गेहूं उत्पादन

सिंचाई

मिट्टी की किस्म, पानी की उपलब्धता आदि के आधार पर सिंचाई की संख्या की आवश्यकता होती है। नमी की अवस्था में जड़ गलन का हमला और बलियां बनने की अवस्था बहुत गंभीर होते हैं। छोटे कद और अधिक उपज वाली किस्मों के लिए बिजाई से पहले सिंचाई करें। भारी मिट्टी के लिए चार से छ: सिंचाइयों की आवश्यकता होती है जबकि हल्की मिट्टी के लिए 6-8 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पानी की सीमित संख्या में सिंचाई केवल गंभीर अवस्था में ही करें। जब पानी केवल एक सिंचाई के लिए उपलब्ध हो तो जड़ गलन के हमले के समय  सिंचाई करें। जब दो सिंचाइयां उपलब्ध हो तो जड़ गलन के हमले और फूल बनने की अवस्था में सिंचाई करें। जब तीन सिंचाइयां संभव हो तो पहली सिंचाई जड़ गलन के हमले के समय, दूसरी सिंचाई तना बनने के समय और तीसरी दूधिया अवस्था में करें। तना गलने की अवस्था सिंचाई के लिए बहुत महत्तवपूर्ण होती है। यह पाया गया है कि यदि जड़ गलन के समय पहली सिंचाई में देरी की जाये तो 85-125 किलोग्राम प्रति एकड़ उपज कम हो जाती है।
 
पहली सिंचाई बिजाई के 20-25 दिनों के बाद करनी चाहिए। यह अवस्था जड़ गलन और नमी तनाव का समय होता है जिसके कारण उपज में कमी होती है। दूसरी सिंचाई बिजाई के 40-45 दिनों के बाद पौधा बाहर निकलने के समय करनी चाहिए। तीसरी सिंचाई 70-75 दिनों के बाद तना बनने के समय करनी चाहिए। चौथी सिंचाई 90-95 दिनों के बाद  फूल बनने के समय करनी चाहिए। पांचवी सिंचाई 110-115 दिनों के बाद दूधिया अवस्था में करनी चाहिए। 
 
नीचे दिए गए टेबल में सिंचाई के समय की सिफारिश की जाती है।
 
सिंचाई की संख्या

बिजाई के बाद अंतराल

(दिनों में)

पहली सिंचाई 20-25 दिनों में
दूसरी सिंचाई 40-45 दिनों में
तीसरी सिंचाई 60-65 दिनों में
चौथी सिंचाई 80-85 दिनों में
पांचवी सिंचाई 100-105 दिनों में
छठी सिंचाई 115-120 दिनों में
 
 
 

खरपतवार नियंत्रण

रासायनिक नदीन रोकथाम : इसमें कम मेहनत और हाथों से नदीनों को उखाड़ने से होने वाली हानि ना होने कारण ज्यादातर यह तरीका ही अपनाया जाता है। नुकसान से बचने के लिए पैंडीमैथालीन स्टांप (30 ई.सी.) 1 लीटर को 500 लीटर पानी के घोल में मिलाके बीजने के 0-3 दिनों के अंदर अंदर छिड़काव करना चाहिए। चौड़े पत्तों वाले नदीनों की रोकथाम के लिए 2,4-डी 250 मि.ली.  को 150 लीटर पानी में घोलकर प्रयोग करें।
 

पौधे की देखभाल

चेपा
चेपा: यह पारदर्शी, चूसने वाली सूण्डी है। यदि यह बहुत ज्यादा मात्रा में हों तो यह पत्तों के पीलेपन या उनको समय से पहले सुखा देता है। आमतौर पर यह आधी जनवरी के बाद फसल के पकने तक के समय दौरान हमला करता है।
चेपे की रोकथाम के लिए कराईसोपरला प्रीडेटर्ज़ का प्रयोग करना चाहिए। 5-8 हज़ार कीड़े प्रति एकड़ या 50 ग्राम प्रति लीटर नीम के घोल का उपयोग करें। बादलवाई के दौरान सूण्डी का हमला शुरू होता है। थाइमैथोक्सम@80 ग्राम या इमीडाक्लोप्रिड@60 मि.ली. को 150 लीटर पानी में घोल तैयार करके एक एकड़ फासले पर छिड़काव करें।
 

