गेहूं उत्पादन

आम जानकारी

भारत के 13 प्रतिशत फसली क्षेत्र में गेहूं उगायी जाती है। धान के बाद गेहूं भारत की सबसे महत्तवपूर्ण अनाज की फसल है और भारत के उत्तर और उत्तरी पश्चिमी प्रदेशों के लाखों लोगों का मुख्य भोजन है।

यह प्रोटीन, विटामिन और कार्बोहाइड्रेटस का समृद्ध स्त्रोत है और संतुलित भोजन प्रदान करता है। रूस, अमरीका और चीन के बाद भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा गेहूं का उत्पादक है। विश्व में पैदा होने वाली गेंहूं की पैदावार में भारत का योगदान 8.7 फीसदी है।

जलवायु

  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75 cm (max)
    20-25 cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75 cm (max)
    20-25 cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75 cm (max)
    20-25 cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C
  • Season

    Temperature

    21-26°C
  • Season

    Rainfall

    75 cm (max)
    20-25 cm (min)
  • Season

    Sowing Temperature

    18-22°C
  • Season

    Harvesting Temperature

    20-25°C

मिट्टी

चिकनी मिट्टी या नहरी मिट्टी, जो कि सही मात्रा में पानी को सोख सके, अच्छी मानी जाती है। भारी मिट्टी वाले सूखे क्षेत्र, जिनमें पानी के निकास का पूरा प्रबंध हो, भी इसकी खेती के लिए अच्छे माने जाते हैं।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

PBW 752: यह देरी से बोई जाने वाली किस्म है। यह समय सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 19.2 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

PBW 1 Zn: इस किस्म के पौधे का कद 103 सैं.मी. होता है। फसल 151 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 22.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

 

UNNAT PBW 343: यह किस्म सिंचित क्षेत्रों और समय पर रोपाई के लिए उपयुक्त है। पकने के लिए 155 दिनों का समय लेती है। यह किस्म गर्दन तोड़ और जल जमाव के प्रतिरोधी है। यह करनाल बंट के प्रतिरोधी  और ब्लाईट को भी सहने योग्य है। इसकी औसत पैदावार 23.2 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

WH 542: यह किस्म समय पर बुवाई करने और सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह धारी जंग, पत्ती जंग और करनाल बंट के लिए प्रतिरोधी है। इसकी औसत पैदावार 20 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

PBW 725: यह किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई है। यह एक बौनी प्रकार की किस्म है और समय पर बोयी जाने, सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह पीले और भूरे जंग की प्रतिरोधी है। इसके दाने मोटे, सख्त और मध्यम गहरे रंग के होते हैं। यह 155 दिनों के बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 23 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

PBW 677:  यह किस्म 160 दिनों के बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 22.4 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

HD 2851: यह किस्म समय पर उगाने योग्य किस्म है और सिंचित क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह किस्म 126-134 दिनों में पक जाती है और इस किस्म का कद 80-90 सैं.मी. होता है।

 

WHD - 912: यह दोहरी छोटे कद की किस्म है जो उदयोग में बेकरी के लिए प्रयोग की जाती है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 12 प्रतिशत होती है। यह किस्म पीले, भूरे जंग के साथ करनाल बंट के भी प्रतिरोधी है। इसकी औसत उपज 21 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

HD 3043: इस किस्म की औसत उपज 17.8 क्विंटल प्रति एकड़ है। यह किस्म पत्तों के ऊपर पीले धब्बे और पीली धारियों की बीमारी से काफी हद तक रहित है। इस किस्म से अच्छे ब्रैड का निर्माण होता है।

 

WH 1105: इसकी खोज पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी द्वारा की गई है। यह एक छोटे कद की किस्म है जिसमें पौधे का औसतन कद 97 सैंमी तक होता हे। इसके दाने सुनहरे, मध्यम, सख्त और चमकदार होते हैं। यह पत्तों के पीलेपन और भूरेपन की बीमारी से रहित है। परंतु यह दानों के खराब होने के प्रति संवेदनशील है। यह लगभग 157 दिनों में पक जाती है। इसकी औसतन पैदावार 23.1 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

