तारामीरा की बिजाई

आम जानकारी

तारामीरा उत्तर पश्चिमी भारत की एक महत्तवपूर्ण वार्षिक तिलहनी फसल है। इसका तेल सीधा उपभोग के लिए प्रयोग नहीं किया जाता। इसके तीखेपन को बढ़ाने के लिए इसे सरसों के तेल के साथ मिलाया जाता है। इसके पत्तों का स्वाद तीखा होता है और इसे सलाद में  स्वाद के लिए प्रयोग किया जाता है। तारामीरा एक औषधीय पौधा भी है। इसके तेल का प्रयोग खुजली जैसे त्वचा के संक्रमण आदि के उपचार के लिए, तेल मालिश के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग बालों की वृद्धि के लिए प्रयोग होने वाले लोशन तैयार करने के लिए किया जाता है। तारामीरा तेल के कई उद्योगिक उपयोग भी हैं जैसे ग्रीस तैयार करने के लिए किया जाता है। इसके तेल केक का प्रयोग पशुओं के भोजन के रूप में भी किया जाता है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तारामीरा के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। राजस्थान में इसके उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है। गंगानगर, ढोलपुर, अलवर, जयपुर, भारतपुर, भिलवाड़ा, उदयपुर, कोटा तारामीरा के मुख्य उगाने वाले क्षेत्र हैं।

मिट्टी

फसल के अच्छी वृद्धि और उपज के लिए तारामीरा की फसल को हल्की दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। अम्लीय  और खारी वाली मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसकी खेती हल्की रेतली मिट्टी में भी संभव है।

ज़मीन की तैयारी

इसकी खेती ज्यादातर कम बारिश वाले क्षेत्रों और पानी की कमी वाले क्षेत्रों में की जाती है, जहां अन्य फसलें उगाने में असमर्थ या कम उपज देती हैं। पिछली खरीफ फसल की कटाई के बाद यदि पर्याप्त नमी मिट्टी में हो तो हल्की जोताई करें। खेत में से नदीन और जड़ों को निकालें।

बिजाई

बिजाई का समय
यदि पर्याप्त नमी मिट्टी में मौजूद हो तो बिजाई 15 अक्तूबर से 30 नवंबर में पूरी कर लें।
 
फासला
बिजाई के लिए कतार से कतार में 45 सैं.मी. और पौधे से पौधे में 10-15 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
अच्छे अंकुरण के लिए बीजों को 4-5 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
बिजाई के लिए कतार में बिजाई या ड्रिल विधि का प्रयोग किया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 1.5-2 किलो बीज पर्याप्त होते हैं।
 
बीज का उपचार
बिजाई से पहले मैनकोजेब 2 ग्राम या थीरम या कप्तान 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यह बीजों को फंगस से होने वाली बीमारी से बचाता है।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP
MOP
30 40 -

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSHPORUS POTASH
12 6 -

 

नाइट्रोजन 12 किलो (यूरिया 30 किलो), फासफोरस 6 किलो (एस एस पी 40 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें।

 

 

सिंचाई

यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो पहली सिंचाई बिजाई के 40-45 दिनों के बाद करें जैसे फूल निकलने से पहले और दूसरी सिंचाई फलियां बनने के समय करें।

खरपतवार नियंत्रण

नदीनों की जांच के लिए लगातार गोडाई और निराई करें। पहली गोडाई बिजाई के 20-25 दिनों के बाद करें। छंटाई की प्रक्रिया बिजाई के 8-10 दिनों के बाद करें और पौधे से पौधे में 10-15 सैं.मी. का फासला बनाकर रखें।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : ये पत्तों में से रस चूसते हैं और शहद की बूंदों के जैसा पदार्थ छोड़ते हैं जो बाद में फंगस में विकसित हो जाता है।
इसकी रोकथाम के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी को 200 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो 10-15 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें या थाइमैथोक्सम 25 डब्लयु जी 40 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर  प्रति एकड़ में स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो दूसरी स्प्रे करें।
 
झुलस रोग और पत्तों के निचले धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
झुलस रोग और पत्तों के निचले धब्बे : यदि इसका हमला खेत में दिखे तो मैनकोजेब 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें और पहली स्प्रे के 20 दिन बाद दूसरी स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

जब पौधा अपने पत्ते झाड़ने लगे और फलियां रंग बदल कर पीले रंग की हो जाये तो यह समय कटाई के लिए सही समय होता है। दरांती की सहायता से फसल की कटाई करें। कटाई में देरी ना करें क्योंकि दाने पककर खेत में ही गिर जाते हैं।

कटाई के बाद

बीजों को साफ करें और धूप में 4-5 दिनों के लिए सुखाएं। बीजों के अच्छी तरह सूखने के बाद बीजों को बोरयों में भरें।