 

दीमक

दीमक :  दीमक की तरफ से फसल के विभिन्न विभिन्न विकास के पड़ाव, बीज अंकुरन से लेकर पकने तक हमला किया जाता है। बुरी तरह ग्रसित पौधों की जड़ों को आराम से उखाड़ा जा सकता है और यह पत्ता लपेट और सूखे हुए नज़र आते हैं। यदि आधी जड़ खराब हो तो बूटा पीला पड़ जाता है। इसकी रोकथाम के लिए एक लीटर क्लोरोपाइरीफॉस 20 ई.सी. को 20 किलो मिट्टी में मिलाके एक एकड़ में फेंकना चाहिए और उसके बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

कांगियारी
  • बीमारियां और रोकथाम
कांगियारी : यह बीजों से होने वाली बीमारी है। हवा से इसकी लाग और फैलती है। बालियां बनने के समय कम तापमान, नमी वाले हालात इसके लिए अनुकूल होते हैं।
यदि बीजों पर इस बीमारी का हमला ज्यादा हो तो फंगसनाशी जैसे कार्बोक्सिल (विटावैक्स 75 डब्लयू पी 2.5 ग्राम), कार्बेनडाज़िम (बाविस्टिन 50 डब्लयु पी 2.5 ग्राम), टैबुकोनाज़ोल (रैक्सिल 2 डी एस 1.25 ग्राम) से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यदि हमला कम हो तो ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें और सिफारिश की गई खुराक कार्बोक्सिन विटावैक्स 75 डब्लयु पी  1.25 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।
 
सफेद धब्बे
सफेद जंग : इस बीमारी के दौरान पत्ते, खोल, तने और फूलों वाले भागों पर सफेद रंग के पाऊडर जैसी दिखनी शुरू हो जाती है। यह पाऊडर जैसे दिखने वाली पैदावार बाद में काले धब्बों का रूप ले लेती है इससे पत्तों और बाकी के भाग सूखने शुरू हो जाते हैं। जब इस बीमारी का हमला सामने आए तो फसल पर 2 ग्राम वैटेबल सल्फ का एक लीटर पानी में घोल तैयार करके या 400 ग्राम कार्बनडैज़िम प्रति 150 लीटर के हिसाब से प्रति एकड़ छिड़काव करना चाहिए। गंभीर हालातों में 2 मि.ली.  प्रोपीकोनाज़ोल का एक लीटर पानी में घोल तैयार करके इसका छिड़काव करना चाहिए।
 
भूरी कुंगी
भूरी जंग : गर्म तापमान (15-30 डिगरी सै.) और नमी वाले हालात इसका कारण बनते हैं। पत्तों के भूरेपन के लक्षण की पहचान पत्तों के ऊपर लाल - भूरे रंग के अंडाकार या लंबकार दानों से होती है। जब खुली मात्रा में नमी मौजूद हो और तापमान 20 डिगरी सै. के नजदीक हो तो यह बीमारी बहुत जल्दी बढ़ती है। यदि हालात अनुकूल हों तो इस बीमारी के दाने हर 10-14 दिनों के बाद दोबारा पैदा हो सकते हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए अलग अलग किस्म की फसलों को एक ज़मीन पर एक समय लगाने के तरीके अपनाने चाहिए। नाइट्रोजन के ज्यादा प्रयोग से परहेज़ करना चाहिए। 2.5 किलोग्राम ज़ाइनेब प्रति एकड़ का छिड़काव या 2 मि.ली. प्रोपीकोनाज़ोल टिल्ट का एक लीटर पानी में घोल तैयार करके इसका छिड़काव करना चाहिए।
 
