राजस्थान में ज्वार की फसल

आम जानकारी

राजस्थान में 6.7 लाख हैक्टेयर क्षेत्र ज्वार के उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाता है और इसकी औसतन पैदावार 4.7 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। ज्वार उत्तरी अफ्रीका और मिसरी सुदनीस सरहद पर 5000-8000 वर्ष पहले की जमपल फसल है। यह भारत के अनाजों में तीसरी महत्तवपूर्ण फसल है। यह फसल चारे के लिए और कईं फैक्टरियों में कच्चे माल में प्रयोग की जाती है। यू एस ए और अन्य कईं देशों में इसका प्रयोग होता है। यू एस ए ज्वार की पैदावार में सबसे आगे है। भारत में महांराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गुजरात, तामिलनाडू, राज्यस्थान और उत्तर प्रदेश इस फसल के मुख्य प्रांत हैं। यह खरीफ ऋतु की चारे की मुख्य फसल है।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    25-32°C (Max)
    18°C (Min)
  • Season

    Rainfall

    40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    16-18°C
  • Season

    Temperature

    25-32°C (Max)
    18°C (Min)
  • Season

    Rainfall

    40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    16-18°C
  • Season

    Temperature

    25-32°C (Max)
    18°C (Min)
  • Season

    Rainfall

    40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    16-18°C
  • Season

    Temperature

    25-32°C (Max)
    18°C (Min)
  • Season

    Rainfall

    40cm
  • Season

    Sowing Temperature

    25-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    16-18°C

मिट्टी

यह कई तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती है, पर रेतली मिट्टी और जल निकास वाली मिट्टी में अच्छी उगती है। 6-7.5 पी एच फसल के विकास और वृद्धि के लिए अनुकूल है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

पैकेज वाली किस्में:
 
CSV 15: इस किस्म के पौधे का कद 232 सैं.मी. होता है। यह किस्म 100-112 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 15 क्विंटल और चारे की 50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSV 17: इस किस्म के पौधे का कद 133-140 सैं.मी. होता है। यह किस्म 97 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 10 क्विंटल और चारे की 30 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSV 20: इस किस्म के पौधे का कद 240 सैं.मी. होता है। यह किस्म 109 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 12 क्विंटल और चारे की 55 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSV 22: इस किस्म के पौधे का कद 180-200 सैं.मी. होता है। यह किस्म 120 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 9 क्विंटल और चारे की 20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSV 23: इस किस्म के पौधे का कद 215 सैं.मी. होता है। यह किस्म 110-115 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 10-12 क्विंटल और चारे की 65 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
SSV 84: इस किस्म के पौधे का कद 277 सैं.मी. होता है। यह किस्म 120-125 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 9-10 क्विंटल और चारे की 145-150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pratap Jowar 1430: इस किस्म के पौधे का कद 180-200 सैं.मी. होता है। यह किस्म 90-95 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 15-18 क्विंटल और चारे की 47-50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
हाइब्रिड किस्में:
 
CSH 14: इस किस्म के पौधे का कद 170-200 सैं.मी. होता है। यह किस्म 105-120 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 15-17 क्विंटल और चारे की 35-40 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSH 16: इस किस्म के पौधे का कद 180 सैं.मी. होता है। यह किस्म 110 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 17 क्विंटल और चारे की 40 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSH 17: इस किस्म के पौधे का कद 203 सैं.मी. होता है। यह किस्म 103 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 17 क्विंटल और चारे की 43 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
CSH 27: इस किस्म के पौधे का कद 180 सैं.मी. होता है। यह किस्म 106 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 12 क्विंटल और चारे की 55 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
चारे वाली किस्में:
 
