Posted by dinesh saini
Rajasthan
03-11-2019 07:37 PM
दिनेश जी ,इलायची के रोपण करते समय भूमि में जल संरक्षण करना बहुत आवश्यक है कम बारिश वाले भाग में और ढलान वाली भूमि में जल संरक्षण करना जरूरी है इसकी फसल में नीम की खली एक किलोग्राम मुर्गी की खाद , FARMYARD खाद , कम्पोस्ट खाद या वर्मी कम्पोस्ट खाद की २ किलोग्राम की मात्रा को जैविक खाद के रूप में प्रयोग करना चाहिए इस खा.... (Read More)
दिनेश जी ,इलायची के रोपण करते समय भूमि में जल संरक्षण करना बहुत आवश्यक है कम बारिश वाले भाग में और ढलान वाली भूमि में जल संरक्षण करना जरूरी है इसकी फसल में नीम की खली एक किलोग्राम मुर्गी की खाद , FARMYARD खाद , कम्पोस्ट खाद या वर्मी कम्पोस्ट खाद की २ किलोग्राम की मात्रा को जैविक खाद के रूप में प्रयोग करना चाहिए इस खाद का प्रयोग एक साल में एक बार किया जा सकता है यदि इस खाद को हम मई या जून के महीने में प्रयोग करते है तो बहुत फायदेमंद होता है इलायची की फसल में लगने वाले रोग की रोकथाम करने के लिए :-इलायची की फसल में मुख्य रूप से फंगल रोग और पेड़ों की झुरमुट सड़ांध है इस रोग से इलायची का पौधा बिलकुल बेकार हो जाता है जिससे हमे उन्नत किस्म की उपज नही मिलती इसकी रोकथाम करने के लिए हमे बीजों को ट्राईकोडरमा कीटनाशक दवा से उपचरित करके बोना चाहिए इसके आलावा इलायची की बुआई उचित समय पर करनी चाहिए इलायची का जो पौधा वायरस के प्रभाव में आ जाता है उसके वायरस को और ना बढ़ने दें रोगग्रस्त पौधे को उखाड़कर जलाकर नष्ट कर दें इलायची की खेती करने के लिए 10 डिग्री से 30 डिग्री का तापमान सबसे उत्तम माना जाता है तापमान के साथ – साथ इलायची की अधिक उपज लेने के लिए नमी युक्त स्थान और छायादार स्थान का होना बहुत जरूरी है धन्यवाद
Posted by ਮਨਜਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਧਾਲੀਵਾਲ
Punjab
03-11-2019 07:35 PM
ਤੁਸੀ ਉਸਦੀ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਡਾਕਟਰ ਤੋਂ ਜਾਂਚ ਕਰਵਾਓ ਜੀ ਕਿਉਕਿ ਉਸਦੀ ਜਾਂਚ ਕਰਕੇ ਹੀ ਉਸਦਾ ਸਹੀ ਇਲਾਜ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ..

