ग्वार की खेती

आम जानकारी

ग्वार बारानी क्षेत्रों की नई उभरती लाभदायक फसलों में से एक वार्षिक फसल है। यह सूखे को सहनेयोग्य फसल है और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में भी उगती है। भारत में, सब्जी उद्देश्य के लिए, पशुओं के चारे के लिए और हरी खाद के लिए इसका उपयोग किया जाता है। ग्वार की फलियों में निकलने वाले चिपचिपे पदार्थ का प्रयोग उद्योगों में किया जाता है। इसका उपयोग गोंद पाउडर बनाने के लिए किया जाता है जिसका प्रयोग तेल निष्कर्षण उद्योग, भोजन बनाने और संरक्षण करने, कपड़ा और कागज़ उद्योग में किया जाता है। पाकिस्तान के बाद भारत विश्व में ग्वारका प्रमुख उत्पादक है। भारत ग्वार के बीजों और ग्वार का प्रमुख निर्यातक देश है। भारत में, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तामिलनाडू, महांराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ग्वार उगाने वाले प्रमुख राज्य हैं। चुरू, नागपुर, बैनर, सिकर, जोधपुर, गंगानगर, सिरोही, दौसा, बिकानेर, हनुमानगढ़ और झुनझुनू, राजस्थान में ग्वार के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    28-32°C
  • Season

    Rainfall

    100-110mm
  • Season

    Sowing Temperature

    28-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-35°C
  • Season

    Temperature

    28-32°C
  • Season

    Rainfall

    100-110mm
  • Season

    Sowing Temperature

    28-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-35°C
  • Season

    Temperature

    28-32°C
  • Season

    Rainfall

    100-110mm
  • Season

    Sowing Temperature

    28-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-35°C
  • Season

    Temperature

    28-32°C
  • Season

    Rainfall

    100-110mm
  • Season

    Sowing Temperature

    28-30°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    30-35°C

मिट्टी

इसे हर तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। अधिक पैदावार लेने के लिए इसकी बिजाई रेतली, चिकनी और  सही निकास वाली जमीन में करनी लाभदायक होती है। उपयुक्त पैदावार के लिए मिट्टी की पी एच 7 से 8 की आवश्यकता होती है। 

ज़मीन की तैयारी

ग्वार की पैदावार के लिए समतल ज़मीन की जरूरत होती है। बिजाई से पहले मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की  2-3 बार हल से जोताई करें। इसके बाद तवियों से जोतने के बाद सुहागे से अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिए और ग्वार की खेती के लिए मेंड़ और खालियां बनाएं। खारी  और जल जमाव वाली मिट्टी में बिजाई ना करें।

बिजाई

बिजाई का समय
राजस्थान में ग्वार की बिजाई के लिए जून के पहले सप्ताह से जुलाई के पहले पखवाड़े का समय उपयुक्त होता है।
 
फासला
पौधों में 45-60 सैं.मी. x 20-30 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
 
बीज की गहराई
बीजों को खालियों पर 2-3 सैं.मी. की गहराई में बोयें।
 
बिजाई का ढंग
कुछ क्षेत्रों में बिजाई छींटा देकर की जाती है।और कुछ क्षेत्रों में ड्रिल विधि का प्रयोग किया जाता है।
 

बीज

बीज की मात्रा
एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 6-8 किलो बीज प्रति एकड़ प्रयोग करें। जब इसे दानों और फलियों के उद्देश्य से उगाया जाये तो बीजों की मात्रा 8 किलो उपयुक्त होती है जबकि चारे के लिए अधिक बीज मात्रा की आवश्यकता होती है।
 
बीज का उपचार
बिजाई से पहले, मिट्टी से पैदा होने वाले कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए  बीजों का उपचार करना जरूरी होता है। बीजों को गर्म पानी में 56 डिगरी सैल्सियस पर 10 मिनट के लिए भिगो दें और फिर सामान्य तापमान पर बीजों को सुखाएं। फंगस से बीजों को बचाने के लिए थीरम 3 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। फिर बीजों को छांव में सुखाएं। रासायनिक उपचार के बाद जीवाणु टीके से उपचार करें। उसके लिए 10 प्रतिशत चीनी या गुड़ को उबले हुए पानी में डालकर घोल तैयार करें। इस घोल के ठंडा होने के बाद जीवाणु कल्चर के 2 पैकेट मिलाएं और पतला पेस्ट बनाएं और इससे बीजों का उपचार करें। उसके बाद बीजों को छांव में सुखाएं और तुरंत बिजाई के लिए प्रयोग करें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP
18 150 14

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
8 24 8

 

आखिरी जोताई के समय, मिट्टी में अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर 4-4.8 टन प्रति एकड़ में डाले | बिजाई के समय, नाइट्रोजन 8 किलो (यूरिया 18 किलो) के साथ फासफोरस 24 किलो (सिंगल सुपर फासफेट 150 किलो) और पोटाश 8 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 14 किलो) प्रति एकड़ में डालें।
अच्छी उपज के साथ अच्छी वृद्धि के लिए, बिजाई के 30 दिन बाद सोडियम मोलीबडेट 15 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 

 

 

खरपतवार नियंत्रण

फसल के शुरूआती विकास के दौरान गोडाई और निराई से खेत को नदीन मुक्त रखें। इन प्रक्रिया से नदीनों के नियंत्रण के साथ साथ मिट्टी को हवादार बनाने में भी मदद मिलती है। नदीनों के नियंत्रण के लिए रोपाई से पहले बसालिन 800 मि.ली. प्रति एकड़ में डालें।