Rajasthan Chari 1: इस किस्म के पौधे का कद 199-220 सैं.मी. होता है। यह किस्म 85-90 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के चारे की औसतन उपज 160-200क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Rajasthan Chari 2: इस किस्म के पौधे का कद 190-220 सैं.मी. होता है। यह किस्म 70 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के चारे की औसतन उपज 125-150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pratap Chari 1080: इस किस्म के पौधे का कद 240-260 सैं.मी. होता है। यह किस्म 60-65 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इस किस्म के दानों की औसतन उपज 15 क्विंटल और चारे की 145-150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
M.P. Chari: इस किस्म की पहली कटाई बिजाई के 55-60 दिनों के बाद की जाती है। इसकी चारे की औसतन पैदावार 145-150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
S.S.G-59-3: इस किस्म की 2-3 कटाई आसानी से की जा सकती है। पहली कटाई बिजाई के 55-60 दिनों के बाद और दसरी कटाई पहली कटाई के 35-40 दिन बाद की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 165-220 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में:
 
SL44: यह मीठी, रसीली, पतले तने वाली किस्म पूरे पंजाब में खरीफ ऋतु में सिंचित हालातों के लिए अनुकूल है। इसकी औसतन पैदावार 240 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Punjab Sudax: यह ज्वार की दोगली किस्म है। इसके पौधे लंबे, पत्ते मोटे और चौड़े होते हैं। तना मीठा और रसीला होता है। सही समय पर बोयी फसल 3 बार काटी जा सकती है। यह किस्म पत्तों के लाल धब्बा रोग की रोधक हैं इसकी औसतन पैदावार 480 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
SSG 59-3
 
Pusa Chari
 
HC 136
 
Pusa Chari 9
 
Pusa Chari 23
 
MP Chari
 
HC 260, HC 171
 
Harasona 855 F
 
MFSH 3
 

 

ज़मीन की तैयारी

प्रत्येक वर्ष गहरी से मध्यम गहरी मिट्टी में एक गहरी जोताई करें। क्रॉस हैरो के बाद 1-2 बार जोताई करें। खेत इस तरह से तैयार करें कि खेत में पानी खड़ा ना रहे।

बिजाई

बिजाई का समय
इसकी बिजाई का सही समय मध्य जून से मध्य जुलाई तक होता है। अगेती हरे चारे के लिए इसकी बिजाई मार्च के मध्य में की जाती है।
 
फासला
बिजाई के लिए फासला 45 सैं.मी.x15 सैं.मी. या 15 सैं.मी. या 60 सैं.मी.x10 सैं.मी. रखें।
 
बीज की गहराई
बीज को 2-3 सैं.मी. से गहरा नहीं बोना चाहिए।
 
बिजाई का ढंग
उत्तरी भारत में ज्वार की बिजाई बुरकाव करके या फिर हलों के द्वारा पंक्तियों में बोयी जाती है। बिजाई के लिए बिजाई वाली मशीन का प्रयोग किया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 18-20 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। कुछ किस्मों के लिए 35-40 किलोग्राम बीजों की आवश्यकता प्रति एकड़ में होती है।
बीज का उपचार
फसल को मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बीज को 300 मैश 4 ग्राम सल्फर पाउडर और अज़ोटोबैक्टर 25 ग्राम प्रति किलो से बीज को बिजाई से पहले उपचार करें।
 
निम्नलिखित में से किसी एक फंगसनाशी का प्रयोग करें।
 
फंगसनाशी दवाई मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज)
Carbendazim 2gm
Captan 2gm
Thiram 2gm
 
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP ZINC
90 80 70 #

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
33-40 15-20 40

 

बिजाई से पहले 10-15 टन हरी खाद या रूड़ी की खाद मिट्टी में डालें। बिजाई के शुरूआती समय में नाइट्रोजन 33 किलो (90 किलो यूरिया), फासफोरस 15 किलो (80 किलो सिंगल सुपर फासफेट) और पोटाश 40 किलो (70 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा नाइट्रोजन की आधी मात्रा से बिजाई के समय डालें। बची हुई खाद बिजाई के 30 दिनों के बाद डालें।

 

 

