मटर की फसल के बारे में जानकारी

जलवायु

  • Season

    Temperature

    15-30°C
  • Season

    Rainfall

    400-500mm
  • Season

    Sowing Temperature

    15-20°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    25-30°C
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    15-30°C
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    Rainfall

    400-500mm
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    25-30°C
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    15-20°C
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    25-30°C

मिट्टी

इसे मिट्टी की कई किस्मों जैसे रेतली दोमट से चिकनी मिट्टी में उगाया जा सकता है। यह अच्छे जल निकास वाली मिट्टी जिसकी पी एच 6 से 7.5 हो, में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। फसल जल जमाव वाले हालातों में खड़ी नहीं रह सकती। तेजाबी मिट्टी में चूना डालें।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

T 163 (1978): यह दानों के लिए उपयुक्त किस्म है। यह किस्म 150 दिनों में परिपक्व हो जाती है और इसकी औसतन पैदावार 6-8 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
RPG 3 (1982): यह दानों के लिए उपयुक्त किस्म है। यह किस्म 125 दिनों में परिपक्व हो जाती है और इसकी औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म T 163 किस्म से 20-22 प्रतिशत अधिक उपज देती है। यह व्यापक लैग्यूम किस्म है। यह किस्म जड़ गलन और फली छेदक के प्रतिरोधक किस्म है।
 
Rachna (1987): यह किस्म 135-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है और इसकी औसतन पैदावार 12-15 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
DMR (1996): इस किस्म के पौधे का कद 105-110 सैं.मी. होता है। यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है और इसकी औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

दूसरे राज्यों की किस्में
 
PG 3: यह छोटे कद वाली अगेती किस्म है जो 135 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके फूल सफेद और दाने क्रीमी सफेद होते हैं। यह सब्जी बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है। इस पर सफेद रोग कम आता है और फली छेदक का हमला कम होता है।
 
Punjab 88: यह पी ए यू लुधियाणा की किस्म है। फलियां गहरी हरी और मुड़ी हुई होती हैं। यह 100 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी हरी फलियों की औसतन पैदावार 62 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Matar Ageta 6: यह पी ए यू लुधियाणा की तरफ से तैयार की गई अगेती और छोटे कद की किस्म है। इसके दाने मुलायम और हरे रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Field Pea 48: यह अगेती पकने वाली दरमियानी किस्म है। इसके दाने हल्के हरे रंग के मोटे और झुरड़ियों वाले होते हैं। यह 135 दिनों में पकती है। यह सब्जी बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है। इसकी औसतन पैदावार 27 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
अगेती ऋतु की किस्में
 
Asauji: आई ए आर आई की तरफ से तैयार की गई किस्म है।
 
Early Superb: यह इंगलैंड की तरफ से तैयार की गई छोटे कद की किस्म है।
 
Arkel: यह फ्रांस की किस्म है जिसकी पैदावार 18-20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Little Marvel: यह छोटे कद की इंगलैंड की किस्म है।
 
Alaska
 
Jawahar Matar 3:  इस किस्म की औसतन पैदावार 16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Jawahar Matar 4: इस किस्म की औसतन पैदावार 28 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pant Matar
 
Hissar Harit
 
Punjab 89
 
मध्य ऋतु की किस्में
 
Bonneville: यह अमरीका की किस्म है जिसकी औसतन पैदावार 36 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Alderman, Perfection New line, T 19
 
Lincon: इसकी औसतन पैदावार 40 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Jawahar Matar 1: इसकी औसतन पैदावार 48 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Jawahar Matar 2
 
Pant Uphar: इसकी औसतन पैदावार 40 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Ooty 1: इसकी औसतन पैदावार 48 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Jawahar Pea 83: इस किस्म की फलियों की पैदावार 48-52 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Jawahar Peas 15: इस किस्म की फलियों की पैदावार 52 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 
 