सिंचाई

बारानी फसल होने के कारण, इसे सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन यदि जरूरत पड़े तो बारिश की मात्रा के आधार पर सिंचाई दें। गर्मियों के मौसम की फसल के लिए मिट्टी में नमी के आधार पर 10-15 दिनों के अंतराल पर पानी दें।

पौधे की देखभाल

बालों वाली सूण्डी
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
बालों वाली सुंडी : ये कीट पौधों पर समूह में हमला करते हैं और उन्हें गिरा देते हैं जिससे उपज कम हो जाती है। इसका लार्वा लाल भूरे से काले रंग का होता है और पूरे शरीर पर लाल रंग के बाल होते हैं।
 
बारिश के तुरंत बाद 3-4 रोशनी वाले यंत्र बिछायें। प्रभावित क्षेत्र में से अंडा समूहों को इक्ट्ठा करें और नष्ट कर दें। इस कीट की वृद्धि को रोकने के लिए 200 मि.ली. डाइक्लोरवॉस 100 ई सी को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
पत्तों पर धब्बे पड़ना
पत्तों का धब्बा रोग : इसका हमला ज्यादातर बारिश के मौसम में होता है। नए पत्तों पर हल्के पीले, हरे रंग के धब्बे और पुराने पत्तों पर गहरे और पानी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। ज्यादा हमले के कारण पत्तों का रंग पीला हो जाता है और पत्ते गिर जाते हैं।
पत्तों के धब्बे और पीलेपन को रोकने के लिए डाइथेन Z-78, 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।
 
तेला
तेला : चेपे के कीट पत्तों के निचली तरफ से रस चूसते हैं जिसके कारण पत्ते मुड़ जाते हैं।
जब 50 प्रतिशत पौधा ऊपर की तरफ से पीला होना शुरू हो जाये और पत्ते मुड़ जायें, उसके लिए इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 40-50 मि.ली या थाइमैथोक्सम 40 ग्राम या एक्टामिप्रिड 80 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
फली छेदक
फली छेदक : ये कीट फूल और कलियों में छेद कर देते हैं। इसके अनियंत्रित हमले से 10-90 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है।
यदि इसका हमला दिखे तो नियंत्रण के लिए कार्बरिल 900 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
मुरझाना
  • बीमारियां और रोकथाम
सूखा : इस बीमारी से जड़ें काली हो जाती और बाद में गल जाती हैं। पौधे का कद छोटा, पौधा बेरंगा, पत्ते पीले और पत्ते नीचे से मुड़ जाते हैं। पूरा पौधा सूख जाता है।
बिजाई से पहले, थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर इससे बीजों का उपचार करें। प्रभावित क्षेत्र में कार्बेनडाज़िम 5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें।
 
पत्तों पर धब्बा रोग
पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग : पत्तों के निचले भाग, शाखाओं और फलियों पर सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसके कीट पौधे को अपने भोजन स्त्रोत के रूप में प्रयोग करते हैं। इसका हमला विकास की किसी भी अवस्था में हो सकता है। ज्यादा हमले के कारण पौधा गिर भी जाता है।
यदि इसका हमला दिखे तो कैराथेन 40 ई सी 80 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। कैराथेन की 10 दिनों के अंतराल पर तीन स्प्रे करें या पानी में घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।
 

 

एंथ्राक्नोस
एंथ्राक्नोस : यह ज्यादातर उच्च बारिश वाले क्षेत्रों में हमला करता है। पौधे के पत्तों, तनों और फलियों पर छोटे, लाल रंग के हल्के धब्बे दिखाई देते हैं। तने पर जख्म बन जाते हैं और पौधा कमज़ोर हो जाता है।
बिजाई से पहले कप्तान या कार्बेनडाज़िम 3-4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। खेत में पानी खड़ा ना होने दें। यदि इसका हमला दिखे तो प्रभावित पौधे को निकाल दें और खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। डाइथेन एम-45@400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
पत्ते का झुलस रोग
झुलस रोग : पौधे पर तने, शाखाओं, पत्तियों और फलियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे विकसित हो जाते हैं। ज्यादा हमले से तना और फलियां नष्ट हो जाती हैं।
खेती के लिए, इस बीमारी की प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें। इस बीमारी का हमला होने पर इंडोफिल एम-45 400 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। जरूरत पड़े तो 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।
 

फसल की कटाई

चारे के रूप में प्रयोग करने के लिए, बोयी गई फसल की कटाई फूल पड़ने के समय कर देनी चाहिए। हरी खाद के रूप में काश्त की फसल को फलियां पड़ने के समय ही खेत में जोत दें। प्रयोग की गई किस्म के आधार पर बिजाई के 60-90 दिनों के बाद हरी फलियों की कटाई शुरू की जाती है। बाकी की कटाई 10-12 दिनों के अंतराल पर की जाती है। दानों के लिए कटाई फलियों के पकने पर करें। पक कर तैयार हुई फसल को द्राती की सहायता से काटकर कुछ दिनों के लिए धूप में सुखाने के लिए छोड़ देना चाहिए। इसके बाद दानों को गुहाई या थ्रैशर की सहायता से अलग कर  लेना चाहिए।

कटाई के बाद

ग्वार के बीजों से गोंद भी प्राप्त होती है। सब से पहले बीजों का छिल्का उतारा जाता है। इसके बाद बीजों को पीसकर गोंद अलग कर ली जाती है। खाद्य पदार्थ और उदयोगिक उद्देश्यों के लिए बीजों में गोंद को थरमो मकैनीकल विधि से अलग किया जाता है।