सिंचाई

अच्छी पैदावार के लिए फूल निकलने के समय और दानों के बनने के समय सिंचाई करें। कई बार सिंचाई नाज़ुक हालात पैदा कर देती है। खरीफ में बारिश के अनुसार 1 से 3 बार सिंचाई की जा सकती है। रबी और गर्मी के समय आवश्यक हालातों में सिंचाई की जानी चाहिए। यदि पानी की कमी हो, तो पानी फूल बनने से पहले और फूल बनने के समय लगाएं।

खरपतवार नियंत्रण

बिजाई से 1-2 दिन बाद मिट्टी में नमी के समय 800 ग्राम एंट्राज़िन प्रति एकड़ में (200 लीटर पानी) के साथ स्प्रे करें। स्प्रे के समय मिट्टी में आवश्यक नमी होनी चाहिए।

पौधे की देखभाल

ज्वार की मक्खी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
ज्वार की मक्खी : यह नए पत्तों के ऊपर अंडे देती है। अंडे सफेद रंग के और बेलनाकार के होते हैं। मक्खी सफेद और काले रंग की होती है। कीड़े पीले रंग के होते हैं जो तने को अंदर से खाते हैं और बढ़ते हैं। तना सूख जाता है और मक्खी के हमले के निशान दिखाता है। वे पौधे आसानी से उखाड़े जा सकते हैं जिनके ऊपर मक्खी का हमला होता है। उनमें से बदबू आती है। यह 1 से 6 सप्ताह के पौधे पर ज्यादा आती है।
 
रोकथाम के लिए बिजाई में देरी ना करें। फसल काटने के बाद खेत साफ करें और बचे पौधे बाहर निकाल  दें। बिजाई के समय फोरेट 10 ग्राम 7 किलोग्राम प्रति एकड़ या कार्बोफिउरॉन 13 किलो प्रति एकड़ इसे रोकने में मदद करती है। बिजाई से पहले बीज को इमीडाकलोप्रिड 700 डब्लयु एस 10 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। हमले की हालत में मिथाइल डीमेटन 25 ई सी 200 मि.ली. प्रति एकड़ और डाइमैथोएट 30 ई सी 200 मि.ली. प्रति एकड़ और डाइमैथोएट 30 ई सी 200 मि.ली. प्रति एकड़ प्रयोग करें।
 
तना छेदक
तना छेदक : इसके अंडे लंबे पत्ते के नीचे की ओर गुच्छे में होते हैं। यह सुंडी पीले भूरे रंग की होती है। जिसका सिर भूरा होता है। पतंगे तूड़ी रंग के होते हैं। हमले के दौरान पत्तों का सूखना और उनका झड़ना देखा जा सकता है। पत्तों के ऊपर छोटे छोटे सुराख नज़र आते हैं।
 
रोशनी वाले कार्ड आधी रात के समय सुंडी और पतंगे को अपनी तरफ खींचता हैं और मार देता है। फोरेट 5 किलोग्राम या कार्बोफिउरॉन 3 जी 10 किलोग्राम को मिट्टी में मिलाएं और 20 किलो मात्रा बनाकर प्रति एकड़ में पत्तों के बीच में डालें। कार्बरिल 800 ग्राम एस 50 डब्लयु पी की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
गोभ की सुंडी
गोभ की सुंडी : इसके अंडे सफेद और गोल आकार के होते हैं। इसके शरीर पर अलग अलग रंग देखने को जैसे कि हरे से भूरा और फिर भूरे से धारीदार गहरा भूरा। पतंगे हल्के भूरे-पीले रंग के होते हैं। इसके हमले का पता आधे खाए हुए दानों से लगता है। इसका मल दानों में ही होता है।
 
हमले की तीव्रता के लिए रोशनी वाले कार्ड प्रयोग किए जा सकते हैं। फूल से दानों के समय नर को खींचने वाले सैक्स 5 फेरोमोन कार्ड प्रति एकड़ में प्रयोग करें। कार्बरिल 10 डी 1 किलो प्रति एकड़ या मैलाथियॉन 5 डी 10 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
 