Posted by Manoj Manoj
Madhya Pradesh
03-11-2019 07:24 PM
मनोज जी , इस फसल को मिट्टी की अलग अलग किस्मों, जिनमें पानी सोखने की क्षमता कम होती है और जिनकी पी एच 5.0 से 9.5 के बीच में होती है, में भी उगाया जा सकता है धान की पैदावार के लिए रेतली से लेकर गारी मिट्टी तक, और गारी से चिकनी मिट्टी जिसमें पानी को सोखने की क्षमता कम होती है इस फसल के लिए अच्छी मानी जाती है शुष्क खेतों को.... (Read More)
मनोज जी , इस फसल को मिट्टी की अलग अलग किस्मों, जिनमें पानी सोखने की क्षमता कम होती है और जिनकी पी एच 5.0 से 9.5 के बीच में होती है, में भी उगाया जा सकता है धान की पैदावार के लिए रेतली से लेकर गारी मिट्टी तक, और गारी से चिकनी मिट्टी जिसमें पानी को सोखने की क्षमता कम होती है इस फसल के लिए अच्छी मानी जाती है शुष्क खेतों को अच्छा बनाने, नदीन रहित और सेहतमंद वृद्धि के लिए ग्लाफोसेट डालनी चाहिए गेहूं की कटाई के बाद ज़मीन पर हरी खाद के तौर पर मई के पहले सप्ताह ढैंचा (बीज दर 20 किलोग्राम प्रति एकड़), या सन (बीज दर 20 किलोग्राम प्रति एकड़) या लोबीया (बीज दर 12 किलोग्राम प्रति एकड़) की बिजाई करनी चाहिए जब फसल 6 से 8 सप्ताह की हो जाए तो इसे खेत में कद्दू करने से एक दिन खेत में ही जोत देना चाहिए इस तरह प्रति एकड़ 25 किलो नाइट्रोजन खाद की बचत होती है भूमि को समतल करने के लिए लेज़र लेवलर का प्रयोग किया जाता है इसके बाद खेत में पानी खड़ा कर दें ताकि भूमि के अंदर ऊंचे नीचे स्थानों की पहचान हो सके इस तरह पानी के रसाव के कारण पानी की होने वाले बर्बादी को कम किया जा सके बिजाई का समय यू पी के सिंचित और निम्न बारानी क्षेत्रों में मध्य जून से शुरूआती जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है बीज की गहराई:-पौधे की गहराई 2-3 सैं.मी. होनी चाहिए फासला बनाकर लगाने से पौधे ज्यादा पैदावार देते हैं एक एकड़ खेत में 6-8 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें बिजाई से पहले 10 लीटर पानी में 20 ग्राम कार्बेनडाज़िम $ 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसाईक्लिन घोल लें और इस घोल में बीजो को 8-10 घंटे तक भिगोयें उसके बाद बीजों को छांव में सुखाएं और फिर बिजाई के लिए प्रयोग करें फसल को जड़ गलन रोग से बचाने के लिए नीचे दिए गए फंगसनाशी का प्रयोग किया जा सकता है पहले रासायनिक फंगीनाशी का प्रयोग करें फिर बीजों का टराईकोडरमा के साथ उपचार करें वैट बैड नर्सरी : यह तकनीक उन क्षेत्रों में अपनाई जाती है जहां पर पानी ज्यादा मात्रा में पाया जाता है नर्सरी का 1/10 हिस्सा दूसरे खेत में लगाया जाता है इसकी बिजाई छींटे द्वारा की जाती है यहां पर खेत की जोताई और खेत को समतल किया जाता है बैडों पर कईं दिन तक नमी बनाए रखनी चाहिए पानी से खेत को ज्यादा ना भरें जब नर्सरी 2 सैं.मी. से वृद्धि कर जाए तब पानी को खेत में लगाते रहना चाहिए बिजाई के 15 दिन बाद 26 किलो यूरिया डालना चाहिए जब नर्सरी 25-30 सैं.मी. तक लंबी हो जाए तब उसे 15-21 दिन बाद दूसरे खेत में लगा देना चाहिए और खेत को लगातार पानी लगाते रहना चाहिए सूखे बैड वाली नर्सरी : यह तकनीक शुष्क क्षेत्रों में अपनाई जाती है जो बैड बनाया जाता है वो बिजाई वाले खेत का 1/10 हिस्से में बीज बोया जाता है बैड का आकार सीमित होना चाहिए और उसकी ऊंचाई 6-10 से.