PBW 660: पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी द्वारा पंजाब राज्य के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गेंहूं की पैदावार बढ़ाने के लिए इसकी खोज की गई है। यह एक छोटे कद वाली किस्म है। जिस में पौधेका औसतन कद 100 सैंमी तक होता है। इसके दाने सुनहरे, मध्यम, सख्त और चमकदार होते हैं और इससे अच्छी किस्म की रोटियां भी बनती है। यह पत्तों के पीलेपन और भूरेपन की बीमारी से रहित होती है परंतु यह बालियों के भूरे पड़ने की बीमारी के प्रति संवेदनशील है। यह लगभग 162 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 17.1 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

PBW-502: यह किस्म पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित की गई है। यह समय पर बोने और सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह धारी जंग और पत्ती जंग के प्रतिरोधी है।

 

HD 3086 (PusaGautam): इसकी औसत पैदावार 23 क्विंटल प्रति एकड़ है। यह पीली और भूरी जंग के प्रतिरोधी है। अच्छे किस्म के  बरैड बनाने के सभी गुण/तत्व इसमें मौजूद हैं। 

 

HD 2967: यह बहुत बड़े कद की किस्म है जिसमें पौधे का औसतन कद 101 सैंमी होता है। इसके दाने सुनहरे, मध्यम, सख्त और चमकदार होते हैं। यह लगभग 157 दिनों में पक जाती है। यह पत्तों के पीलेपन और भूरेपन से रहित है। इसकी औसत पैदावर 21.5 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

DBW17: इसके पौधे का कद 95 सैं.मी. होता है। इसके दाने सख्त, मध्यम और चमकदार होते हैं। यह पीली और भूरी जंग के प्रतिरोधी है। यह 155 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 23 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

PBW 621: इस किस्म को पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 158 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी के प्रतिरोधक है। इस किस्म का औसतन कद 100 सैं.मी. होता है।

 

UNNAT PBW 550: इस किस्म को पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 145 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी के प्रतिरोधक है। इस किस्म का औसतन कद 100 सैं.मी. होता है। इसकी औसतन पैदावार 23 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

 

TL 2908: इसे पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 153 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म ज्यादातर सभी गंभीर बीमारियों के प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 113 सैं.मी. होता है।

 

PBW 175: इसे पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 165 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म कुंगी और करनाल बंट बीमारियों के प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 110 सैं.मी. होता है।

 

PBW 527: इसे पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 160 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी के प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 100 सैं.मी. होता है।

 

WHD 943: इसे पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 154 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी के प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 93 सैं.मी. होता है।

 

PDW 291: इसे पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 155 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी, कांगियारी और झूठी कुंगी बीमारियों के प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 83 सैं.मी. होता है।

 

PDW 233: इसे पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह किस्म 150 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी, कांगियारी और झूठी कुंगी बीमारियों के प्रतिरोधक है। इसका औसतन कद 98 सैं.मी. होता है।

 

PBW 590: यह किस्म पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह 128 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी रोगों के लिए प्रतिरोधक किस्म है। इसका औसतन कद 80 सैं.मी. होता है।

 

PBW 509: यह पंजाब के उप पर्वतीय क्षेत्रों को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह किस्म 130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म पीली और भूरी कुंगी रोगों के लिए प्रतिरोधक किस्म है। इसका औसतन कद 85 सैं.मी. होता है।

 

PBW 373: यह किस्म पंजाब के सभी क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह किस्म 140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म भूरी कुंगी रोग के लिए प्रतिरोधक किस्म है। इसका औसतन कद 90 सैं.मी. होता है।

 

दूसरे राज्यों की किस्में

 

RAJ-3765: यह किस्म 120-125 दिनों में पक जाती है। यह किस्म गर्मी को सहने योग्य, धारी जंग,  भूरी जंग और करनाल बंट के प्रतिरोधी हैं इसकी औसत पैदावार 21 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

UP-2338: यह किस्म 130 से 135 दिनों में पकती है। इसके दाने सख्त, रंग शरबती और मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। उसकी औसत उपज 20-22 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