बलियों की सुंडी
बलियों की सुंडी : जिन दानों में दूध होता है। कीड़े और सुंडी वे ही पी जाते हैं। इस कारण दाने सुंगड़ जाते हैं। दानों में सुंडियां देखी जा सकती हैं। सुंडियां बेलनाकार की और हरे रंग की होती हैं। नर सुंडी हरे रंग होती हैं। मादा सुंडी हरे रंग की और ऊपर भूरे रंग की धारियां होती हैं।
 
बलियों के तीसरे और अठारवें दिन कार्बरिल 10 डी 10 किलो प्रति एकड़ या मैलाथियॉन 5 डी 10 किलो प्रति एकड़ स्प्रे करें। जब 10 प्रतिशत बलियां बाहर निकल आयें तो मैलाथियॉन 50 ई सी 400 मि.ली को 200 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 
ज्वार का मच्छर
ज्वार का मच्छर : ज्वार की मक्खी छोटी और मच्छर जैसी संतरी पेट वाली होती हैं। इसके पंख पानी रंग के होते हैं। सुंडी दानों को खाती है। छोटी सुंडी अंडकोश को खाती है और उन्हें तबाह कर देती है। आधे खाए हुए दाने भी देखे जा सकते हैं। लाल चिपकने वाला पदार्थ सुंडियों की उपस्थिति बता देता है। रोशनी कार्ड इन्हें खींचने के लिए प्रयोग किया जाता है।
 
कार्बरिल 10 डी 10 किलो प्रति एकड़ या मैलाथियॉन 5 डी 10 किलो प्रति एकड़ की स्प्रे बलियों के तीसरे और अठारवें दिन करें।
 
एंथ्राक्नोस
  • बीमारियां और रोकथाम
एंथ्राक्नोस छोटे छोटे लाल धब्बे बलियों के बीच में से पत्ते के दोनों तरफ दिखाई देते हैं। फल के ऊपर सफेद परत के ऊपर छोटे छोटे फंगस के काले धब्बे बन जाते हैं। गोल नसूर तने और फूलों के ऊपर बन जाते हैं। जब झुलसे हुए तने को काटते हैं तो बदला हुआ रंग दिखता है। यह बिमारी लगातार बारिश 28-30 तापमान और ज्यादा नमी के कारण फैलती है।
 
लगातार एक ही फसल उगाने से परहेज़ करें। फसल चक्र अपनाएं। रोधक किस्मों का प्रयोग करें। फसल बीजने से पहले 3 ग्राम कप्तान या थीरम प्रति किलो बीज के लिए प्रयोग करें। हमले की सूरत में मैनकोजेब 300 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 400 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 

 

कुंगी
कुंगी : यह किसी भी समय फसल को नुकसान कर सकती है। छोटे-छोटे भूरे लाल धब्बे पत्ते के निचली तरफ होते हैं। बड़े-बड़े दाग पत्ते के दोनों तरफ देखे जा सकते हैं। मसलने पर यह लाल चूरे की तरह दिखाई देते हैं। कम तापमान 10-12 डिगरी सैल्सियस के साथ बारिश इस बीमारी के लिए लाभकारी है।
 
रोधक किस्मों का प्रयोग करें। मैनकोजेब 250 ग्राम को  150 लीटर पानी में मिलाकर या सल्फर 10 किलोग्राम को प्रति एकड़ में बुरकाएं।
 
गुंदिया रोग
गुंदिया रोग : चिपकने पदार्थ का निकलना इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं। यह पदार्थ कीड़े और कीड़ियों को खींचता है। बलियां काली दिखती हैं। प्रभावित पौधों की जड़ों के पास सफेद दाग देखे जा सकते हैं। ज्यादा नमी, तेज बारिश के साथ ठंडा मौसम इस बीमारी के लिए अनुकूल वातावरण होता है।
 
रोधक किस्म का प्रयोग करें। बीजने से पहले बीज को 2 प्रतिशत खारे पानी में भिगोकर रखें और सुंडी को बाहर निकाल लें। बीज को कप्तान या थीरम 4 ग्राम प्रति किलो से उपचार करें। जीरम, जिनेब, कप्तान या मैनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर बलियां निकलने पर प्रयोग करें। दूसरी स्प्रे 50 प्रतिशत फूलों के समय करें। जरूरत पड़े तो एक सप्ताह बाद फिर स्प्रे करें।
 
