें। यह घास और चौड़े पत्तों वाले नदीनों को रोकने में सहायक होगा।

पौधे की देखभाल

सेमी सुंडी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
हरी और लंबी सुंडी (सेमी सुंडी) : यह पत्तों को खाकर फसल को नुकसान पहुंचाती है जिसके कारण पत्ते गिर जाते हैं।
हमला कम होने पर नीम का अर्क 40 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। क्विनलफॉस 2 मि.ली. या क्लोरपाइरीफॉस 4 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
थ्रिप्स और सफेद मक्खी
थ्रिप्स और सफेद मक्खी : इससे बचाव के लिए इमीडाक्लोप्रिड 5 मि.ली. से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यदि इसका हमला दिखे तो मैलाथियोन या क्लोरपाइरीफॉस 5 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
अरंडी की शाख का छेदक
अरंडी की शाख का छेदक : सुंडी शाख और फल में छेद कर देती है जिसके कारण फसल को नुकसान पहुंचता है।
प्रभावित शाखाओं और फलों को इकट्ठा करके खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। यदि इसका हमला दिखे तो क्विनलफॉस 50 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
पौधों का झुलस रोग
  • बीमारियां और रोकथाम
पौधों का झुलस रोग : इसका हमला पहले पत्तों पर होता है फिर तने तक पहुंच जाता है जिसके कारण पत्तों का रंग बदल जाता है और पत्ते गिर जाते हैं।
थीरम या कप्तान 4 ग्राम से प्रति किलोग्राम बीजों का उपचार करें।
 
कुंगी और पत्ते का झुलस रोग
कुंगी : यदि इसका हमला खेत में दिखे तो मैनकोजेब 400 ग्राम या प्रोपीकोनाज़ोल 400 मि.ली. की स्प्रे प्रति एकड़ में करें।

पत्ते का झुलस रोग : इसकी रोकथाम के लिए थीरम या कप्तान 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यदि इसका हमला खेत में दिखे तो मैनकोजेब 400 ग्राम की स्प्रे प्रति एकड़ में करें।
 
तने का गलना
तना गलन : इससे बचाव के लिए तना गलन की प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें। बिजाई से पहले थीरम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यदि इसका हमला दिखे तो कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में डालकर 15 दिनों के अंतराल पर दो-तीन बार छिड़काव करें।
 
सूखा
सूखा : इस बीमारी के कारण उपज में काफी कमी आती है। यह पौधे निकलने और पौधे के विकास की अवस्था को प्रभावित करती है।
इसकी प्रतिरोधक किस्में उगाएं। सूखे को प्रारंभिक अवस्था में रोकने के लिए ट्राइकोडरमा 1 मिलो में 200 किलोग्राम अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर मिलाकर 3 दिनों के लिए रखें फिर इसे प्रभावित क्षेत्र पर डालें।
 
पत्तों के धब्बा रोग
पत्तों का धब्बा रोग : पत्ते की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं।
बिजाई के तीन महीने बाद घुलनशील सलफर 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो बार स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

किस्म के आधार पर फसल 145-180 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब एक या दो फल सूखते या पीले होते दिखाई दें, तो अरंडी की गुच्छों में कटाई शुरू करें। सभी गुच्छे समान समय पर नहीं पकते इसलिए दो-तीन तुड़ाइयां आवश्यक हैं। तुड़ाई के बाद गुच्छों को धूप में चार से पांच दिन सुखाएं। अच्छी तरह से सूखने के बाद बीजों को अलग कर लें। फलों की जल्दी कटाई ना करें इससे तेल की प्रतिशतता कम हो जाती है।

कटाई के बाद

अच्छी तरह से सूखे हुए फलों में से बीजों को अलग कर लें। उसके बाद बीजों से अरंडी का तेल निकाल लें। तेल निकालने के बाद तेल केक में 8-10 प्रतिशत अरंडी का तेल होता है। तेल केक का प्रयोग खेत में जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।