UP-2328: यह किस्म 130 से 135 दिनों में पकती है। इसके दाने सख्त, रंग शरबती और मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयंक्त है। असकी औसत उपज 20-22 क्विंटल प्रति एकड़ है।

 

Sonalika: यह एक जल्दी पकने वाली, छोटे कद वाली गेहूं की किस्म है। जो कि बहुत सारे हालातों के अनुकूल है। इसके दाने सुनहरी होते हैं। इसकी बुवाई पिछेती की जा सकती है और यह फंगस की बीमारियों से रहित होती है।

 

Kalyansona: यह गेहूं की बहुत छोटे कद वाली किस्म है। जो कि बहुत सारे हालातों के अनुकूल होती है। और पूरे भारत में इसको बीजने की सलाह दी जाती है। इसे बहुत जल्दी फंगस की बीमारी लगती है।इसलिए इसे फंगस रहित क्षेत्रों में बीजने की सलाह दी जाती है।

 

UP-(368): अधिक पैदावार वाली इस किस्म को पंतनगर द्वारा विकसित किया गया है। यह फंगस और पीलेपन की और बीमारियों से रहित होती है।

 

WL-(711): यह छोटे कद और अधिक पैदावार वाली और कम समय में पकने वाली किस्म है। यह कुछ हद तक सफेद धब्बे ओर पीलेपन की बीमारी से रहित होती है।

 

UP-(319): यह बहुत ज्यादा छोटे कद वाली गेहूं की किस्म है, जिसमें फंगस/उल्ली के प्रति प्रतिरोधकता काफी हद तक पाई जाती है। दानों को टूटने से बचाने के लिए इसकी समय से कटाई कर लेनी चाहिए।

 

देर से बोई जाने वाली किस्में HD-293, RAJ-3765, PBW-373, UP-2338, WH-306, 1025

 

ज़मीन की तैयारी

पिछली फसल की कटाई के बाद खेत की अच्छे तरीके से ट्रैक्टर की मदद से जोताई की जानी चाहिए। खेत को आमतौर पर ट्रैक्टर के साथ तवियां जोड़कर जोता जाता है और  उसके बाद दो या तीन बार हल से जोताई की जाती है।खेत की जोताई शाम के समय की जानी चाहिए और रोपाई की गई ज़मीन को पूरी रात खुला छोड़ देना चाहिए ताकि वह ओस की बूंदों से नमी सोख सके।

बिजाई

बिजाई का समय
गेंहूं की बिजाई सही समय पर करनी जरूरी है। पिछेती बिजाई की फसल की पैदावार पर बुरा असर पड़ता है। गेहूं की बिजाई 25 अक्तूबर से नवंबर के महीने में की जाती है।
 
फासला
फसल की अच्छी पैदावार के लिए कतारों में 20-22.5 सै.मी.  का अंतर होना जरूरी है। पिछेती बीजी गई फसल में कतारों में 15-18 सै.मी. तक का अंतर होना जरूरी है।
बीज की गहराई
बीज की गहराई 4-5 सैंमी होनी चाहिए।
 
बिजाई की ढंग
1.बिजाई वाली मशीन 
2. छींटा देना विधि द्वारा
3. जीरो टिलेज़ ड्रिल 
4. रोटावेटर
 
 

बीज

बीज की मात्रा:
 
45 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। बीज साफ और अच्छे होने चाहिए।
 
बीज का उपचार:
 
बीज के उपचार के लिए नीचे लिखी फंगसनाशी दवाईयों में से किसी एक का प्रयोग करें।
 
 
 फंगसनाशी/कीटनाशी दवाई           मात्रा (प्रति किलोग्राम बीज)
Raxil 2 gm
Thiram 2 gm
Vitavax 2 gm
Tebuconazole 2 gm

 

खाद

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA DAP or SSP MOP ZINC
110 55 155 20 -

 

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
50 25 12

 

खरपतवार नियंत्रण

रसायनों से नदीनों की रोकथाम - इसमें कम मेहनत और हाथों से नदीनों को उखाड़ने से होने वाली हानि ना होने के कारण ज्यादातर यह तरीका अपनाया जाता है। नुकसान से बचने के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई से 3 दिन पहले या बाद में  प्रति एकड़ में छिड़काव करना चाहिए।