मी होनी चाहिए धान का आधा जला हुआ छिलका बैड पर बिखेर देना चाहिए इससे जड़ें मजबूत होती हैं सही समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए और नमी बनाए रखना चाहिए ताकि नए पौधे नष्ट ना हों तत्वों की पूर्ति के लिए खाद डालना जरूरी है मॉडीफाईड मैट नर्सरी : यह नर्सरी लगाने का एक ऐसा तरीका है जिसमें कम जगह और कम बीजों की जरूरत होती है यह नर्सरी किसी भी जगह पर बनाई जा सकती हैं जहां पर समतल जगह हो और पानी की सुविधा हो इसकी पनीरी लगाने के लिए 1% खेत की जरूरत होती है 4 से.मी की सतह पर नए पौधे लगाए जाते हैं इसे बनाने के लिए 1 मीटर चौड़े और 20-30 मीटर लंबे जमीन के टुकड़े की जरूरत होती है इसके ऊपर बिछाने के लिए पॉलीथीन और केले के पत्तों की जरूरत होती है इसके इलावा एक लकड़ी का बकसा जो कि 4 से.मी गहरा होता हैं मिट्टी के मिश्रण से भरा होता है बीजों को इसके अंदर रख देना चाहिए और फिर बीजों को सूखी मिट्टी के साथ ढक देना चाहिए इसके बाद पानी का छिड़काव कर देना चाहिए लकड़ी के बक्से को नमी देते रहना चाहिए बिजाई से 11-14 दिनों के बाद पौध तैयार हो जाती है जब पौध तैयार हो जाती है तब मैट से पौध को दूसरे खेत में रोपण कर दिया जाता है फासला: पौधों का फासला 20x20 सैं.मी. या 25x25 सैं.मी. होना चाहिए पनीरी लगाने का ढंग 1. कद्दू करके लगाई जाने वाली पनीरी : आमतौर पर पंक्ति में लगाए जाने वाले पौधे 20x15 सैं.मी. दूरी पर लगाए जाते हैं और देरी से लगाई जाने वाली पनीरी 15x15 सैं.मी. पर लगाई जाती है नए पौधों की गहराई 2-3 सैं.मी. होनी चाहिए 2. बैड बनाकर लगाई जाने वाली पनीरी : यह बैड भारी ज़मीनों के लिए बनाए जाते हैं पनीरी लगाने से पहले खालियों में पानी लगाना चाहिए और फिर पनीरी को खेत में लगाना चाहिए पौधे से पौधे का फासला 9 सैं.मी. होना चाहिए 3. मशीनी ढंग से लगाई जाने वाली पनीरी : मैट पनीरी के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाता है यह मशीन 30x12 सैं.मी. के फासले पर पनीरी लगानी चाहिए सिंचित और कम बारानी वाले क्षेत्रों के लिए लगभग 41-50 किलो नाइट्रोजन (यूरिया 90-110 किलो), 30 किलो फासफोरस (एस एस पी 190 किलो) और 27 किलो पोटाश (म्यूरेट ऑफ पोटाश 45 किलो) प्रति एकड़ में डालें नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय डालें बाकी बची नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर, नाइट्रोजन का 1/4 हिस्सा शाखाएं निकलने के समय और 1/4 हिस्सा बालियां निकलने के समय डालें जल जमाव वाले क्षेत्रों में नाइट्रोजन 30-41 किलो (यूरिया 65-90 किलो) प्रति एकड़ में शुरूआती खुराक के तौर पर डालें कम बारानी क्षेत्रों के लिए नाइट्रोजन 23-32 किलो (यूरिया 52-70 किलो) और फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) प्रति एकड़ में प्रयोग करें नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा रोपाई से पहले और बाकी बची नाइट्रोजन बालियां निकलने के समय डालें ऊंचे क्षेत्रों के लिए नाइट्रोजन 23 किलो (यूरिया 52 किलो), फासफोरस 12 किलो (एस एस पी 75 किलो) और पोटाश 12 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 20 किलो) प्रति एकड़ में डालें नाइट्रोजन की आधी और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के तीन सप्ताह बाद डालें बाकी बची नाइट्रोजन को दो भागों में बांटे पहले भाग को बिजाई के 6 सप्ताह बाद और दूसरे भाग को बालियां निकलने के समय डालें रोपाई के 2 से 3 दिन बाद नदीनों के अंकुरण से पहले बूटाक्लोर 50 ई सी 1200 मि.