पीली कुंगी
पीला धारीदार जंग : पीले धारीदार जंग के विकास के लिए उचित हालात का तापमान 8-13 डिगरी सै. है। इस तापमान दौरान इसके बीजाणु अंकुरित होते हैं और बूटों में प्रवेश करते हैं और 12-15 डिगरी सै. के तापमान और खुले पानी के दौरान यह अच्छी तरह बढ़ते फूलते हैं। इस बीमारी के कारण गेहूं की फसल की पैदावार में 5 प्रतिशत से लेकर 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। पीले जंग के दाने जो कि पीले से संतरी पीले हो सकते हैं, आमतौर पर एक पतली धारी बनाते हैं।
इस बीमारी की रोकथाम के लिए फफूंदी रहित किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। बदलवें फसली और अलग अलग किस्म की फसलों को एक जमीन पर एक समय लगाने जैसे तरीके अपनाने चाहिए। नाइट्रोजन की ज्यादा प्रयोग से परहेज करना चाहिए। जब इस बीमारी लक्षण दिखाई दे तो 35-40 किलोग्राम सल्फर का छिड़काव प्रति एकड़ या 2 ग्राम मैनकोजेब प्रति लीटर का छिड़काव या 2 मि.ली. प्रोपीकोनाज़ोल टिल्ट का एक लीटर पानी में घोल तैयार करके इसका डिड़काव करना चाहिए।
 
करनाल बंट
करनाल बंट : यह एक बीज और मिट्टी से होने वाली बीमारी है लाग की शुरूआत बलियां बनने के समय होती है। बलियां बनने से लेकर उसमें दाना पड़ने तक के पड़ाव के दौरान यदि बादलवाई रहती है तो यह बीमारी और भी घातक हो सकती है। यदि उत्तरी भारत के समतल क्षेत्रों में फरवरी महीने के दौरान बारिश पड़ जाए तो इस बीमारी के कारण बहुत ज्यादा नुकसान होता है।
इस बीमारी की रोकथाम के लिए बलियों के झुलस रोग से रहित किस्मों का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस बीमारी की रोकथाम के लिए पत्ते के बनने के समय 2 मि.ली. प्रापीकोनाज़ोल टिल्ट 25 ई सी को एक लीटर पानी के घोल में मिलाकर इसका छिड़काव करना चाहिए।
 

फसल की कटाई

उच्च पैदावार वाली फसलों की किस्मों की कटाई पत्तों और तने के पीले पड़ने और सूखने के बाद की जाती है। हानि से बचने के लिए फसल की कटाई इसके पके हुए बूटों के सूखने से पहले की जानी चाहिए। ग्राहक की तरफ से इसे स्वीकारने और इसकी अच्छी गुण्वत्ता के लिए इसको सही समय पर काटना चाहिए। जब दानों में 25-30 प्रतिशत नमी रह जाती है तो यह इसे काटने का सही समय होता है। हाथ से गेहूं काटने के समय तेज धार वाली द्राती का प्रयोग करना चाहिए। कटाई के लिए कंबाइने भी उपलब्ध हैं, जिनकी सहायता से गेहूं की फसल की कटाई, दाने निकालना और छंटाई एक ही बार में की जा सकती है।

कटाई के बाद

हाथों से कटाई करने के बाद फसल को तीन से चार दिनों के लिए सुखाना चाहिए ताकि दानों में नमी 10-12 प्रतिशत के मध्य रह जाए और उसके बाद बल्दों की मदद से या बल्द की सहायता से चलने वाले थ्रैशर की मदद से दाने निकालने चाहिए। सीधा धूप में सुखाना या बहुत ज्यादा सुखाने से परहेज़ करना चाहिए और दानों को साफ-सुथरी बोरियों में भरना चाहिए ताकि नुकसान को कम किया जा सके। पूसा बिन मिट्टी या ईंटों से बनाया जाता है और इसकी दीवारों में पॉलिथीन की एक परत चढ़ाई जाती है। जब कि बांस के डंडों के आस-पास कपड़ों की मदद से सिंलडर के आकार में ढांचा तैयार किया जाता है और इसका तल मैटल की ट्यूब की सहायता से तैयार किया जाता है। इसे हपूरटेका कहा जाता है, जिसके निचली ओर एक छोटा छेद किया जाता है ताकि इसमें से दानों को निकाला जा सके। बड़े स्तर पर दानों का भंडार सी ए पी और सिलोज़ में किया जाता है। भंडार के दौरान अलग अलग तरह के कीड़ों और बीमारियों से दूर रखने के लिए बोरियों में 1 प्रतिशत मैलाथियोन रोगाणुनाशक का प्रयोग किया जाता है। भंडार घर को अच्छी तरह साफ करें, इसमें से आ रही दरारों को दूर करे और चूहे की खुड्डों को सीमेंट से भर दें। दानों को भंडार करने से पहले भंडार घर में सफेदी करवानी चाहिए। और इसमें 100 वर्गमीटर के घेरे में 3 लीटर मैलाथियान 50 ई.सी. का छिड़काव करना चाहिए। बोरियों के ढेर को दीवारों से 50 सै.मी. की दूरी पर रखना चाहिए और ढेरों के बीच में कुछ जगह देनी चाहिए। 
 