चौड़े पत्तों वाले नदीनों की रोकथाम के लिए 2,4-D 250 मि.ली.  को 150 लीटर पानी में घोलकर प्रयोग करें।
 

 

सिंचाई

सिंचाई के लिए सिफारिश किया गया समय नीचे टेबल में दिखाया गया है:-

 
सिंचाई की संख्या बुवाई के बाद सिंचाई (दिनों में)
पहली सिंचाई 20-25 दिनों में
दूसरी सिंचाई 40-45 दिनों में
तीसरी सिंचाई 60-65 दिनों में
चौथी सिंचाई 80-85 दिनों में
पांचवी सिंचाई 100-105 दिनों में
छठी सिंचाई 115-120 दिनों में

 

सिंचाई की संख्या हमेशा मिट्टी की किस्म, पानी की उपलब्धता आदि पर आधारित होती है। सहायक जड़ें और बालियां बनने के समय नमी की कमी ना होने दें। छोटे कद की अधिक उपज वाली किस्मों के लिए बिजाई से पहले सिंचाई करें। भारी मिट्टी के लिए 4 से 6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है जबकि हल्की मिट्टी के लिए 6 से 8 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। पानी की पूर्ति कम होने पर सिंचाई सिर्फ गंभीर अवस्थाओं में ही करें। जब पानी सिर्फ एक सिंचाई के लिए उपलब्ध हो तो शुरूआती सहायक जड़ें बनने के समय करें। जब दो सिंचाइयां उपलब्ध हो तो सहायक जड़ें बनने के समय और फूल निकलने की अवस्था में सिंचाई करें। जब तीन सिंचाइयां संभव हों तो पहली सिंचाई सहायक जड़ें बनने के समय और दूसरी सिंचाई जोड़ बनने के समय और तीसरी सिंचाई दूध के दाने बनने के समय करें। शुरूआती सहायक जड़ें बनने की अवस्था सिंचाई के लिए बहुत महत्तवपूर्ण अवस्था है। यह पाया गया है कि शुरूआती सहायक जड़ें बनने की अवस्था की पहली सिंचाई से लेकर हर सप्ताह की देरी से पैदावार में 83-125 किलो प्रति  एकड़ की कमी आती है।
 
पहली सिंचाई बिजाई के 20-25 दिनों के बाद सिंचाई करनी चाहिए। यह सहायक जड़ें बनने की अवस्था होती है और यदि अवस्था में नमी की कमी हो तो उपज में काफी कमी आती है। बिजाई के बाद 40-45 दिनों में शाखाएं बनने की अवस्था में सिंचाई करें। तीसरी सिंचाई बिजाई के बाद 60-65 दिनों में जोड़ बनने के समय करें। चौथी सिंचाई 80-85 दिनों में फूल बनने की अवस्था में करें। पांचवी सिंचाई बिजाई के बाद 100-105 दिनों में गेहूं पकने की अवस्था में करें।

 

पौधे की देखभाल

चेपा
  • हानिकारक कीट और रोकथाम
 
चेपा : यह पारदर्शी, रस चूसने वाला कीट है। यदि यह बहुत ज्यादा मात्रा में हो तो यह पत्तों के पीलेपन या उनको समय से पहले सुखा देता है। आमतौर पर यह आधी जनवरी के बाद फसल के पकने तक के समय दौरान हमला करती है।
 
इसकी रोकथाम के लिए कराईसोपरला प्रीडेटर्ज़, जो कि एक, सुंडियां खाने वाला कीड़ा है, का प्रयोग करना चाहिए। 10-15 हज़ार कीड़े प्रति एकड़ या 50 मि.ली. प्रति लीटर नीम के घोल का उपयोग करें। बादलवाई के दौरान सूंडी का हमला शुरू होता है। थाइमैथोक्सम@80 ग्राम या इमीडाक्लोप्रिड 40-60 मि.ली. को 100 लीटर पानी में घोल तैयार करके एक एकड़ पर छिड़काव करें।
 