ली. या थायोबेनकार्ब 50 ई सी 1200 मि.ली. या पैंडीमैथालीन 30 ई सी या प्रैटीलाक्लोर 50 ई सी 600 मि.ली. प्रति एकड़ में डालें इनमें से किसी एक नदीननाशक को 60 किलो रेत में मिलाकर 4-5 सैं.मी. गहरे खड़े पानी में बुरकाव करें चौड़े पत्ते वाले नदीनों की रोकथाम के लिए मेटसलफुरॉन 20 डब्लयु पी 30 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर नदीनों के अंकुरण के बाद रोपाई के 20-25 दिन बाद डालें स्प्रे से पहले खेत में खड़े पानी का निकास कर दें और स्प्रे के एक दिन बाद सिंचाई करें नदीनों के अंकुरण से पहले बूटाक्लोर 1 लीटर को बिजाई के 6 से 7 दिनों के बाद प्रति एकड़ में स्प्रे करें पनीरी लगाने के बाद खेत में दो सप्ताह तक अच्छी तरह पानी खड़ा रहने देना चाहिए जब सारा पानी सूख जाए तो उसके दो दिन बाद फिर से पानी को लगाना चाहिए खड़े पानी की गहराई 10 सै.मी. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए खेत में से बूटी और नदीनों को निकालने से पहले खेत में से सारा पानी निकाल देना चाहिए ओर इस प्रक्रिया के पूरे होने के बाद खेत की फिर से सिंचाई करनी चाहिए पकने से 15 दिन पहले सिंचाई करनी बंद करनी चाहिए ताकि फसल को आसानी से काटा जा सके ऊंची भूमि पर सिंचाई पूरी तरह से बारिश पर निर्भर करती है बारिश की तीव्रता और नियमितता के आधार पर और पानी की उपलब्धता के आधार पर गंभीर अवस्थाओं में सिंचाई करें जब दाने पूरी तरह पक जायें और फसल का रंग सुनहरी हो जाये तो खड़ी फसल की कटाई कर लेनी चाहिए ज्यादातर फसल की कटाई हाथों से द्राती से या कंबाइन से की जाती है काटी गई फसल के बंडल बनाके उनको छांटा जाता है दानों को बालियों से अलग कर लिया जाता है दानों को बालियों से अलग करने के बाद उसकी छंटाई की जाती है धान की कटाई करने के बाद पैदावार को काटने से लेकर प्रयोग तक नीचे लिखी प्रक्रिया अपनाई जाती है 1.कटाई 2. छंटाई 3. सफाई 4. सुखाना 5. गोदाम में रखना 6.पॉलिश करना और इसके बाद इसे बेचने के लिए भेजना दानों को स्टोर करने से पहले इन्हें कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए 10 किलोग्राम दानों के लिए 500 ग्राम नीम के पाउडर को मिलाना चाहिए स्टोर किए गए दानों को कीटों के हमले से बचाने के लिए 30 मि.ली. मैलाथियोन 50 ई.सी. को 3 लीटर पानी में घोल तैयार करके इसका छिड़काव करना चाहिए इस घोल का छिड़काव 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में हर 15 दिनों के बाद करना चाहिए, धन्यवाद

Posted by om prakash
Bihar
03-11-2019 07:23 PM
श्रीमान जी, यह मच्छर के हमले की वजह से हो रहा है, कृपया आप इसमें imidacloprid @ 1.5 ml प्रति लीटर पानी के हिसाब से स्प्रे करें, धन्यवाद

Posted by Manoj Manoj
Madhya Pradesh
03-11-2019 07:22 PM
मनोज जी , अच्छे जल निकास वाली गहरी, दोमट मिट्टी, जिसमें भूजल का स्तर ज़मीन से 1.5-2 मी. के नीचे हो और अच्छी जल धारण क्षमता वाली वाली ज़मीन गन्ने की खेती के लिए लाभदायक है यह फसल काफी अम्लीय और खारेपन को सहन कर सकती है इसलिए इसे मिट्टी जिसकी पी एच 5 से 8.5 हो, में उगाई जा सकती है यदि मिट्टी का पी एच 5 से कम हो तो इसमें चूना (क.... (Read More)
