राजमांह की  फसल

आम जानकारी

राजमांह को इसके लाल रंग की वजह से चिली बीन्स भी कहा जाता है और यह दिखने में किडनी के आकार जैसा प्रतीत होता है। यह प्रोटीन का मुख्य स्त्रोत है और मोलीबडेनम तत्व भी देता है। इसमें कोलैस्ट्रोल को कम करने वाले तत्व भी हैं। उत्तरी भारत में इसकी दाल भी बनाई जाती है। भारत में महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश,  उत्तराखंड, बंगाल,  तामिलनाडू,  केरल, कर्नाटक मुख्य राजमांह उत्पादक राज्य हैं।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    15-25°C
  • Season

    Rainfall

    60-150mm
  • Season

    Sowing Temperature

    22-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C
  • Season

    Temperature

    15-25°C
  • Season

    Rainfall

    60-150mm
  • Season

    Sowing Temperature

    22-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C
  • Season

    Temperature

    15-25°C
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    Rainfall

    60-150mm
  • Season

    Sowing Temperature

    22-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C
  • Season

    Temperature

    15-25°C
  • Season

    Rainfall

    60-150mm
  • Season

    Sowing Temperature

    22-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    28-30°C

मिट्टी

इसे मिट्टी की व्यापक किस्मों जैसे हल्की रेतली से भारी चिकनी मिट्टी में उगाया जा सकता है। जल निकास वाली मैरा ज़मीनों में इसकी पैदावार बहुत अच्छी होती है। यह फसल ज्यादा खारेपन को सहने योग्य नहीं है। लगभग 5.5-6 पी एच वाली ज़मीनों में इसकी पैदावार अधिक होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

PDR 14 (Uday): यह किस्म 1987 में जारी की गई है। इस किस्म की फसल झाड़ीदार और दानों का रंग हरा होता है। इसके पौधे का कद 40-50 सैं.मी. होता है। सिंचित क्षेत्रों और अच्छे फसल प्रबंधन क्षेत्रों में इसकी औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके धब्बेदार दानों का औसतन भार 38-40 ग्राम प्रति 100 बीज होता है।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
VL Rajma 125: यह किस्म उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में समय से बीजी जाती है। इसकी फली में 4-5 बीज होते हैं और 100 बीज का भार लगभग 41.38 ग्राम होता है।
 
RBL 6: यह किस्म पंजाब के सिंचित क्षेत्रों में बोने के लिए उपयुक्त है। इसके बीज हल्के हरे रंग के होते हैं और फली में 6-8 बीज होते हैं।

इसके इलावा भारत में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध किस्में

HUR 15, HUR-137, Amber and Arun. Also Arka Komal, Arka Suvidha, Pusa Parvathi, Pusa Himalatha, VL Boni 1, Ooty 1.
 

ज़मीन की तैयारी

मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की तीन से चार बार जोताई करें, ताकि पानी ना खड़ा हो सके क्योंकि यह फसल पानी को सहने योग्य नहीं है। यह फसल जल जमाव के प्रति काफी संवेदनशील होती है। फसल बीजने से पहले 60-80 क्विंटल प्रति एकड़ रूड़ी की खाद डालें ताकि अच्छी पैदावार मिल सके।

बिजाई

बिजाई का समय
बसंत की ऋतु में राजमांह की बिजाई फरवरी से मार्च और खरीफ की ऋतु में इसकी बिजाई मई से जून के महीने की जाती है। 
 
फासला
अगेती किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति का फासला 45-60 सैं.मी. और पौधे से पौधे का फासला 10-15 सैं.मी. रखें। पॉल किस्मों की बिजाई पहाड़ी क्षेत्रों में 1 मीटर के फासले पर 3-4 पौधे प्रति पहाड़ी पर लगाए जाते हैं। 
 
बीज की गहराई
बीज को 6-7 सैं.मी. गहरा बोयें।
 
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर की जाती है। समतल क्षेत्रों में बीज पंक्तियों या बैड बनाकर बोये जाते हैं और पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती मेंड़ बनाकर की  जाती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
अगेती किस्मों के लिए 30-35 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ का प्रयोग करें। पॉल किस्मों की बिजाई पहाड़ी क्षेत्रों में 1 मीटर के फासले पर 3-4 पौधे प्रति पहाड़ी पर लगाए जाते हैं। बीज की मात्रा 10-12 किलोग्राम प्रति एकड़ प्रयोग की जाती है।
बीज का उपचार
बीज का उपचार थीरम 4 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से किया जाता है बीज को छांव में सुखाएं और तुरंत बीज दें।
 

खरपतवार नियंत्रण

फसल के शुरू में नदीनों की रोकथाम जरूरी है। इस अवस्था में नदीनों का हमला ना होने दें। खादें डालने और सिंचाई करने के साथ ही गोडाई कर दें। नदीनों की रोकथाम के लिए बिजाई से 2-3 दिनों के अंदर अंदर फलूक्लोरिन 800 मि.ली. प्रति एकड़ या पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति एकड़ का प्रयोग करें।

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
87 108 On soil test results

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
40 18 #

 

बिजाई से पहले 2-3 टन रूड़ी की खाद प्रति एकड़ में मिट्टी में मिलायें। नाइट्रोजन 40 किलो (87 किलो यूरिया), फासफोरस 18 किलो (108किलो एस एस पी) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच करवाएं।

 

 

 

 

 

