पंजाब में जई की खेती

आम जानकारी

जई एक महत्तवपूर्ण अनाज और चारे की फसल है। जई की खेती गेहूं की खेती के बिल्कुल समान होती है। यह विशेष कर संयमी और उप उष्ण कटबंधी क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसकी पैदावार ज्यादा ऊंचाई वाले तटी क्षेत्रों में भी बढ़िया होती है। यह अपने सेहत संबंधी फायदों के कारण काफी प्रसिद्ध है। जई वाला खाना मशहूर खानों में गिना जाता है। जई में प्रोटीन और रेशे की भरपूर मात्रा होती है। यह भार घटाने, ब्लड प्रैशर को कंटरोल करने और बीमारियों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाने में भी मदद करता है।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    80-100 mm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    25-30°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    80-100 mm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    25-30°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    80-100 mm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    25-30°C
  • Season

    Temperature

    20-30°C
  • Season

    Rainfall

    80-100 mm
  • Season

    Sowing Temperature

    20-25°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    25-30°C

मिट्टी

यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। अच्छे जल निकास वाली चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों, जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6.6 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Weston-11: यह किस्म 1978 में पंजाब में जारी की गई। इस किस्म के पौधों का कद 150 सैं.मी. होता है। इसके दाने लंबे और सुनहरी रंग के जैसे होते हैं।
 
Kent: यह भारत के सभी इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके पौधे का औसतन कद 75-80 सैं.मी. होता है। यह किस्म कुंगी, भुरड़ और झुलस रोग की प्रतिरोधक है। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 210 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
OL-10: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 270 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
OL-9: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसके दानों की औसतन पैदावार 7 क्विंटल और चारे के तौर पर औसतन पैदावार 230 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
OL 11: यह किस्म 2017 में जारी की गई है। इसकी औसतन पैदावार 245 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके पौधे पत्तेदार, लंबे होते हैं और पत्ते चौड़े होते हैं।
 
दूसरे राज्यों की किस्में
 
Brunker-10: यह तेजी से बढ़ने वाली अच्छी, छोटे और तंग आकार के नर्म पत्तों वाली किस्म है। यह सोके की प्रतिरोधक है। यह पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश के इलाकों में उगाई जाती है।
 
HFO-114: यह जई उगाने वाले सारे इलाकों में उगाई जा सकती है। यह 1974 में हिसार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की तरफ से जारी की गई। यह किस्म लंबी और भुरड़ रोग की रोधक है। इसके बीज मोटे होते हैं और इसके दानों की औसतन पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Algerian:  यह किस्म सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। पौधे का औसतन कद 100-120 सैं.मी. होता है। इसका शुरूआती विकास मध्यम होता है और पत्ते हल्के हरे रंग के होते हैं।
 
OS-6: यह भारत के सभी इलाकों में उगाई जा सकती है। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 210 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 
Bundel Jai 851: यह भारत के सभी इलाकों में उगाई जा सकती है। इसकी हरे चारे के तौर पर औसतन पैदावार 188 क्विंटल प्रति एकड़ है।
 

ज़मीन की तैयारी

खेत को नदीन मुक्त बनाने के लिए अच्छी तरह जोताई करें। अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए 6-8 बार जोताई करें। जई की फसल जौं और गेहूं की फसल के मुकाबले ज्यादा पी एच वाली मिट्टी को सहन कर सकती हैं। जई की फसल को बीजों के द्वारा उगाया जाता है।

बिजाई

बिजाई का समय
अक्तूबर के दूसरे से आखिरी सप्ताह का समय बिजाई के लिए उचित माना जाता है।
 
फासला
पंक्तियों में 25-30 सैं.मी. का फासला रखें।
 
बीज की गहराई
बीज की गहराई 3-4 सैं.मी. होनी चाहिए।
 
बिजाई का ढंग
बीज की गहराई ज़ीरो टिल्लर मशीन या बिजाई वाली मशीन से की जा सकती है।
 

बीज

बीज की मात्रा
25 किलो बीज प्रति एकड़ का प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार
बीजों को बिजाई से पहले कप्तान या थीरम 3 ग्राम से प्रति किलो बीज से उपचार करें। इससे बीजों के फफूंदी वाली बीमारियों और बैक्टीरिया विषाणु से बचाया जा सकता है।
 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

Urea SSP MOP
66 50 -

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

Nitrogen Phosphorus Potash
30 8 -

 

ज़मीन की तैयारी के समय खेत में रूड़ी की खाद डालें। नाइट्रोजन 30 किलो (66 किलो यूरिया) और फासफोरस 8 किलो (50 किलो सिंगल सुपर फासफेट) मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन, बिजाई के 30-40 दिन के बाद डालें।

 

खरपतवार नियंत्रण

यदि पौधे सही ढंग से खड़े हों तो नदीनों की रोकथाम की जरूरत नहीं होती है। जई की फसल में नदीन कम पाए जाते हैं। नदीनों को निकालने के लिए कही से गोडाई करें।

सिंचाई

जई मुख्य तौर पर बारानी क्षेत्रों की फसल के तौर पर उगाई जाती है पर यदि इसे सिंचाई वाले क्षेत्रों में उगाया जाये तो बिजाई के 25-28 दिनों के फासले पर दो बार सिंचाई करें।

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : यह जई की फसल का मुख्य कीट है। यह पौधे के सैलों का रस चूस लेता है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और इन पर धब्बे पड़ जाते हैं।
 
इन के हमले को रोकने के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 0.03 प्रतिशत का प्रयोग करें। स्प्रे करने के 10-15 दिनों के बाद जई की फसल को चारे के तौर पर पशुओं को ना डालें।
 
पत्तों पर काले धब्बे
  • बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर काले धब्बे : इससे फफूंदी सैलों में अपने आप पैदा हो जाती है। पौधों के शिखरों से कोंडिओफोरस स्टोमैटा के बीच में ही एक सिंगल राह बना लेते हैं। यह फंगस भूरे रंग से काले रंग की हो जाती है। शुरूआती बीमारी पत्तों के शिखरों से आती है और दूसरी बार यह बीमारी हवा द्वारा सुराखों में फैलती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बीज का उपचार करना जरूरी है।
 
जड़ गलन
जड़ गलन : यह जड़ों के विषाणुओं के कारण होता है। बिजाई से पहले बीजों को अच्छी तरह उपचार करने से इस बीमारी को रोका जा सकता है।
 

फसल की कटाई

बिजाई के 4-5 महीने बाद जई पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। दाने झड़ने से बचाने के लिए अप्रैल महीने के शुरूआत में ही कटाई कर लेनी चाहिए।

रेफरेन्स

1.Punjab Agricultural University Ludhiana

2.Department of Agriculture

3.Indian Agricultural Research Instittute, New Delhi

4.Indian Institute of Wheat and Barley Research

5.Ministry of Agriculture & Farmers Welfare