आम जानकारी

गेहूं एक अनाज के दानों वाली फसल है जिसकी विश्व भर में खेती की जाती है। गेहूं की तीन प्रजातियां T. aestivum, T. durum and T. dicoccum है, जिनकी खेती पूरे देश में की जाती है। भारत में यह मुख्य रूप से रबी के मौसम में उगाई जाती है। रूस, यू एस ए, और चीन के बाद भारत गेहूं का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है और विश्व में पैदा होने वाली गेहूं की पैदावार में भारत का योगदान 8.7 फीसदी है। भारत में हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश मुख्य गेहूं उत्पादक राज्य हैं। गेहूं प्रोटीन के साथ साथ फाइबर का उच्च स्त्रोत है। यह मैगनीज और मैगनीशियम का भी अच्छा स्त्रोत है।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75cm (max)
    20-25cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75cm (max)
    20-25cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75cm (max)
    20-25cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75cm (max)
    20-25cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C

मिट्टी

इसे भारत की मिट्टी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है। गेहूं की खेती के लिए चिकनी दोमट या दोमट बनतर, अच्छे ढांचे और पानी सोखने की सामान्य क्षमता वाली मिट्टी उचित होती है। छिद्रित और पानी कम सोखने वाली मिट्टी गेहूं की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। सूखे हालातों, अच्छे जल निकास वाली भारी मिट्टी इसकी खेती के लिए अनुकूल होती है। भारी मिट्टी जिसका घटिया ढांचा और घटिया जल निकास हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती क्योंकि गेहूं की फसल जल जमाव के प्रति संवेदनशील होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Raj 1482: इस किस्म का गहरे हरे रंग का पौधा, जिसका कद 80-90 सैं.मी. होता है। इसकी अधिक फलियां, मोटे दाने, चमकदार और हल्के रंग के दाने होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 15-16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 126-134 दिनों में परिपक्व होती है। इसका मुख्य रूप से ब्रैड बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 11-12 प्रतिशत होती है।
 
PBW 502: यह किस्म सिंचित क्षेत्रों में उगाने के अनुकूल है। पौधे का कद 90-100 सैं.मी. होता है। यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह करनाल बंट के प्रतिरोधी है। इसकी औसतन पैदावार 18-20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
PBW 550: पौधे का कद 83-91 सैं.मी. होता है। यह किस्म 128-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके दाने मोटे सुनहरे पीले रंग के होते हैं। इसके 1000 दानों का भार लगभग 38 ग्राम होता है। इसकी औसतन पैदावार 18-24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
HD 2697: पौधे का कद 83-91 सैं.मी. होता है। यह किस्म 128-133 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। भारी ज़मीनें इस किस्म की खेती के लिए अच्छी रहती हैं। इसके दाने मोटे सुनहरे रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 18-24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Raj 6560: यह किस्म सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल है। पौधे का कद 90-100 सैं.मी. होता है। यह किस्म 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 18-22 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Raj 3077: इस किस्म को वंडर गेहूं के नाम से जाना जाता है। पौधे का कद 115-118 सैं.मी. होता है। इसकी औसतन पैदावार 15-16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 126-134 दिनों में परिपक्व हो जाती है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से  ब्रैड बनाने के लिए किया जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 11-12.5 प्रतिशत होती है।
 
