Posted by Buta singh
Punjab
23-08-2019 08:24 AM
Posted by om kumar
Punjab
23-08-2019 08:17 AM
om kumar ji punjab vich aje pm kusum yojna da labh milna shuru nahi hoeya ji. es te 3-4 month lagange ji. odo tohanu sari jankri de ditti javegi ji.
Posted by Ramesh kc Bundelkhand
Madhya Pradesh
23-08-2019 08:11 AM
Ramesh ji jab dhan 5% tak nisar jati hai tab aap 13:00:45@10 gram ko prati litre pani ke hisab se spray karen.dhanywad
Posted by harjinder singh khehra
Punjab
23-08-2019 08:08 AM
bhaa g nere de doctor nu dikhao Chaare thanaa da dudh culture karwa lao ja phir 15-20gram nimbu da sat 15- 20din de ke dekho Dhaar anguthha de ke na chovo
Posted by Shubham Patidar
Madhya Pradesh
23-08-2019 08:01 AM
यह किसम 95 से 100 दिनों में आपकी फसल तैयार हो जाती है
Posted by Anuj Kushwaha
Uttar Pradesh
23-08-2019 07:59 AM
Sahib G operating or recurring cost jo har roz hundi hai jiwr hara chaara feed medicine AI te fixed cost hundi hai jo ik vaar karni hundi hai jiwe pashu di kimat wich ghaata shed ch ghaata kul punji da viaaj machinery wich ghaata

Posted by khuspal
Punjab
23-08-2019 07:58 AM
khuspa ji same wali jameen ch roots galan di problam ho skdi aa.captan ya carbedizm fungicide de ghol vich roots nu dip krke pneeri agge khet vich lgaao ji.

Posted by khuspal
Punjab
23-08-2019 07:57 AM
khuspal ji jina khetan vich pani ghat jeeran di smasya hai othe tuc sulphur@3 killo prati acre de hisab nal varto karo.dhanwad
Posted by lakhvir Brar
Punjab
23-08-2019 07:55 AM
Saaf shishi ch taaran pa ke nere di laboratory wich culture karwa ke dwaee bhrao Gabhan karaun lai Teeka sahi samen doctor ton lagwao

Posted by dhaval
Gujarat
23-08-2019 07:54 AM
अरंडी मुख्य रूप से इसके बीजों के लिए उगाया जाने वाला वार्षिक पौधा है इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने के लिए प्रयोग नहीं होता है, पर इसका उद्योगिक स्तर पर काफी प्रयोग होता है इसके अलावा औषधीय और प्रकाश उद्देश्य से भी इसका उपयोग किया जाता है तेल निकालने के बाद बाकी बचे तेल केक को जैविक खाद के रूप में प्रयोग क.... (Read More)
अरंडी मुख्य रूप से इसके बीजों के लिए उगाया जाने वाला वार्षिक पौधा है इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने के लिए प्रयोग नहीं होता है, पर इसका उद्योगिक स्तर पर काफी प्रयोग होता है इसके अलावा औषधीय और प्रकाश उद्देश्य से भी इसका उपयोग किया जाता है तेल निकालने के बाद बाकी बचे तेल केक को जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है भारत अरंडी का मुख्य उत्पादक देश है और भारत में गुजरात, आंध्र प्रदेश और राजस्थान मुख्य अरंडी उत्पादक राज्य हैं व्यापारिक खेती के लिए कम उपजाऊ भूमि का प्रयोग अरंडी की खेती के लिए किया जाता है पर यह गहरी, अच्छे निकास वाली, उपजाऊ, हल्की तेजाबी रेतली दोमट मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है मिट्टी की पी एच 5 से 8.5 होनी चाहिए गर्मियों में खेत की तीन से चार बार गहरी जोताई करें इससे नदीनों को खत्म करने और मिट्टी में नमी रखने में मदद मिलेगी डलियों को तोड़ने के लिए जोताई के बाद तवियों से जोताई करें फिर मिट्टी के स्तर को समतल करें ताकि खेत में पानी ना खड़ा रह सके अरंडी को पूरे वर्ष उगाया जा सकता है, जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो अरंडी की खेती के लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह से लेकर अगस्त का पहला सप्ताह उपयुक्त होता है फासला किस्म और बिजाई के समय पर आधारित होता है सिंचित हालातों में 90सैं.मी.x60 सैं.मी. या 120 सैं.मी.x 60 सैं.मी.फासले का प्रयोग करें जब कि बारानी हालातों में 60 सैं.मी.x45 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें बीजों को ज्यादा गहराई में बोने से परहेज़ करें इन्हें 5 सैं.मी. की गहराई में बोयें इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर की जाती है किस्म के आधार पर फसल 145-180 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है जब एक या दो फल सूखते या पीले होते दिखाई दें, तो अरंडी की गुच्छों में कटाई शुरू करें सभी गुच्छे समान समय पर नहीं पकते इसलिए दो-तीन तुड़ाइयां आवश्यक हैं तुड़ाई के बाद गुच्छों को धूप में चार से पांच दिन सुखाएं अच्छी तरह से सूखने के बाद बीजों को अलग कर लें फलों की जल्दी कटाई ना करें इससे तेल की प्रतिशतता कम हो जाती है यह बिजाई के ढंग पर आधारित होती है यदि बीजों को हल के पीछे डालना है तो ज्यादा बीजों की मात्रा 4.5 से 6 किलोग्राम प्रति एकड़ में आवश्यकता होती है यदि गड्ढा खोदकर बिजाई की जाए तो 2.5 से 3.3 किलोग्राम प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है फसल को मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें अच्छी तरह से सूखे हुए फलों में से बीजों को अलग कर लें उसके बाद बीजों से अरंडी का तेल निकाल लें तेल निकालने के बाद तेल केक में 8-10 प्रतिशत अरंडी का तेल होता है तेल केक का प्रयोग खेत में जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है अरंडी की पूरी फसल को 17-20 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है बारिश के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती शुरूआती अवस्था में नदीनों की रोकथाम बहुत महत्तवपूर्ण है बिजाई के 20वें और 50वें दिन बाद हाथों से दो बार गोडाई करें बिजाई के दूसरे और तीसरे दिन बाद पैंडीमैथालीन 1 लीटर को 250 लीटर पानी में मिलाकर डालें यह घास और चौड़े पत्तों वाले नदीनों को रोकने में सहायक होगा