मनोज जी , अच्छे जल निकास वाली गहरी, दोमट मिट्टी, जिसमें भूजल का स्तर ज़मीन से 1.5-2 मी. के नीचे हो और अच्छी जल धारण क्षमता वाली वाली ज़मीन गन्ने की खेती के लिए लाभदायक है यह फसल काफी अम्लीय और खारेपन को सहन कर सकती है इसलिए इसे मिट्टी जिसकी पी एच 5 से 8.5 हो, में उगाई जा सकती है यदि मिट्टी का पी एच 5 से कम हो तो इसमें चूना (कली) डालें और यदि मिट्टी का पी एच 9.5 से ज्यादा हो तो इसमें जिप्सम डालें प्रसिद्ध किस्में:-Cos 1230: इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है CoH 2201: यह जल्दी पकने वाली किस्म है इसकी औसतन पैदावार 300 क्विंटल प्रति एकड़ होती है Cos 95255: यह जल्दी पकने वाली किस्म है इसकी औसतन पैदावार 295 क्विंटल प्रति एकड़ होती है CoS 94270: इसकी औसतन पैदावार 345 क्विंटल प्रति एकड़ होती है CoH 119: यह जल्दी पकने वाली किस्म है इसकी औसतन पैदावार 345 क्विंटल प्रति एकड़ होती है Co 9814: यह जल्दी पकने वाली किस्म है इसकी औसतन पैदावार 320 क्विंटल प्रति एकड़ होती है Co 1148: यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है इसका अंकुरण अच्छा होता है, शाखाएं बहुत ज्यादा निकलती हैं इसकी मोढ़ी फसल की क्षमता बहुत अच्छी होती है इससे मध्यम गुणवत्ता के गुड़ का उत्पादन होता है यह रतुआ रोग के प्रति अधिक संवेदनशील है इसकी औसतन पैदावार 375 क्विंटल प्रति एकड़ होती है खेत की दो बार जोताई करें पहली जोताई 20-25 सैं.मी. होनी चाहिए कंकड़ों को मशीनी ढंग से अच्छी तरह तोड़कर समतल कर दें खालियां और मेंड़ बनाकर सूखी बिजाई:- ट्रैक्टर वाली मेंड़ बनाने वाली मशीन की मदद से मेंड़ और खालियां बनाएं और इन मेड़ और खालियों में बिजाई करें मेड़ में 90 सैं.मी. का फासला होना चाहिए गन्ने की गुलियों को मिट्टी में दबाएं और हल्की सिंचाई करें पंक्तियों के जोड़े बनाकर बिजाई:- खेत में 150 सैं.मी. के फासले पर खालियां बनाएं और उनमें 30-60-90 सैं.मी. के फासले पर बिजाई करें इस तरीके से मेड़ वाली बिजाई से अधिक पैदावार मिलती है गड्ढा खोदकर बिजाई: - गड्ढे खोदने वाली मशीन से 60 सैं.मी. व्यास के 30 सैं.मी. गहरे गड्ढे खोदें जिनमें 60 सैं.मी. का फासला हो इससे गन्ना 2-3 बार उगाया जा सकता है और आम बिजाई से 20-25 प्रतिशत अधिक पैदावार आती है एक आंख वाले गन्नों की बिजाई :– सेहतमंद गुलियां चुनें और 75-90 सैं.मी. के अंतर पर खालियों में बिजाई करें गुलियां एक आंख वाली होनी चाहिए यदि गन्ने के ऊपरले भाग में छोटी डलियां चुनी गई हों तो बिजाई 6-9 सैं.मी. के अंतर पर करें फसल के अच्छे उगने के लिए आंखों को ऊपर की ओर रखें और हल्की सिंचाई करें फरवरी से मार्च गन्ने की रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त समय है अलग-अलग तजुर्बों से यह सिद्ध हुआ है कि 3 आंख वाली गुलियों का जमाव अधिक होता है जब कि एक आंख वाली गुली अच्छी नहीं जमती क्योंकि दोनों ओर काटने के कारण गुली में पानी की कमी हो जाती है और ज्यादा आंखों वाली गुलियां बीजने से भी अधिक जमाव नहीं मिलता दो आंख वाली गुलियां 35000 और तीन आंख वाली गुलियां 23000 प्रति एकड़ में प्रयोग