Raj 4079: यह किस्म 115-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके पौधे का कद 75-80 सैं.मी. होता है। यह सामान्य और सिंचित हालातों में अच्छे परिणाम देती है। यह गर्दन तोड़ के प्रतिरोधी किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 19-21 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके दाने मोटे, मध्यम आकार के और सख्त होते हैं। यह किस्म राजस्थान के गर्म जलवायु को सहने योग्य किस्म है और अच्छी उपज देती है।
 
Raj 4037: इसके पौधे का कद 83-95 सैं.मी. होता है। इसकी औसतन पैदावार 15-16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 120 दिनों में परिपक्व हो जाती है। यह मुख्य रूप से ब्रैड बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 11-12 प्रतिशत होती है। यह किस्म काली जंग और तने पर जंग के प्रतिरोधी है।
 
Raj 4120: यह किस्म 110-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके पौधे का कद 80-94 सैं.मी. होता है। यह किस्म सामान्य और सिंचित हालातों में अच्छे परिणाम देती है। इसका तना मजबूत होता है और गर्दन तोड़ के प्रतिरोधी होता है। इसकी औसतन पैदावार 20-24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म राजस्थान के गर्म जलवायु को सहने योग्य किस्म है और अच्छी उपज देती है।
 
DBW 17: इसके पौधे का कद 80-85 सैं.मी. होता है। यह किस्म 130-132 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह करनाल बंट के प्रतिरोधी किस्म है। इसका तना मजबूत होता है जो कि यह दर्शाता है कि यह गर्दन तोड़ के प्रतिरोधी है। इसके दाने मोटे, मध्यम आकार के और सख्त होते हैं। यह किस्म सामान्य और सिंचित हालातों में अच्छे परिणाम देती है। इसकी औसतन पैदावार 16-20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Raj 4238: यह किस्म 115-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके पौधे का कद 82-86 सैं.मी. होती है। इसका तना मजबूत होता है जो कि फसल को गर्दन तोड़ से बचाता है। यह करनाल बंट के प्रतिरोधी किस्म है। इसके दाने मध्यम आकार के होते हैं और औसतन पैदावार 16-20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
WH 1080: यह किस्म 127-133 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके पौधे का कद 85-101 सैं.मी. होती है। सिंचित हालातों में यह 16-18 क्विंटल प्रति एकड़ उपज देती है। इसके दाने सुनहरे, मध्यम मोटे और सख्त होते हैं।
 
PBW 175: यह किस्म 130-132 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके पौधे का कद 15-16 सैं.मी. होता है। इसके दाने सुनहरे, मध्यम मोटे और सख्त होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 15-16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CCNNRVOI (Raj Molya Rodhak-1: यह सिंचित हालातों में समय पर बोने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके पौधे का कद 84 सैं.मी. होता है। इसके दाने सुनहरे, मध्यम सख्त और गोल आकार के होते हैं। यह किस्म 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 15-18 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म नेमाटोड से प्रभावित क्षेत्रों में प्रसिद्ध है।
 
पिछेती बिजाई की किस्में
 
Raj 3765: यह किस्म दिसंबर से मध्य जनवरी के तीसरे सप्ताह में बोयी जा सकती है। इसके पौधे का कद 85-95 सैं.मी. होता है। यह किस्म 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 16-20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Raj 3777: यह किस्म 90-95 दिनों में परिपक्व हो जाती है। यह किस्म मध्य नवरी में बोने के लिए अनुकूल है। इसकी औसतन पैदावार 14-16 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
रेतली मिट्टी वाली किस्में
इन किस्मों की वृद्धि के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है।
 
C 306: यह किस्म बंजर भूमि में उगाने के लिए प्रयोग की जाती है और इसे कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसका पौधे लंबे कद के होते हैं। इसके मध्यम आकार के दाने और रंग में सुनहरे होते हैं। इसकी औसतन उपज 14-16 प्रति एकड़ होती है।
 
P.B.W. 299: इसके पौधे का कद 95 सैं.मी. होता है। यह किस्म 150-160 दिनों में परिपक्व हो जाती है और इस किस्म की अगेती बिजाई की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 16-18 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इन किस्मों के साथ PBW  396 और WH 147  की भी खेती की जाती है।
 