Posted by dhaval
Gujarat
23-08-2019 07:52 AM
अरंडी मुख्य रूप से इसके बीजों के लिए उगाया जाने वाला वार्षिक पौधा है इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने के लिए प्रयोग नहीं होता है, पर इसका उद्योगिक स्तर पर काफी प्रयोग होता है इसके अलावा औषधीय और प्रकाश उद्देश्य से भी इसका उपयोग किया जाता है तेल निकालने के बाद बाकी बचे तेल केक को जैविक खाद के रूप में प्रयोग क.... (Read More)
अरंडी मुख्य रूप से इसके बीजों के लिए उगाया जाने वाला वार्षिक पौधा है इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने के लिए प्रयोग नहीं होता है, पर इसका उद्योगिक स्तर पर काफी प्रयोग होता है इसके अलावा औषधीय और प्रकाश उद्देश्य से भी इसका उपयोग किया जाता है तेल निकालने के बाद बाकी बचे तेल केक को जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है भारत अरंडी का मुख्य उत्पादक देश है और भारत में गुजरात, आंध्र प्रदेश और राजस्थान मुख्य अरंडी उत्पादक राज्य हैं व्यापारिक खेती के लिए कम उपजाऊ भूमि का प्रयोग अरंडी की खेती के लिए किया जाता है पर यह गहरी, अच्छे निकास वाली, उपजाऊ, हल्की तेजाबी रेतली दोमट मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है मिट्टी की पी एच 5 से 8.5 होनी चाहिए गर्मियों में खेत की तीन से चार बार गहरी जोताई करें इससे नदीनों को खत्म करने और मिट्टी में नमी रखने में मदद मिलेगी डलियों को तोड़ने के लिए जोताई के बाद तवियों से जोताई करें फिर मिट्टी के स्तर को समतल करें ताकि खेत में पानी ना खड़ा रह सके अरंडी को पूरे वर्ष उगाया जा सकता है, जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो अरंडी की खेती के लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह से लेकर अगस्त का पहला सप्ताह उपयुक्त होता है फासला किस्म और बिजाई के समय पर आधारित होता है सिंचित हालातों में 90सैं.मी.x60 सैं.मी. या 120 सैं.मी.x 60 सैं.मी.फासले का प्रयोग करें जब कि बारानी हालातों में 60 सैं.मी.x45 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें बीजों को ज्यादा गहराई में बोने से परहेज़ करें इन्हें 5 सैं.मी. की गहराई में बोयें इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर की जाती है किस्म के आधार पर फसल 145-180 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है जब एक या दो फल सूखते या पीले होते दिखाई दें, तो अरंडी की गुच्छों में कटाई शुरू करें सभी गुच्छे समान समय पर नहीं पकते इसलिए दो-तीन तुड़ाइयां आवश्यक हैं तुड़ाई के बाद गुच्छों को धूप में चार से पांच दिन सुखाएं अच्छी तरह से सूखने के बाद बीजों को अलग कर लें फलों की जल्दी कटाई ना करें इससे तेल की प्रतिशतता कम हो जाती है यह बिजाई के ढंग पर आधारित होती है यदि बीजों को हल के पीछे डालना है तो ज्यादा बीजों की मात्रा 4.5 से 6 किलोग्राम प्रति एकड़ में आवश्यकता होती है यदि गड्ढा खोदकर बिजाई की जाए तो 2.5 से 3.3 किलोग्राम प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है फसल को मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें अच्छी तरह से सूखे हुए फलों में से बीजों को अलग कर लें उसके बाद बीजों से अरंडी का तेल निकाल लें तेल निकालने के बाद तेल केक में 8-10 प्रतिशत अरंडी का तेल होता है तेल केक का प्रयोग खेत में जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है अरंडी की पूरी फसल को 17-20 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है बारिश के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती शुरूआती अवस्था में नदीनों की रोकथाम बहुत महत्तवपूर्ण है बिजाई के 20वें और 50वें दिन बाद हाथों से दो बार गोडाई करें बिजाई के दूसरे और तीसरे दिन बाद पैंडीमैथालीन 1 लीटर को 250 लीटर पानी में मिलाकर डालें यह घास और चौड़े पत्तों वाले नदीनों को रोकने में सहायक होगा