ज़मीन की तैयारी

खरीफ ऋतु की फसल की कटाई के बाद खेत को तैयार करने के लिए हलों से 1 या 2 बार जोताई करें। हल से जोतने के बाद 2 या 3 बार तवियों से जोताई करें। जल जमाव से रोकने के लिए खेत को अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिए। बिजाई से पहले खेत की एक बार सिंचाई करें जो कि फसल के अच्छे अंकुरन में सहायक होती है।

बिजाई

बिजाई का समय
अधिक पैदावार के लिए बिजाई अंत अक्तूबर से मध्य नवंबर में पूरी कर लें। पिछेती फसल बीजने के लिए पैदावार का नुकसान होता है। अगेती मंडीकरन के लिए मटरों को अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े में उगाएं।
 
फासला
अगेती किस्मों के लिए फासला 30 सैं.मी.x50 सैं.मी. और पिछेती किस्मों के लिए 45-60 सैं.मी.x10 सैं.मी. रखें।
 
बीज की गहराई
बीज को मिट्टी में 2-3 सैं.मी. गहरा बोयें।
 
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई मशीन से मेंड़ बनाकर करें जो कि 60 सैं.मी. चौड़ी होती हैं।
 

बीज

बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 35-40 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
बिजाई से पहले बीजों को कप्तान या थीरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या कार्बेनडाज़िम 2.5 ग्राम से प्रति किलोग्राम बीजों का उपचार करें। रासायनिक तरीके से उपचार के बाद बीजों की अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्हें एक बाद राइज़ोबियम लैगूमीनोसोरम से उपचार करें। इसमें 10 प्रतिशत चीनी या गुड़ का घोल होता है। इस घोल को बीजों पर लगाएं और फिर बीज को छांव में सुखाएं। इससे 8-10 प्रतिशत पैदावार में वृद्धि होती है।
 
इनमें से किसी एक फंगसनाशी दवाई का प्रयोग करें:
 
फंगसनाशी दवाई मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज) 
Captan 3gm
Thiram 3gm
Carbendazim 2.5gm
 
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़) 

UREA SSP
MOP
25 120 On soil test results

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़) 

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
10 20 #

 

बिजाई के लिए नाइट्रोजन 20 किलो (50 किलो यूरिया), फासफोरस 25 किलो (150 किलो सिंगल सुपर फासफेट) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। खादों की पूरी मात्रा पंक्तियों में डाल दें।                      

 

 

सिंचाई

अच्छे अंकुरण के लिए बिजाई से पहले सिंचाई देनी चाहिए। सिंचाई इस फसल के लिए जरूरी है यदि फसल धान के बाद बोयी जाती है और मिट्टी में नमी की मात्रा पर्याप्त हो, तो सिंचाई की कोई जरूरत नहीं। बिजाई के बाद 2 या 3 सिंचाइयों की जरूरत होती है। पहला पानी फूल लगने से पहले और फलियां बनने के समय लगाएं। ज्यादा पानी ना लगाएं इससे पत्ते पीले और पैदावार कम हो जाती है।

खरपतवार नियंत्रण

एक या दो बार गोडाई करना यह किस्म पर निर्भर करता है। पहली गोडाई  फसल बीजने के 3-4 सप्ताह बाद जब फसल 2 या 3 पत्ते निकाल लेती है और दूसरी गोडाई फूल निकलने से पहले करें। मटरों की खेती के लिए नदीन नाशकों का प्रयोग बहुत प्रभावशाली होता है। नदीनों की रोकथाम के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति एकड़ और बसालिन 1 लीटर प्रति एकड़ का प्रयोग फसल बीजने से 48 घंटों के अंदर अंदर करें।

पौधे की देखभाल

मटर के पत्तों का कीड़ा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
मटर के पत्तों का कीड़ा : सुंडियां पत्तों में सुरंग बनाकर पत्ते को खाती है। जिस कारण 10 से 15 प्रतिशत तक फसलों का नुकसान होता है। इसकी रोकथाम के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 300 मि.ली. को 100-150 लीटर पानी प्रति एकड़ में डालकर प्रयोग करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव करें।
 
चेपा और जूं
चेपा और जुंएं : यह पत्तों का रस चुसते हैं जिस कारण पत्ता पीला हो जाता है और पैदावार कम हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 400 मि.ली. को 80-100 लीटर पानी प्रति एकड़ में डालकर प्रयोग करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव करें।
 