क्षारीय मिट्टी की किस्में
 
क्षारीय क्षेत्रों में Raj 3077, K.R.L 1-4 और WH 157  जैसी किस्मों का प्रयोग करें, ये अच्छी उपज देती हैं।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
RAJ-3765: यह किस्म 120-125 दिनों में पक जाती है। यह किस्म गर्मी को सहने योग्य, धारी जंग, भूरी जंग और करनाल बंट के प्रतिरोधी हैं इसकी औसत पैदावार 21 क्विंटल प्रति एकड़ है।

UP-2338: यह किस्म 130 से 135 दिनों में पकती है। इसके दाने सख्त, रंग शरबती और मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। उसकी औसत उपज 20-22 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
UP-2328:यह किस्म 130 से 135 दिनों में पकती है। इसके दाने सख्त, रंग शरबती और मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयंक्त है। असकी औसत उपज 20-22 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Sonalika: यह एक जल्दी पकने वाली, छोटे कद वाली गेहूं की किस्म है। जो कि बहुत सारे हालातों के अनुकूल है। इसके दाने सुनहरी होते हैं। इसकी बुवाई पिछेती की जा सकती है। और यह फंगस की बीमारियों से रहित होती है।
 
Kalyansona: यह गेहूं की बहुत छोटे कद वाली किस्म है जो कि बहुत सारे हालातों के अनुकूल होती है। और पूरे भारत में इसको बीजने की सलाह दी जाती है। इसे बहुत जल्दी फंगस की बीमारी लगती है।इसलिए इसे फंगस रहित क्षेत्रों में बीजने की सलाह दी जाती है।
 
UP-(368): अधिक पैदावार वाली इस किस्म को पंतनगर द्वारा विकसित किया गया है। यह फंगस और पीलेपन की और बीमारियों से रहित होती है।
 
WL-(711): यह छोटे कद और अधिक पैदावार वाली और कम समय में पकने वाली किस्म है। यह कुछ हद तक सफेद धब्बे ओर पीलेपन की बीमारी से रहित होती है।
 
UP-(319): यह बहुत ज्यादा छोटे कद वाली गेहूं की किस्म है, जिसमें फंगस/उल्ली के प्रति प्रतिरोधकता काफी हद तक पाई जाती है। दानों को टूटने से बचाने के लिए इसकी समय से कटाई कर लेनी चाहिए।
 
देर से बोई जाने वाली किस्में
 
HD-2851, HD-2932, RAJ-3765, PBW-373, UP-2338, WH-306, 1025
 
PBW 590: यह किस्म पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह 128 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीले और भूरी जंग रोगों के लिए प्रतिरोधी किस्म है। इसका औसतन कद 80 सैं.मी. होता है।
 
PBW 509: यह किस्म पंजाब के उप पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर बाकी सारे क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह 130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीले और भूरी जंग रोगों के लिए प्रतिरोधी किस्म है। इसका औसतन कद 85 सैं.मी. होता है।
 
PBW 373: यह किस्म पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह 130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म भूरी जंग की बीमारी के प्रतिरोधी है। इस किस्म का औसतन कद 90 सैं.मी. होता है।
 

ज़मीन की तैयारी

गेहूं की फसल को अच्छे अंकुरन के लिए अच्छी तरह से तैयार, पर ठोस बीज बैड की आवश्यकता होती है। पिछली फसल की कटाई के बाद खेत की अच्छे तरीके से ट्रैक्टर की मदद से जोताई की जानी चाहिए। खेत को आमतौर पर ट्रैक्टर के साथ तवियां जोड़कर जोता जाता है और  उसके बाद दो या तीन बार हल या सुहागे से जोता जाता है।  बारानी क्षेत्रों में खेत इस तरह से तैयार करना चाहिए कि वह नमी को सोख सके। खेत की एक बार आयरन के हल से गहरी जोताई या सामान्य हल से दो या तीन बार जोताई करें और सुहागा फेरें।
 