Posted by Jagseer sidhu
Punjab
23-08-2019 07:33 AM
Duje pashu de munh cho jugala kad isnu khuao 1 kg kanak da dalia 500 g gur ch rinh ke 5- 7 din swer shaam khuao wadho wadh hara chaara dio
Posted by Krishna Kushwaha
Uttar Pradesh
23-08-2019 07:20 AM
बढ़ीया पैदावार लेने के लिए पहले 45 दिन फसल को नदीनों से बचाने के लिए बहुत जरूरी है खास तौर पर बिजाई से 3-6 हफ्ते बाद का समय बहुत ही नाज़ुक होता है नदीनों के कारण आम-तौर पर 30% पैदावार कम हो जाती है और ध्यान ना देने पर यह 60% तक कम हो जाती है इसलिए शुरुआती समय में मशीनों और रसायनों द्वारा नदीनों को रोका जा सकता है
फसल मे.... (Read More)
बढ़ीया पैदावार लेने के लिए पहले 45 दिन फसल को नदीनों से बचाने के लिए बहुत जरूरी है खास तौर पर बिजाई से 3-6 हफ्ते बाद का समय बहुत ही नाज़ुक होता है नदीनों के कारण आम-तौर पर 30% पैदावार कम हो जाती है और ध्यान ना देने पर यह 60% तक कम हो जाती है इसलिए शुरुआती समय में मशीनों और रसायनों द्वारा नदीनों को रोका जा सकता है
फसल में दो बार कसी से गोड़ाई करें, पहली बिजाई के 3 हफ्ते बाद और दूसरी पहली गोड़ाई के 3 हफ्ते बाद फलियां बनने के समय गोड़ाई ना करें नदीनों के अंकुरण से पहले फ्लूक्लोरालिन, 600 मि.ली. या पेंडीमिथालिन 1 लीटर को प्रति एकड़ में डालें और फ़ी बिजाई से 36-40 दिन बाद एक बार हाथों से गोड़ाई करें
दूसरी गोड़ाई के समय जड़ों के साथ मिट्टी चढ़ाएं यह मूंगफली की फसल के लिए एक जरूरी क्रिया है बिजाई के 40-45 दिनों के बीच जड़ों के साथ मिट्टी चढ़ाने पर फलियों के संचार में आसानी होती है और इससे पैदावार में भी विकास होता है
Posted by Lovepreet Sandhu
Punjab
23-08-2019 07:17 AM
ਇਸਦੀ ਅੱਖ ਵਿਚ ਤੁਸੀ Genta-D ਦਵਾਈ ਦੀਆ ਬੂੰਦਾਂ ਪਾਉਣੀਆਂ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰੋ, ਇਸ ਨਾਲ ਫਰਕ ਪੈਣ ਲਗ ਜਾਵੇਗਾ