करें दूसरे शब्दों में 35-40 क्विंटल बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें खादों की सही आवश्यकता जानने के लिए प्रत्येक तीन वर्ष के बाद मिट्टी की जांच जरूरी है बिजाई से पहले आखिरी जोताई के समय अच्छी तरह से गला हुआ गाय का गोबर 8 टन या वर्मीकंपोस्ट + रालीगोल्ड 8-10 किलो या पी एस बी 5-10 किलो प्रति एकड़ में डालें नाइट्रोजन 60-90 किलो (यूरिया 135-200 किलो) और फासफोरस 20 किलो (एस एस पी 125 किलो) प्रति एकड़ में डालें फासफोरस की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा बिजाई के समय डालें बाकी बची नाइट्रोजन को दूसरी और चौथी सिंचाई के समय डालें सर्दियों के मौसम में तापमान कम होने के कारण फसल तत्व ज्यादा लेती है जिस कारण मौधा पीला पड़ जाता है इसकी रोकथाम के लिए N:P:K 19:19:19 की स्प्रे 100 ग्राम 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के लिए प्रयोग करें जिन इलाकों में पानी की कमी है वहां यूरिया+पोटाश का प्रयोग 2.5 किलोग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर करें गन्ने में नदीनों के कारण 12-72 प्रतिशत पैदावार का नुकसान होता है शुरूआती 60-120 दिनों तक नदीनों की रोकथाम बहुत जरूरी है इसलिए रोपाई के बाद 3-4 महीने की फसल में नदीनों की रोकथाम करें नीचे लिखे तरीकों से नदीनों को रोका जा सकता है 1) हाथों से गोडाई करके : गन्ना एक व्यापक जगह लेने वाली फसल है इसलिए नदीनों को गोडाई करके रोका जा सकता है इसके इलावा प्रत्येक सिंचाई के बाद 3-4 गोडाई जरूरी है 2) काश्तकारी ढंग : इस प्रक्रिया में खेती के तरीके, अंतरफसली और मलचिंग तरीके शामिल हैं बहुफसली के कारण नदीनों का हमला ज्यादा होता है इसकी रोकथाम के लिए चारे वाली फसलें और हरी खाद वाली फसलों के आधार वाला फसली चक्र गन्ने में नदीनों की रोकथाम करता है गन्ना एक व्यापक जगह लेने वाली भी फसल है जिससे नदीनों के हमले का खतरा भी ज्यादा होता है यदि गन्ने को कम समय वाली फसलों के साथ अंतरफसली किया जाए तो इससे नदीनों को कम किया जा सकता है और ज्यादा लाभ भी मिल सकता है गन्ने के अंकुरन के बाद गन्ने की कतारों में 10-12 सैं.मी. मोटी तह बिछा दी जाती है यह सूर्य की रोशनी को सोखता है जिससे नदीन कम होते हैं यह मिट्टी में नमी को भी बचाता है रासायनिक तरीके : नदीनों को रोकने के लिए नदीनों के अंकुरण से पहले सिमाज़िन या एट्राज़िन 0.6-0.8 किलो या मैट्रीब्यूज़िन 0.4 किलो या ड्यूरॉन 1-1.2 किलो प्रति एकड़ में डालें इन नदीननाशकों को बिजाई के तुरंत बाद डालें 2,4-D 0.3-0.4 किलो नदीनों के अंकुरण के बाद गन्ने में चौड़े पत्ते वाले नदीनों को रोकने के लिए डालें धन्यवाद
Posted by Gagan Tyagi
Uttar Pradesh
03-11-2019 07:22 PM
गगन जी, गेहूं का बीज उपचार जैविक तरीक से आप waste decomposer या जीव अमृत का इस्तेमाल कर के कर सकते है, धन्यवाद

Posted by Om Pal
Haryana
03-11-2019 07:21 PM
मनदीप जी, zinc का छिड़काव तब ही करना चाहिए उसकी कमी पौधों पर दिखाई दे रही हो, zinc की कमी से पत्ते बिच मेसे पीले पड़ने लगते है, अगर आपको ऐसा कोई लक्षण दिखाई दे रहा है तो आप इसकी स्प्रे कर सकते है,धन्यवाद

Posted by Boota singh Sandhu
Uttarakhand
03-11-2019 07:18 PM
