सोए की खेती

आम जानकारी

सोए वार्षिक घास का पौधा है, जिसकी पत्तियों की अच्छी खुशबू, तीखा स्वाद और पीले रंग के आकर्षित फूल होते हैं। भारतीय सोए का मूल उत्तरी भारत है। इसका पौधा सौंफ के पौधे की तरह 2 से 2.5 फुट का होता है। इसके बीजों और पत्तियों का उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है।यह सूप, सलाद, आचार और चटनी बनाने में प्रयोग किया जाता है। सोए के बीजों और तेल की औषधीय विशेषताएं हैं और इसे दवाई बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। सोए का तेल बीजों, पत्तों और तनों से प्राप्त होता है। भारत और पाकिस्तान सोए के प्रमुख उत्पादक देश हैं। यह भारत में पंजाब,  यू.पी. गुजरात,  महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में उगाया जाता है।

मिट्टी

सोए की खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी अनुकूल होती है। इसकी अच्छी वृद्धि के लिए, अच्छे जल निकास वाली और जैविक तत्व भरपूर मिट्टी अच्छी होती है। मिट्टी की पी एच 5 से 7 के बीच होनी चाहिए और औसतन पी एच 6.2 होनी चाहिए।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Local: इस किस्म का कद 160 सैं.मी. होता है और फूल पीले होते हैं। यह 190 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसका फल लम्बा और अंडाकार होता है।

ज़मीन की तैयारी

फसल की अच्छी वृद्धि और अच्छी उपज के लिए अच्छे बैडों की जरूरत होती है। ज़मीन को 2 से 3 बार अच्छी तरह जोत कर तैयार कर लें। हर बार जोताई करने के बाद खेत में सुहागा फेर दें।

बिजाई

बिजाई का समय
सोए की बिजाई के लिए अगस्त-सितंबर का समय अनुकूल होता है।
 
फासला
भारतीय सोए के लिए पंक्ति से पंक्ति 50 सैं.मी. और पौधे से पौधे का फासला 20 सैं.मी.  होता है।
 
बीज की गहराई
बीज को 3-4 सैं.मी. गहराई में बोयें।
बिजाई का ढंग
आमतौर पर इसकी बिजाई छींटा विधि द्वारा की जाती है लेकिन पंक्तियां बनाकर सोए की बिजाई करना भी अच्छा ढंग है।
 

बीज

बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 2-4  किलो बीज प्रति एकड़ में डाला जाता है। 
 
बीज का उपचार
आलटरनेरिया पत्तों के धब्बा रोगों से बचाने के लिए, बीज को गर्म पानी (50 डिगरी सै.) पर 25-30 मिनट के लिए भिगो दें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
50 50 10

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
23 9 6

 

खेत की तैयारी के समय 60-80 क्विंटल रूड़ी की खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें। 23 किलो नाइट्रोजन (50 किलो यूरिया ) फासफोरस 9 किलो (एस एस पी 50 किलो), पोटाश 6 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 10 किलो) प्रति एकड़ में डालें।

 

 

सिंचाई

अच्छे अंकुरण के लिए, बिजाई से पहले सिंचाई करें। दूसरा पानी 10-15 दिनों के बाद लगाएं। बाकी पानी इस प्रकार दें कि फसल के लिए आवश्यक नमी ज़मीन में रहे। इस बात का ध्यान रखें कि फूल लगते समय पानी की कमी ना हो।

खरपतवार नियंत्रण

यदि इसे रसोई में प्रयोग करना हो तो इस पर किसी भी नदीन नाशक का प्रयोग ना करें। खेत को नदीन मुक्त करने के लिए हाथों से गोडाई करें। बीजने से 30-40 दिनों के बाद गोडाई करें।

पौधे की देखभाल

हरी सुंडी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
हरी सुंडी : यह नीले हरे रंग की सूण्डी 4 इंच लंबी होती है और सोए के पत्तों को खाती है। जिस बूटे पर यह सूण्डी दिखे उसे हाथ से उखाड दें।
 
सफेद मक्खी

सफेद मक्खी : यदि इसका हमला दिखे तो मैलाथियोन 5 प्रतिशत, 10 किलो या मैलाथियोन 50 ई सी या डाइमैथोएट 30 ई सी 300 मि.ली. को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

आल्टरनेरिया पत्तों के धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों का झुलस रोग : इस रोग से पत्तों का रंग उड़ जाता है और पत्ते गिर जाते हैं। अंकुरित हुआ बूटा और पुराने पत्ते इससे बहुत प्रभावित होते हैं। इसकी रोकथाम के लिए फसली चक्र अपनाएं। हर बार एक ही खेत में सोए की खेती ना करें बीज का उपचार भी जरूरी है। इसकी रोकथाम के लिए मैनकोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर में डाल कर बूटों पर छिड़काव करें।
 
सफेद धब्बे
पत्तों पर सफेद धब्बे : यदि इनका हमला दिखे तो कार्बेनडाज़िम 50 डब्लयू पी या कैलीक्सिन 0.1 प्रतिशत, 3 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

मई के पहले सप्ताह फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब फूल का रंग हल्का पीला हो जाए तो, सोए कटाई के लिए तैयार होते हैं। कटाई सुबह के समय करनी चाहिए यह सोए के दानों का स्वाद बढ़ा देती है इसके बाद इसे झाड़ कर दाने अलग कर लें।