फली छेदक
फली छेदक : यह मटरों की फसल का खतरनाक कीड़ा है। यदि इस कीड़े की रोकथाम जल्दी ना की जाये तो यह फूलों और फलियों को 10 से 90 प्रतिशत नुकसान पहुंचाता है।
 
शुरूआती नुकसान के समय कार्बरिल 900 ग्राम को प्रति 100 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें। जरूरत के अनुसार 15 दिनों के फासले पर दोबारा स्प्रे करें। ज्यादा नुकसान के समय 1 लीटर क्लोरपाइरीफॉस या एसीफेट 800 ग्राम को 100 लीटर पानी में डालकर स्प्रे वाले पंप से प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
 
सूखा
  • बीमारियां और रोकथाम
सूखा : इस बीमारी के कारण जड़ें काली और बाद में सूख जाती हैं। पौधा छोटा और रंग बिरंगा हो जाता है। पत्ते पीले होकर किनारों से मुड़ जाते हैं। सारा पौधा मुरझा जाता है। इसकी रोकथाम के लिए बीज का उपचार कर लेना जरूरी है।
 
बिजाई से पहले बीज को थीरम 3 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी से उपचार कर लेना चाहिए। तीन साल का फसली चक्र अपनायें। ज्यादा नुकसान होने की हालत में कार्बेनडाज़िम 5 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर पौधे की जड़ों के साथ साथ छिड़काव करें। लैथीरस वीसिया जैसे नदीनों को नष्ट कर दें।
 
कुंगी
कुंगी : इससे पौधे के पत्ते, टहनियां, फलियों और पीले भूरे रंग के उभरे हुए धब्बे पड़ जाते हैं।
 
इसकी रोकथाम के लिए 400 ग्राम इंडोफिल Z-78@100 लीटर पानी में या मैनकोजेब 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 10 से 15 दिन के फासले पर छिड़काव करें।
 
पत्तों पर सफेद धब्बे
पत्तों पर सफेद धब्बे : पौधे के पत्ते, फलियां और तने के ऊपर सफेद रंग के धब्बे हो जाते हैं। ये कीट पौधे को अपने भोजन स्त्रोत के रूप में प्रयोग करते हैं। यह नुकसान फसल के किसी भी पड़ाव पर हो सकता है। इसके हमले से पत्ते गिरने लग जाते हैं।
 
इसकी रोकथाम के लिए 80 मि.ली कराथेन 40 ई सी को 100 लीटर पानी प्रति एकड़ में मिलाकर छिड़काव करें। इसके तीन छिड़काव 10 दिनों के फासले पर करें। 
 

फसल की कटाई

हरे मटरों को सही पड़ाव पर तुड़ाई जरूरी है। जब मटरों का रंग गहरे से हरा होना शुरू हो, जितनी जल्दी हो सके कटाई शुरू कर देनी चाहिए। इसकी 4 से 5 तुड़ाइयां 6 से 10 दिनों के फासले पर की जा सकती हैं फसल की पैदावार उसकी किस्म, मिट्टी और सांभ संभाल पर निर्भर करता है। 

कटाई के बाद

इसे जूट की बोरियों, बांस की टोकरियों या प्लास्टिक के बर्तनों में डालकर कम तापमान और लंबे समय के लिए स्टोर किया जा सकता है। बोरियों, प्लास्टिक के कंटेनर और और बांस की टोकरियों में पैकिंग की जाती है।

आम जानकारी

यह फसल लैग्यूमिनसियाइ फैमिली से संबंध रखती है। यह ठंडे इलाकों वाली फसल है। इसकी हरी फलियां सब्जी बनाने और सूखी फलियां दालें बनाने के लिए प्रयोग की जाती हैं। यह फसल हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटका में उगाई जाती है। यह प्रोटीन और अमीनो एसिड का अच्छा स्त्रोत है। यह फसल पशुओं के लिए चारे के तौर पर भी प्रयोग की जाती है।