दानों पर फंगस
बलियों का रोग : नमी वाला मौसम फूलों के समय बलियों पर काई की वृद्धि को मदद करता है। घनी बलियों पर यह बीमारी ज्यादा हमला करती है।
 
देरी से बिजाई ना करें। रोधक किस्मों का प्रयोग करें। बिजाई से पहले बीज को थीरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। मैनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर या कप्तान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 
पत्तों के निचले धब्बे
पत्तों के नीचे धब्बा रोग : यह रोग पत्तों के निचली ओर से शुरू होता है। यह पत्ते पीले और हरे दिखाई देते हैं।
 
एक ही खेत में फसल को लगातार ना उगाएं। फसल को दालों और तेल वाली फसलों से बदल बदल कर बोयें। रोधक किसमों का प्रयोग करें। बिजाई से पहले बीज को मैटालैक्सिल 4 ग्राम प्रति किलो बीज प्रयोग करें। यदि नुकसान बढ़ जाये तो मैटालैक्सिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या मैनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 
झुलस रोग
पत्ता झुलस रोग : शुरूआत में छोटे छोटे धब्बे दिखाई देते हैं। पुराने पौधों के ऊपर लंबे आकार के तुड़ी रंग जैसे गहरे धारीदार धब्बे दिखाई देते हैं। बीच में आस पास काली धारियां होती हैं। यह पत्ते के ज्यादा हिस्से को तबाह करता है अैर पत्ता जला हुआ दिखाई देता है। ज्यादा बारिश और नमी वाला मौसम बीमारी के लिए अच्छा है।
 
रोधक किस्मों का प्रयोग करें। अंतरफसली अपनायें। बीज बीजने से पहले बीज को थीरम या कप्तान 4 ग्राम प्रति किलो से उपचार करें। बीमारी की हालत में मैनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। 15 दिनों के बाद दूसरी स्प्रे करें।
 
दानों की कालिख/ करनाल स्मट
दानों की कालिख/ करनाल स्मट : दानों के बनने के समय यह बीमारी देखी जा सकती है। दाने गंदे सफेद और सफेद क्रीम से ढके होते हैं। बलियां निकलने से पहले प्रभावित पौधे देखे जा सकते हैं। यह सेहतमंद पौधे से छोटे होते हैं। दाने पहले निकल आते हैं।
 
बीमारी वाले बीजों का प्रयोग ना करें। रोधक किस्मों का प्रयोग करें। फसलों की अदला बदली करें। बिजाई से पहले बीज को थीरम या कप्तान 3 ग्राम प्रति किलो से उपचार करें।
 

फसल की कटाई

बिजाई के 65-85 दिन बाद जब फसल चारे का रूप ले लेती है तब इसकी कटाई करनी चाहिए। इसकी कटाई का सही समय तब होता है जब दाने सख्त और नमी 25 प्रतिशत से कम हो। जब फसल पक जाये तो तुरंत कटाई कर लें। कटाई के लिए दरांती का प्रयोग करें। पौधे धरती के नज़दीक से काटें। कटाई के बाद काटी फसल को एक जगह पर इक्ट्ठी करें और अलग अलग आकार की भरियां बना लें। कटाई के 2-3 दिन बाद बलियों में से दाने निकालें। कई बार खड़ी फसल में से बलियां काटकर अलग अलग कर ली जाती हैं और फिर बलियों की छंटाई कर ली जाती है। इसके बाद इन्हें धूप में सुखाया जाता है।

कटाई के बाद

सूखने के बाद छड़ी की सहायता से फसल को झाड़ लें। दाने इक्ट्ठे करें। धूप में 6-7 दिन रखें ताकि 13-15 प्रतिशत नमी हो जाये। साफ किये दाने सूखी और साफ जगह पर जमा कर लें।