Posted by daler singh
Punjab
23-08-2019 07:13 AM
Bhaa G je bhukhaar hai tan chichtsn da ilaj karo khoon test krao je bukhaar nahi hai tan wadhya min mix 50 gram rozana dio te tonophos de 4-5 teeke lagwa lao

Posted by Gurwinder Sran Zaildar
Punjab
23-08-2019 07:08 AM
gurwinder ji isdi varto bijai to 10 din ja 30 dina bad khet vich vart sakde ho. isdi matra 8-10 killo prati acre de hisab nal chitta dita janda hai.dhanwad
Posted by Sanjeev Mishra
Odisha
23-08-2019 07:06 AM

Posted by Laxman Godara
Rajasthan
23-08-2019 07:04 AM
laxman ji aap keet ki roktham ke liye quinalphos@4ml ko prati litre pani ke hisab se spray karen.dhanwyad
Posted by Balkar Singh
Haryana
23-08-2019 07:03 AM
changa hai mastitis ghat hougiumar naal aape poli ho jaugi

Posted by RAJVEER SINGH BHULLAR
Punjab
23-08-2019 07:03 AM
राजवीर सिंह जी, यह मच्छर के हमले के कारण होता है इसकी रोकथाम के लिए इसमें imidacloprid @ 1.5 ml को प्रति लीटर पानी के हिसाब से स्प्रे कर सकते है
Posted by ਬਾਬਾ ਸੋਹਨ ਦਾਸ ਡੇਰਾ ਉਦਾਸੀਨ ਹਥਨ
Punjab
23-08-2019 06:56 AM
bhaa g chaar saaf sishian lao una wich ik ik thanh da dudh pa ke culture karwao unjh 15-20 din 15-20 din nimbu da sat de ke dekho Mastitis hai
Posted by Jaswant Singh
Rajasthan
23-08-2019 06:50 AM
njdiki doctor ko dikhaayen adhik hara chara den feed thoda pani ka chidkaaw kar gilaa kren 1 kg gehon ka daliyaa 500gm gud me ubaal kar 5 se 7 din den pet ke keet ke lie dwa den.
Posted by Pardeep singh maan
Punjab
23-08-2019 06:42 AM
Pardeep singh maan ji, kirpa kar ke tusi isde salt di photo bhejio taki tuhanu dekh ke isde bare vich jankari diti ja sake, dhanwad
Posted by Sonu Patidar
Rajasthan
23-08-2019 06:38 AM
Sonu ji usko nazdiki doctor se janch krwayen kyuki dhudh na anne ke kayi karan ho skte hai inki janch krke sahi ilagg ho skta hai..

Posted by NARESH KUMAR
Haryana
23-08-2019 06:14 AM
नरमे में आवश्यक यूरिया और डी ए पी का प्रयोग करने के बाद इस पर ग्रोथ के लिए npk 130045@2kg या triacontanol@250ml या gibberellic acid@250ml को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें इनके प्रयोग से पहले यूरिया की मात्रा सारी पूरी कर दें क्योंकि यूरिया डालने से नरमे की ग्रोथ चल पड़ती है
Posted by Gurdeep Sidhu
Punjab
23-08-2019 06:11 AM
bazaar ch thok ch dewormer ne har 3 mahine baad dio
Posted by Gurdeep Sidhu
Punjab
23-08-2019 06:07 AM
Bhaa G har pashu nu 50 g rozana mineral mix dena hunda hai or har 100 kilo feed ch 2 kg min mix ralao
Posted by Rajesh Kumar
Haryana
23-08-2019 05:59 AM
Rajesh ji aap iske uper malathion@4 gram ko prati litre pani ke hisab se spray karen.dhanywad

Posted by gurpreet singh
Punjab
23-08-2019 05:20 AM
खेत को नदीन मुक्त करने के लिए मलचिंग और नदीन नाशक आवश्यक होते हैं पैंडीमैथालीन 1 लीटर या फ्लूक्लोरालिन 800 मि.ली. को प्रति एकड़ में नदीनों के अंकुरण से पहले डालें