दीमक

दीमक:  दीमक की तरफ से फसल के विभिन्न विभिन्न विकास के पड़ाव, बीज अंकुरन से लेकर पकने तक हमला किया जाता है। बुरी तरह ग्रसित पौधों की जड़ों को आराम से उखाड़ा जा सकता है और यह पत्ता लपेट और सूखे हुए नज़र आते हैं। यदि आधी जड़ खराब हो तो बूटा पीला पड़ जाता है।

इसकी रोकथाम के लिए एक लीटर क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. को 20 किलो मिट्टी में मिलाके एक एकड़ में बुरकाव करना चाहिए और उसके बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

कांगियारी
  • बीमारियां और रोकथाम
कांगियारी : यह बीजों से होने वाली बीमारी है। हवा से इसकी लाग और फैलती है। बालियां बनने के समय कम तापमान, नमी वाले हालात इसके लिए अनुकूल होते हैं।
यदि बीजों पर इस बीमारी का हमला ज्यादा हो तो फंगसनाशी जैसे कार्बोक्सिल (विटावैक्स 75 डब्लयू पी), कार्बेनडाज़िम (बाविस्टिन 50 डब्लयु पी 2.5 ग्राम), टैबुकोनाज़ोल (रैक्सिल 2 डी एस 1.25 ग्राम) से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यदि हमला कम हो तो ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें और सिफारिश की गई खुराक कार्बोक्सिन विटावैक्स 75 डब्लयु पी  1.25 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।
 
सफेद धब्बे
सफेद धब्बे : इस बीमारी के दौरान पत्ते, खोल, तने और फूलों वाले भागों पर सफेद रंग की फंगस दिखनी शुरू हो जाती है। यह  फंगस बाद में काले धब्बों का रूप ले लेती है इससे पत्तों और बाकी के भाग सूखने शुरू हो जाते हैं।
 
जब इस बीमारी का हमला सामने आए तो फसल पर 2 ग्राम घुलनशील सल्फर को प्रति लीटर पानी में मिलाकर या 400 ग्राम कार्बेनडाज़िम का प्रति एकड़ में छिड़काव करें। गंभीर हालातों में 2 मि.ली.  प्रोपीकोनाज़ोल को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
भूरी कुंगी
भूरी कुंगी : गर्म तापमान (15-30°C) और नमी वाले हालात इसका कारण बनते हैं। पत्तों के भूरेपन के लक्षण की पहचान पत्तों के ऊपर लाल - भूरे रंग के अंडाकार या लंबकार दानों से होती है। जब खुली मात्रा में नमी मौजूद हो और तापमान 20°C के नजदीक हो तो यह बीमारी बहुत जल्दी बढ़ती है। यदि हालात अनुकूल हों तो इस बीमारी के दाने हर 10-14 दिनों के बाद दोबारा पैदा हो सकते हैं।
 
इस बीमारी की रोकथाम के लिए अलग अलग किस्म की फसलों को एक ज़मीन पर एक समय लगाने के तरीके अपनाने चाहिए। नाइट्रोजन के ज्यादा प्रयोग से परहेज़ करना चाहिए। ज़िनेब Z-78 400 ग्राम की प्रति एकड़ में या प्रोपीकोनाज़ोल 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
 
पीली कुंगी
पीली धारीदार कुंगी यह बीमारी जीवाणुओं के विकास और संचार के लिए 8-13 डिगरी सैल्सियस तापमान अनुकूल होता है और इनके बढ़ने फूलने के लिए 12-15 डिगरी सैल्सियस तापमान पानी के बिना अनुकूल होता है। इस बीमारी के कारण गेहूं की फसल की पैदावार में 5-30 तक कमी आ सकती है। इस बीमारी से बने धब्बों में पीले से संतरी पीले रंग के विषाणु होते हैं। जो आमतौर पर पत्तों पर बारीक धारियां बनाते हैं।
 
इस बीमारी की रोकथाम के लिए कुंगी की रोधक किस्मों का प्रयोग करें। फसली चक्र और मिश्रित फसलों की विधि अपनायें। नाइट्रोजन का ज्यादा प्रयोग ना करें। जब इस बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो 5-10 किलोग्राम सल्फर का छिड़काव प्रति एकड़ या 2 ग्राम मैनकोजेब प्रति लीटर या 2 मि.ली. प्रोपीकोनाज़ोल 25 ई सी को 1 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
 