बूटा जी, खस एक कठोर प्रवर्ती है अत: इसकी खेती हेतु खेत की कोई विशेष तैयारी करने की आवश्यकता नहीं होती है परंतु यदि खेत में किसी प्रकार की झाड़ियाँ अथवा घास हो तो उसे साफ कर देना चाहिए तथा दो – तीन बार गहरी जुताई करके खेत को समतल कर देना चाहिए कम उर्वराशक्ति वाली जमीनों में आखरी जुताई से पूर्व खेत में 5 टन गोबर ख.... (Read More)
बूटा जी, खस एक कठोर प्रवर्ती है अत: इसकी खेती हेतु खेत की कोई विशेष तैयारी करने की आवश्यकता नहीं होती है परंतु यदि खेत में किसी प्रकार की झाड़ियाँ अथवा घास हो तो उसे साफ कर देना चाहिए तथा दो – तीन बार गहरी जुताई करके खेत को समतल कर देना चाहिए कम उर्वराशक्ति वाली जमीनों में आखरी जुताई से पूर्व खेत में 5 टन गोबर खाद मिला देनी चाहिए और प्रति एकड़ 16 - 16 किलोग्राम नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश डालनी चाहिए दूसरे वर्ष में प्रति एकड़ नाइट्रोजन की 16 किलोग्राम उपनिवेशन करनी चाहिए खस ki बुआई स्लिप्स से की जाती है स्लिप बनाने के लिए एक वर्ष पुराने पौधों कों उखाड़कर उनसे स्लीपर्स बनाया जाता है यदि सिंचाई की प्रयाप्त व्यवस्था हो तो खस की स्लिप्स को जमीन में 5 सेंमी. गहरा जाना चाहिए जिन क्षेत्रों की मिट्टी ज्यादा उपजाऊ है उनमें स्लिप्स का रोपण 60 X 60 सेंमी की दूरी पर करना चाहिए जबकि हल्की मिट्टी में इनका रोपण 30 X से 60 सेंमी. की दूरी में करना चाहिए इस हेक्टेयर में लगभग 25000 से 37500 स्लिप्स लगाईं जाती है धन्यवाद

Posted by harwinder
Punjab
03-11-2019 07:11 PM
ਸ੍ਰੀ ਮਾਨ ਜੀ ਕਿਸਮ HD-3086 ਦੀ ਬਿਜਾਈ ਅਕਤੂਬਰ ਦੇ ਚੌਥੇ ਹਫਤੇ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਨਵੰਬਰ ਮਹੀਨੇ ਦੇ ਚੌਥੇ ਹਫਤੇ ਤੱਕ ਬੀਜ ਸਕਦੇ ਹੋ

Posted by राहुल सिंह
Uttar Pradesh
03-11-2019 07:10 PM
Shri maan g wheat ki buwai last week of October to last week of November tk kr skte ho...

Posted by अभिषेक सिंह राजपूत
Madhya Pradesh
03-11-2019 07:02 PM
अभिषेक जी किसानो के साथ जानकारी सांझी करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Posted by gurpreet
Punjab
03-11-2019 06:57 PM
gurpreet ji isde uper tuc hoshi@400ml nu prati acre de hisab nal spray karo.dhanwad
Posted by md. Shekhar Patel
Madhya Pradesh
03-11-2019 06:49 PM
श्रीमान जी, चुकंदर के लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है मिट्टी की 9.5 पी एच की आवश्यकता होती है इस फसल को सामान्य मिट्टी में भी उगाया जा सकता है प्रसिद्ध किस्में :- Crimson Globe, Detrict Dark Red खेत में 3-4 बार हैरो से जोताई करें बीज के अच्छे उत्पादन के लिए, ज़मीन को अच्छे से तैयार करें और उसमें उपयुक्त नमी बनाये रखें बिजाई के लिए स.... (Read More)
श्रीमान जी, चुकंदर के लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है मिट्टी की 9.5 पी एच की आवश्यकता होती है इस फसल को सामान्य मिट्टी में भी उगाया जा सकता है प्रसिद्ध किस्में :- Crimson Globe, Detrict Dark Red खेत में 3-4 बार हैरो से जोताई करें बीज के अच्छे उत्पादन के लिए, ज़मीन को अच्छे से तैयार करें और उसमें उपयुक्त नमी बनाये रखें बिजाई के लिए सितंबर के आखिरी सप्ताह से मध्य अक्तूबर का समय उपयुक्त होता है बिजाई के लिए कतारों में 45-50 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें बीजों को 3 सैं.