zire-1.jpg

आम जानकारी

जीरा भारत का महत्तवपूर्ण मसाला है। इसे रसोई में विभिन्न भोजन पदार्थों में स्वाद के लिए उपयोग किया जाता है। जीरे की औषधीय विशेषताएं भी हैं और पेट दर्द, मोटापे को कम करने आदि के लिए प्रयोग किया जाता है। जीरे के तेल का प्रयोग पशु चिकित्सा और अन्य उद्योगों में किया जाता है। इसका मूल मिसर है और यूरोप, एशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका जीरे के मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं। भारत जीरे का प्रमुख उत्पादक और प्रमुख उपभोक्ता है। भारत में गुजरात और राजस्थान जीरे के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। राजस्थान में जोधपुर, जलौर, बाड़मेर, जैसलमेर, नागौर, पाली जीरा उगाने वाले जिले हैं।

मिट्टी

अच्छे निकास वाली और उच्च कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है। जीरे की खेती के लिए उस ज़मीन का चयन करें जहां 3-4 वर्ष जीरे की खेती ना की गई हो।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

RZ 19: यह किस्म राजस्थान के सभी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह 125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसका पौधा लंबा, फूल गुलाबी रंग के, और दाने बड़े होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 4.2 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RZ 209: यह किस्म राजस्थान के सभी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके दाने स्वाह जैसे भूरे रंग के होते हैं। यह किस्म 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 2.4-2.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म पत्तों के ऊपरी धब्बा रोगों की प्रतिरोधक है।
 
Gujarat Jeera 2: यह किस्म गुजरात कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई है। इसकी औसतन पैदावार 2.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 100 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
 
RZ 223: यह मध्यम समय की किस्म है। यह किस्म 120-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 2.4 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
GC 4: यह किस्म राजस्थान के सभी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके दाने स्वाह जैसे भूरे रंग के होते हैं।यह किस्म 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 2.4-2.8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 

ज़मीन की तैयारी

जीरे की खेती के लिए अच्छी तरह से जोती गई और समतल ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की जोताई करें और मिट्टी को समतल करने के लिए सुहागा फेरें।

बिजाई

बिजाई का समय
जीरे की बिजाई के लिए 15 से 30 नवंबर सही समय होता है।
 
फासला
कतारों में बिजाई के लिए दो पंक्तियों में 30 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को 1-2सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
बिजाई के लिए बुरकाव ढंग या कतार में बिजाई ढंग का प्रयोग करें।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 4-6 किलो बीज पर्याप्त होते हैं।
 
बीज का उपचार
बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। यह बीजों का फंगस संक्रमक से बचाव करेगा।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
32 66 12

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
15 11 7

 

खादों की सही मात्रा के लिए और अतिरिक्त प्रयोग ना करने के लिए मिट्टी की जांच सबसे महत्तवपूर्ण कदम है। फसल की अच्छी वृद्धि और अच्छी उपज के लिए नाइट्रोजन 15 किलो (यूरिया 32 किलो) फासफोरस 11 किलो (एस एस पी 66 किलो) और पोटाश 7 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 12 किलो) को गाय के गले हुए गोबर 2 टन के साथ प्रति एकड़ में डालें।

नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन की आधी मात्रा बिजाई के 35 दिनों के बाद डालें।

 

 

सिंचाई

बिजाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। दूसरी सिंचाई बिजाई के 10 दिनों के बाद अंकुरण के समय करें। उसके बाद तीन सिंचाइयां पर्याप्त होती हैं। बाकी की सिंचाइयां बिजाई के 35वें, 60वें और 85वें दिन बाद करें। एक बार फसल पक जाये तब सिंचाई ना करें। बीज भरने की अवस्था में सिंचाई पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग, चेपे और झुलस रोग के हमले को बढ़ाती है। 

खरपतवार नियंत्रण

जीरे की फसल में  नदीन गंभीर समस्या होते हैं। नदीनों की जांच के लिए लगातार गोडाई और निराई करें। पहली गोडाई बिजाई के 30-35 दिनों के बाद करें जब जीरे की फसल 5 सैं.मी. कद की हो जाये। दूसरी गोडाई पहली गोडाई के 20-25 दिन बाद करें और खेत को नदीन रहित रखें। रासायनिक रोकथाम के लिए बिजाई के 1-2 दिन बाद पैंडीमैथालीन 1 लीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : ये पत्तों का रस चूसते हैं। ये शहद जैसा पदार्थ निकालते हैं जो बाद में सफेद फंगस में विकसित होती है। इसकी रोकथाम के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 200 मि.ली को प्रति एकड़ में स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो 10-15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें या थाइमैथोक्सम 25 डब्लयु जी 40 ग्राम की स्प्रे प्रति एकड़ में करें। आवश्यकतानुसार इसकी दूसरी स्प्रे करें।
 
मुरझाना
  • बीमारियां और रोकथाम
सूखा : पौधे कमज़ोर, पीले और गिरने शुरू हो जाते हैं। पत्ता पहले किनारे से चारों ओर पीला होता है और फिर अंदर की तरफ पीले होते हैं। यह फसल की सभी अवस्थाओं पर हमला करता है।
सूखे की प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें। समान खेत में जीरे की लगातार रोपाई ना करें। अच्छी तरह से अंतरफसली अपनायें। अच्छे निकास का प्रबंध करें। ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।
 
आल्टरनेरिया झुलस रोग
आल्टरनेरिया झुलस रोग : यह एक गंभीर बीमारी है, जिसके कारण पैदावार में बहुत नुकसान होता है। पत्तों पर गहरे, भूरे काले रंग के धब्बे विकसित होते हैं। बीमारी से प्रभावित पौधा बीजों का उत्पादन करने में असफल होता है। बिजाई से पहले कप्तान या थीरम 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। बिजाई के 40 दिन बाद डाइथेन एम-45@2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।
 
पत्तों के धब्बा रोग
पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग : पत्तों के निचले भाग, शाखाओं और फलियों पर सफेद रंग के धब्बे बनने शुरू हो जाते हैं। इसके कीट पौधे को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं। यह रोग फसल के विकास में किसी भी समय विकसित हो सकता है। इसका ज्यादा हमला होने पर पत्तों का गिरना शुरू हो जाता है।
यदि इसका हमला दिखे तो कैराथेन 40 ई सी 80 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। यदि जरूरत हो तो 10 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें या पानी में घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। आवश्यकतानुसार दोबारा स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

जीरे की फसल 100-115 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई दरांती की सहायता से की जाती है। फसल की कटाई के बाद पौधों को फर्श पर खिलार दें और धूप में सुखाने के लिए छोड़ दें। धूप में अच्छे से सुखाने के बाद पौधों से दाने अलग कर लें।

कटाई के बाद

गुरूत्वाकर्षन सैपरेटर से बीजों की अच्छी तरह से सफाई और सुखाने के बाद छंटाई और ग्रेडिंग करें। उसके बाद बीजों को बोरियों में भरकर पैक किया जाता है और एयररेटड स्टोर में स्टोर कर दें।