Posted by shyam ji
Uttar Pradesh
23-08-2019 05:13 AM
इसकी रोकथाम के लिए 3.0% पत्तों पर नीम के तेल की स्प्रे करें

Posted by bharulalnayak
Rajasthan
23-08-2019 02:26 AM
धान के बढ़िया फुटाव के लिए अब आप यूरिया के साथ biovita @8 किलो या फिर टाटा की ralli gold @4 किलो को प्रति एकड़ में इसका छींटा दें, इससे आपका धान बढ़िया फुटाव कर लेगा
Posted by SUBHO NASKAR
West Bengal
23-08-2019 01:58 AM
खुसखबरी बमोरिया फार्म को अब भारत सरकार का सपोर्ट मोती पालन और इंटीग्रेटेड फार्मिंग हेतु प्रशिक्षण में शुल्क में सब्सिड़ी पाए .एक एवं दो दिवशीय प्रशिक्षण साथ ही सरकार की योजनाए से कमाए 1-2 लाख रूपये प्रतिमाह MSME WHH Gram Swaraj Mission Debates free india Swachh bharat Abhiyan Zero waste Management मोती पालन के साथ समस्त योजनाओ की जानकारी अधिक जानकारी के लिए संपर.... (Read More)
खुसखबरी बमोरिया फार्म को अब भारत सरकार का सपोर्ट मोती पालन और इंटीग्रेटेड फार्मिंग हेतु प्रशिक्षण में शुल्क में सब्सिड़ी पाए .एक एवं दो दिवशीय प्रशिक्षण साथ ही सरकार की योजनाए से कमाए 1-2 लाख रूपये प्रतिमाह MSME WHH Gram Swaraj Mission Debates free india Swachh bharat Abhiyan Zero waste Management मोती पालन के साथ समस्त योजनाओ की जानकारी अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे अमित बमोरिया 9770085381,9407461361 https://youtu.be/nnzNw41gUIc

Posted by satbir singh
Haryana
23-08-2019 01:33 AM
नरमे में जूं, तेले और थ्रिप्स है, इसकी रोकथाम के लिए prophenofos@500ml याEthion@800ml या oberon@200ml या Bayer की Admire pro@12gm या Flotis@400ml की प्रति एकड़ के हिसाब से 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें

Posted by sandhu
Punjab
23-08-2019 01:02 AM
maj dian taaran culture karwa ke dwaee bhrwao teeka asli doctor ton lagwao
Posted by Gaya prasad
Uttar Pradesh
23-08-2019 12:07 AM
कंटोला सदियों से भारत में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध और पोषण सब्जियों में से एक है भारत में इस सब्जी को कंटोला या ककरोल के नाम से जाना जाता है कंटोला सब्जी करेले की विशेषता से मिलती जुलती हैं लेकिन स्वाद में इसके जैसी नहीं है यह सब्जी लंबाई मं छोटी और गोल आकार की होती है मिट्टी: कंटोला को रेतीली दोमट और चीकनी भू.... (Read More)
कंटोला सदियों से भारत में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध और पोषण सब्जियों में से एक है भारत में इस सब्जी को कंटोला या ककरोल के नाम से जाना जाता है कंटोला सब्जी करेले की विशेषता से मिलती जुलती हैं लेकिन स्वाद में इसके जैसी नहीं है यह सब्जी लंबाई मं छोटी और गोल आकार की होती है मिट्टी: कंटोला को रेतीली दोमट और चीकनी भूमि पर 5.5 से 7.0 की ph में उगाया जा सकता है इसकी खेती के लिए मिट्टी अच्छी तरह से जल निकासी और अच्छे कार्बनिक पदार्थों के साथ सर्वोत्तम हो जलवायु: कंटोला गर्म और कम सर्द मौसम की फसल है इस सब्जी की खेती उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय दोनों क्षेत्रों में की जा सकती है इस फसल को बेहतर विकास और उपज के लिए अच्छी धूप की आवश्यकता होती है इसकी खेती के लिए 27 से 32 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त है किस्में: Indira kankoda i (RMF 37) एक नई व्यावसायिक किस्म है, जिसे इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किया गया है इस हाइब्रिड किस्म की खेती उत्तर प्रदेश, ओडीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड और महाराष्ट्र में की जा सकती है यह बेहतर किस्म सभी प्रमुख कीटों और कीड़ों के लिए प्रतिरोधी है यह कटाई के लिए 35 से 40 दिन में तैयार हो जाती है ज़मीन की तैयारी: ट्रैक्टर या हल द्वारा भूमि को समतल और अच्छी तरह से तैयार करना चाहिए मिट्टी को बारीक करने के लिए 3 बार हल से जोताई करें अंतिम बार हल से जोताई करते समय मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने के लिए 15 से 20 टन खाद डालें बिजाई और फासला: तैयार बेड्ड में 2 सेंटीमीटर की गहराई में 2 से 3 बीज बोएं, मेड़ से मेड़ का फासला लगभग 2 मीटर या पौधे से पौधे का फासला लगभग 70 से 80 सेंटीमीटर होना चाहिए सिंचाई: खेत में बेड्ड पर बीज बोने के तुरंत बाद सिंचाई करें इसके बाद बीज के आधार पर ही सिंचाई करें बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है और मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है शुष्क मौसम की स्थिति में 1 या 2 सिंचाई सप्ताह के अंतराल पर करें कटाई: यह सब्जी बिजाई के 70 से 80 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाती है यह दूसरे वर्ष में 35 से 40 दिनों में तैयार हो जाती है
Posted by ਕੇਵਲਸਿੰਘ
Punjab
22-08-2019 10:15 PM
ਇਹ ਫ਼ਲ ਦੀ ਮੱਖੀ ਦੇ ਕਾਰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਇਹ ਅਮਰੂਦ ਦੇ ਬੂਟੇ ਨੂੰ ਲੱਗਣ ਵਾਲਾ ਖਤਰਨਾਕ ਕੀੜਾ ਹੈ ਮਾਦਾ ਮੱਖੀ ਨਵੇਂ ਲੱਗਣ ਵਾਲੇ ਫਲਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰਲੇ ਪਾਸੇ ਅੰਡੇ ਦੇ ਦਿੰਦੀ ਹੈ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਇਹ ਕੀੜੇ ਇਸ ਦਾ ਗੁੱਦਾ ਖਾਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਫ਼ਲ ਗਲ ਕੇ ਡਿੱਗ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜੇਕਰ ਫ਼ਲ ਉਤੇ ਮੱਖੀ ਦਾ ਹਮਲਾ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਹੁੰਦਾ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਬਰਸਾਤੀ ਮੌਸਮ ਵਿਚ ਬੂਟਿਆਂ ਦੀ ਬਿਜਾਈ ਨ.... (Read More)
ਇਹ ਫ਼ਲ ਦੀ ਮੱਖੀ ਦੇ ਕਾਰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਇਹ ਅਮਰੂਦ ਦੇ ਬੂਟੇ ਨੂੰ ਲੱਗਣ ਵਾਲਾ ਖਤਰਨਾਕ ਕੀੜਾ ਹੈ ਮਾਦਾ ਮੱਖੀ ਨਵੇਂ ਲੱਗਣ ਵਾਲੇ ਫਲਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰਲੇ ਪਾਸੇ ਅੰਡੇ ਦੇ ਦਿੰਦੀ ਹੈ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਇਹ ਕੀੜੇ ਇਸ ਦਾ ਗੁੱਦਾ ਖਾਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਫ਼ਲ ਗਲ ਕੇ ਡਿੱਗ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜੇਕਰ ਫ਼ਲ ਉਤੇ ਮੱਖੀ ਦਾ ਹਮਲਾ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਹੁੰਦਾ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਬਰਸਾਤੀ ਮੌਸਮ ਵਿਚ ਬੂਟਿਆਂ ਦੀ ਬਿਜਾਈ ਨਹੀਂ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ, ਫ਼ਸਲ ਦੀ ਤੁੜਾਈ ਸਹੀ ਸਮੇਂ ਕਰ ਲੈਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਤੁੜਾਈ ਵਿਚ ਦੇਰੀ ਨਹੀਂ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਬਿਮਾਰੀ ਤੋਂ ਪੀੜਤ ਟਾਹਣੀਆਂ ਅਤੇ ਫ਼ਲਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜ ਕੇ ਖੇਤ ਵਿਚੋਂ ਬਾਹਰ ਸੁੱਟ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਫ਼ਲਾਂ ਦੇ ਪੱਕਣ ਵੇਲੇ 80 ਮਿਲੀਲੀਟਰ ਫੈਨਵਾਲਰੇਟ ਨੂੰ 150 ਲੀਟਰ ਪਾਣੀ ਵਿਚ ਘੋਲ ਕੇ ਹਫ਼ਤੇ ਦੇ ਵਕਫ਼ੇ ਬਾਅਦ ਬੂਟਿਆਂ ਉਤੇ ਛਿੜਕਾਅ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਫੈਨਵਾਲਰੇਟ ਦੇ ਛਿੜਕਾਅ ਤੋਂ ਤੀਸਰੇ ਦਿਨ ਬਾਅਦ ਫ਼ਲਾਂ ਦੀ ਤੁੜਾਈ ਕਰ ਲੈਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ

Posted by Sumit jaiswal
Uttar Pradesh
22-08-2019 10:09 PM
बढ़िया विकास के लिए, बढ़िया निकास वाली, घनी और उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है इसके लिए मिट्टी का pH 6.5 या इससे ज्यादा होना चाहिए मिट्टी की pH 6.5 से कम होने पर फसल के विकास पर असर पड़ता है Konni Teak, West African teak, Godhavari Teak, South and Central American Teak, Nilambur or Malabar Teak.मिट्टी के भुरभुरा बनाने के लिए खेत की 2-3 बार जोताई करें मिट्टी को समतल करें ताकि खेत में पा.... (Read More)
बढ़िया विकास के लिए, बढ़िया निकास वाली, घनी और उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है इसके लिए मिट्टी का pH 6.5 या इससे ज्यादा होना चाहिए मिट्टी की pH 6.5 से कम होने पर फसल के विकास पर असर पड़ता है Konni Teak, West African teak, Godhavari Teak, South and Central American Teak, Nilambur or Malabar Teak.मिट्टी के भुरभुरा बनाने के लिए खेत की 2-3 बार जोताई करें मिट्टी को समतल करें ताकि खेत में पानी खड़ा ना हो सके नए पौधों की रोपाई के लिए 45x45x45 सैं.मी. के फासले पर गड्ढे खोदे प्रत्येक गड्ढे में गली हुई रूड़ी की खाद के साथ कीटनाशी डालें बीजों को नर्सरी बैड में बोया जाता है रोपाई के लिए 12-15 महीने के नए पौधों का प्रयोग करें टिशू प्रजनन ग्राफ्टिंग, जड़, तने काट कर और micro छोटे प्रजनन द्वारा किया जाता है रोपाई के लिए पूर्व अंकुरन पौधों का प्रयोग किया जाता है मॉनसून का मौसम सागवान की रोपाई के लिए सबसे अच्छा मौसम होता है रोपाई के लिए 2x2 या 2.5x2.5 या 3x3 मीटर के फासले रखा जाता है जब अंतर-फसली अपनाई हो, तो 4x4 मीटर या 5.x5 मीटर फासला रखें सागवान की रोपाई के लिए पूर्व अंकुरित पौधों का प्रयोग करें 45x45x45 सैं.मी. के गड्ढे बनाएं प्रत्येक गड्ढे में गली हुई रूड़ी की खाद और मिट्टी डालें बिजाई पंक्ति में, छींटे द्वारा या पनीरी लगाकर की जा सकती है एक एकड़ में रोपाई के लिए लगभग 1500-1800 clones का प्रयोग करें हर साल अगस्त और सितंबर महीने में 50 ग्राम प्रति पौधे में पहले तीन वर्ष डालें पहले तीन वर्षों में खेत को नदीन मुक्त करना आवश्यक है नियमित समय पर गोड़ाई करें पहले वर्ष में 3 और दूसरे वर्ष में 2 गोड़ाई करें रोपाई के तीसरे वर्ष में एक बार गोड़ाई करें मॉनसून के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती सिंचाई गर्म या गर्मियों के महीने में और आवश्यकता अनुसार करें आवश्यकता अनुसार सिंचाई करने के साथ काफी हद तक पैदावार में सुधार आता है अतिरिक्त सिंचाई से पानी के धब्बे और फंगस ज्यादा हो जाती है

Posted by nikku farmer
Rajasthan
22-08-2019 10:08 PM
Sahib G hara chaara sahi stage pe kat kar kutra karo usnu toe wich changi tran nappo
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