सिंचाई

बिजाई के बाद 1 महीने के अंतराल पर 3-4 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बिजाई के 3 सप्ताह बाद की जाती है, दूसरी सिंचाई फूल खिलने के समय और तीसरी सिंचाई फलियां विकसित होने के समय की जाती है। इस फसल के लिए गहरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।

पौधे की देखभाल

थ्रिप
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
थ्रिप्स: यह कीड़ा शुष्क मौसम में सबसे ज्यादा नुकसान करता है। यह पत्तों का रस चूसता है। जिस कारण पत्ते के किनारे मुड़ जाते हैं। फूल भी गिर पड़ते हैं। थ्रिप की जनसंख्या को जानने के लिए नीले रंग के 6-8 कार्ड प्रति एकड़ प्रयोग करें। इसके इलावा वर्टीसिलियम लेकानी 5 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे करें।
ज्यादा नुकसान के समय इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल@60मि.ली. या फिप्रोनिल 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या एसीफेट 75 प्रतिशत डब्लयु पी 800 ग्राम को प्रति 150 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 
चेपा
चेपा : यह कीट पत्ते का रस चूसता है। जिस कारण पत्तों पर फफूंद लग जाती है और काले हो जाते हैं। यह फलियों को भी खराब कर देता है। इसकी रोकथाम के लिए एसीफेट 75 डब्लयु पी 800 ग्राम प्रति 150 लीटर पानी या मिथाइल डैमीटोन 25 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति पानी में प्रयोग करें। कीटनाशक जैसे कि कार्बोफिरोन, फोरोट 4-6 किलो प्रति एकड़ मिट्टी में डालकर फसल बीजने से 15 और 60 दिनों के बाद छिड़कने चाहिए।
 
जूं
जूं : यह कीड़ा पूरे संसार में पाया जाता है। इसके नवजात शिशु पत्तों के नीचे की तरफ अपना भोजन बनाते हैं। प्रभावित पत्ते कप के आकार की तरह बन जाते हैं। ज्यादा नुकसान होने पर पत्ते गिर जाते हैं और टहनियां सूख जाती हैं।
यदि यह बीमारी ज्यादा बढ़ जाये तो क्लोरफिनापायर 15 मि.ली. प्रति लीटर एबामैक्टिन 15 मि.ली. प्रति लीटर के हिसाब से प्रभावित भाग में छिड़क दें। यह एक खतरनाक कीड़ा है। जो कि 80 प्रतिशत तक फसल की पैदावार का नुकसान करता है। इसकी रोकथाम के लिए स्पाइरोमैसीफैन 200 मि.ली. को 150 लीटर पानी में डाल कर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें।
 
पत्तों पर धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
सफेद रोग : इस बीमारी के कारण पत्तों के नीचे के तरफ सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं। यह पत्तों को अपना भोजन बनाते हैं। यह फसल के किसी भी विकास के समय हमला कर सकते हैं। कईं बार यह पत्तों की गिरावट का कारण भी बनते हैं। पानी को खड़ा होने से परहेज़ करें और खेत साफ रखें।
इसकी रोकथाम के लिए सलफर 20 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी को 10 दिनों के फासले पर 2-3 बार स्प्रे करें।
 
सूखा
सूखा : हल्की और कम पानी वाली ज़मीनों में यह बीमारी ज्यादा आती है। यह बीमारी मिट्टी से बनती है। ज्यादा पानी सोखने के कारण यह बीमारी नए पौधों के अंकुरन से पहले ही उन्हें मार देती है।
इसकी रोकथाम के लिए खालियों में कॉपर ऑक्सीकलोराइड 25 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 20 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में डालकर इसकी स्प्रे करें।
पौधों की जड़ों को गलने से रोकने के लिए टराईकोडरमा बायो फंगस 2.5 किलोग्राम प्रति 500 लीटर पानी को पौधे की जड़ों में डालें।
 
पीला चितकबरा रोग
चितकबरा रोग : इस बीमारी के दौरान पत्तों पर हल्के रंग के धब्बे बन जाते हैं। पौधे के अगले विकास में रूकावट पड़ जाती है। पत्तों  और फलों पर पीले रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं। बिजाई के लिए सेहतमंद और बीमारी रहित बीजों का प्रयोग करें। प्रभावित पौधों को खेत में से उखाड़ कर नष्ट कर दें।
इसकी रोकथाम के लिए एसीफेट 75 एस पी 800 ग्राम प्रति 150 लीटर पानी या मिथाइल डैमोटोन 25 ई सी 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

जब इसकी फलियां पूरी तरह पक जायें और रंग पीला हो जाये तो इसकी कटाई की जा सकती है। इसके पत्ते पीले पड़ने के बाद गिरने शुरू हो जाते हैं। किस्म के आधार पर इसकी फलियां 7-12 दिनों में पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। यह फसल 120-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। कटाई समय से करें। काटी हुई फसल 3-4 दिनों के लिए धूप में रखें। अच्छी तरह सूखने के बाद बैलों या छड़ों की मदद से छंटाई की जा सकती हैं।

कटाई के बाद

राजमांह को कटाई के बाद कईं कामों के लिए प्रयोग किया जाता है। सांभ संभाल के समय इसकी देखभाल जरूरी है। राजमांह को स्टोर करने से पहले आकार और क्वालिटी के आधार पर बांटा जाता है। गले हुए राजमांह धूप में हल्की गर्मी में रख दिए जाते हैं ताकि उनमें से नमी की मात्रा कम हो जाये। इसके लिए हमेशा ठंडी, अंधेरे और सूखी जगह पर रख दिया जाता है।