खेत की जोताई शाम के समय की जानी चाहिए और रोपाई की गई ज़मीन को पूरी रात खुला छोड़ देना चाहिए ताकि वह ओस की बूंदों से नमी सोख सके। प्रत्येक जोताई के बाद सुहागा फेरना चाहिए। आखिरी जोताई के समय यूरिया 35-40 किलो प्रति एकड़ में डालें इससे गेहूं की अंकुरन प्रतिशतता में वृद्धि होती है। अज़ोटोबैक्टर 2.5 किलो + फास्फेटिक 2.5 किलो + ट्राइकोडरमा 2.5 किलो को 100 किलो-125 किलो रूड़ी की खाद या गाय के गले हुए गोबर में मिलाकर आखिरी जोताई के समय खिलार दें।
 

बिजाई

बिजाई का समय
गेंहूं की बिजाई सही समय पर करनी जरूरी है। बारानी क्षेत्रों के लिए बिजाई नवंबर के पहले से तीसरे सप्ताह में पूरी कर लें, जबकि सिंचित क्षेत्रों में बिजाई अक्तूबर से 15 नवंबर तक पूरी कर लें।
 
फासला
सामान्य बिजाई के लिए कतारों में 20 सैं.मी. के फासले की सलाह दी जाती है। यदि बिजाई देरी से करनी हो तो 18 सैं.मी. का फासला होना चाहिए।
 
बिजाई की गहराई
4-5 सैं.मी. की गहराई में बिजाई करनी चाहिए।
 
बिजाई का ढंग
बीज ड्रिल
बुरकाव विधि 
जीरो टिलेज़ ड्रिल
रोटावेटर
 

बीज

बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 40 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
हल्की मिट्टी : यदि बिजाई देरी से की जाये तो नवंबर के आखिरी सप्ताह से दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक बिजाई 50 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करके पूरी कर लें। देरी से बिजाई के लिए कम समय की किस्मों का प्रयोग करें।
 
भारी मिट्टी : सामान्य स्थितियों में बिजाई नवंबर के पहले से तीसरे सप्ताह में पूरी कर लें, जब कि सिंचित हालातों में दिसंबर महीने में बिजाई पूरी कर लें। बीज की मात्रा 50 किलोग्राम प्रति एकड़ में रखें।
बीज का उपचार : बीजों को दीमक, फफूंद, झुलस रोग जैसे बीमारियों से बचाने के लिए बीजने से 24 घंटे पहले एक किलो बीजों का 4 मि.ली. क्लोरपाइरीफॉस या 1.5 - 1.87 ग्राम टेबुकोनाज़ोल 2 डी.एस या 2 ग्राम कार्बेनडाज़िम या थीरम मिलानी चाहिए। रासायनिक उपचार के बाद बीजों को टी विराइड 1.15 प्रतिशत डब्लयु पी 4 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।  IPM में टी विराइड 4 ग्राम + कार्बोक्सिन 75 डब्लयु पी 1.25 ग्राम या टैबुकोनाज़ोल 1.0 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार झूठी कांगियारी को रोकने के लिए किया जाता है। उसके बाद दीमक से बचाव के लिए बिजाई से 15 दिनों के बाद मिट्टी का क्लोरोपाइरीफोस 1 लीटर को प्रति एकड़ में बुरकाव करके उपचार करें।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MOP ZINC
80-100 50-90 20 #

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
37-50 8-15 12.5

 

मिट्टी की जांच के आधार पर खादों का प्रयोग करें। मिट्टी की जांच की मदद से हम खादों को मिट्टी की आवश्यकता के आधार पर दे सकते हैं। गेहूं की समय पर बिजाई के लिए नाइट्रोजन 37-50 किलो (यूरिया 80-100 किलो), फासफोरस 8-15 किलो (एस एस पी 50-90 किलो) और पोटाश 12.5 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 20 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा, पोटाश और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। पहली सिंचाई के बाद नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा डाल दें।
 
उपज को बढ़ाने के लिए जिंक सलफेट 10 किलोग्राम प्रति एकड़ में डालें। जिंक की कमी को जिंक सल्फेट 0.5 प्रतिशत की फोलियर स्प्रे करके पूरा किया जा सकता है। 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन स्प्रे करें। मजबूत तने और उपज के लिए, बिजाई के 30 दिनों के बाद 19:19:19 पानी में घुलनशील खाद 5 ग्राम + स्टिकर 0.5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।