 
 
करनाल बंट
करनाल बंट- यह बीज और मिट्टी से होने वाली बीमारी है लाग की शुरूआत बालियां बनने के समय होती है। बालियां बनने से लेकर उसमें दाना पड़ने तक के पड़ाव के दौरान यदि बादलवाई रहती है तो यह बीमारी और भी घातक हो सकती है। यदि उत्तरी भारत के समतल क्षेत्रों में फरवरी महीने के दौरान बारिश पड़ जाए तो इस बीमारी के कारण बहुत ज्यादा नुकसान होता है।
 
इस बीमारी की रोकथाम के लिए करनाल बंट की रोधक किस्मों का प्रयोग करें। इस बीमारी की रोकथाम के लिए पत्ते के बनने के समय एक मि.ली. प्रोपीकोनाज़ोल (टिल्ट) 25 ई सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर बालियां बनने की अवस्था में स्प्रे करें।
 
 

फसल की कटाई

उच्च पैदावार वाली फसलों की किस्मों की कटाई पत्तों और तने के पीले पड़ने और सूखने के बाद की जाती है। हानि से बचने के लिए फसल की कटाई इसके पके हुए पौधों के सूखने से पहले की जानी चाहिए। ग्राहक की तरफ से इसे स्वीकारने और इसकी अच्छी गुण्वत्ता के लिए इसको सही समय पर काटना चाहिए। जब दानों में 25-30 प्रतिशत नमी रह जाती है तो यह इसे काटने का सही समय होता है। हाथ से गेहूं काटने के समय तेज धार वाली द्राती का प्रयोग करना चाहिए। कटाई के लिए कंबाइने भी उपलब्ध हैं, जिनकी सहायता से गेहूं की फसल की कटाई, दाने निकालना और छंटाई एक ही बार में की जा सकती है।

कटाई के बाद

हाथों से कटाई करने के बाद फसल को तीन से चार दिनों के लिए सुखाना चाहिए ताकि दानों में नमी 10-12 प्रतिशत के मध्य रह जाए और उसके बाद बैलों की मदद से चलने वाले थ्रैशर की मदद से दाने निकालने चाहिए। सीधा धूप में बहुत ज्यादा सुखाने से परहेज़ करना चाहिए और दानों को साफ-सुथरी बोरियों में भरना चाहिए ताकि नुकसान को कम किया जा सके।
 
पूसा बिन मिट्टी या ईंटों से बनाया जाता है और इसकी दीवारों में पॉलिथीन की एक परत चढ़ाई जाती है। जब कि बांस के डंडों के आस-पास कपड़ों की मदद से सिंलडर के आकार में ढांचा तैयार किया जाता है और इसका तल मैटल की ट्यूब की सहायता से तैयार किया जाता है। इसे हपूरटेका कहा जाता है, जिसके निचली ओर एक छोटा छेद किया जाता है ताकि इसमें से दानों को निकाला जा सके। बड़े स्तर पर दानों का भंडार सी ए पी और सिलोज़ में किया जाता है।
 
भंडार के दौरान अलग अलग तरह के कीड़ों और बीमारियों से दूर रखने के लिए बोरियों में 1 प्रतिशत मैलाथियोन रोगाणुनाशक का प्रयोग किया जाता है। भंडार घर को अच्छी तरह साफ करें, इसमें से आ रही दरारों को दूर करे और चूहे की खुड्डों को सीमेंट से भर दें। दानों को भंडार करने से पहले भंडार घर में सफेदी करवानी चाहिए। और इसमें 100 वर्गमीटर के घेरे में 3 लीटर मैलाथियान 50 ई.सी. का छिड़काव करना चाहिए। बोरियों के ढेर को दीवारों से 50 सै.मी. की दूरी पर रखना चाहिए और ढेरों के बीच में कुछ जगह देनी चाहिए। 
 
 

रेफरेन्स

1.Punjab Agricultural University Ludhiana

2.Department of Agriculture

3.Indian Agricultural Research Instittute, New Delhi

4.Indian Institute of Wheat and Barley Research

5.Ministry of Agriculture & Farmers Welfare