मी. की गहराई में बोयें 1.5-2.5 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 50 डब्लयू पी या थीरम 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें खेत की तैयारी के समय 5 टन गाय का गोबर प्रयोग करें खादों की मात्रा नाइट्रोजन 12 किलो (यूरिया 25 किलो), फासफोरस 5 किलो (एस एस पी 12 किलो) और पोटाशियम 20 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 30 किलो) प्रति एकड़ में प्रयोग करें फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बिजाई से पहले आखिरी जोताई के समय मिट्टी में मिलायें इसी समय बोरैक्स पाउडर 2 किलो प्रति एकड़ में मिलायें बिजाई के दो महीने बाद नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा डालें चुकंदर को 8 सिंचाइयों द्वारा 80-100 सैं.मी. की आवश्यकता होती है पहली सिंचाई बिजाई के 25 दिन बाद और अगली 4 सिंचाइयां 25 दिनों के अंतराल पर करें और बाकी की सिंचाइयां 20 दिनों के अंतराल पर करें अंकुरण के 25-30 दिनों के बाद कमज़ोर नए पौधों की गोडाई करें पौधे से पौधे में 15-20 सैं.मी. का फासला जरूर होना चाहिए दूसरी गोडाई पहली गोडाई के 15-20 दिनों के बाद करें खरपतवार नियंत्रण के लिए 2-3 गोडाइयों की आवश्यकता होती है इस फसल की तुड़ाई अंत मार्च से मई महीने में की जाती है जब पत्तों की निचली सतह पीले रंग की हो जाये तब तुड़ाई की जाती है कटाई के 1-3 दिन पहले हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है यह चुकंदर की औसतन पैदावार 30- 40 क्विंटल प्रति एकड़ और हरे चारे की पैदावार 5-10 क्विंटल प्रति एकड़ देती है धन्यवाद
Posted by Rahul Dedha
Uttar Pradesh
03-11-2019 06:48 PM
राहुल जी ये आपने एक बार में देना है इस तरह आप पांच दिन तक दे सकते हैं
Posted by hanumanparsad
Rajasthan
03-11-2019 06:45 PM
हनुमान जी , अगेती किस्मों के लिए जून-जुलाई रोपाई के लिए सबसे अच्छा समय है और पिछेती किस्मों के लिए अगस्त से मध्य सितंबर और अक्तूबर से नवंबर का पहला सप्ताह रोपाई के लिए अच्छा समय है धन्यवाद

Posted by monty. rana
Uttar Pradesh
03-11-2019 06:40 PM
श्रीमान जी अब आप गेहूं, जौ , सब्ज़ियों में गाजर, मूली, फूलगोभी, मिर्च, शल्गम और प्याज, लसहुन आदि की बिजाई कर सकते है

Posted by GURMEET SINGH
Punjab
03-11-2019 06:31 PM
Gumeet ji,. kirpa kar k tuc keede di photo bejo, tajo tunu dekh ke usde bare puri jankari diti ja sake, dhanwad
Posted by Rahul Dedha
Uttar Pradesh
03-11-2019 06:18 PM
राहुल जी ये कभी कभी पशु को कैल्शियम की कमी के कारण हो जाता है उसका Metabolism सिस्टम धीरे होने के कारण भी हो सकता है
Posted by harminder
Punjab
03-11-2019 06:16 PM
ਹਰਮਿੰਦਰ ਜੀ ਬਾਸਮਤੀ ਦਾ ਰੇਟ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਤਹਿ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਹ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਹੀ ਵਧਾਇਆ ਜਾ ਘਟਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਇਸ ਬਾਰੇ ਹਾਲੇ ਕੁਛ ਨਹੀਂ ਕਿਹਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਧੰਨਵਾਦ

Posted by विनीत यादव
Uttar Pradesh
03-11-2019 06:05 PM
विनीत जी, आलू की खेती के लिए तापमान 14-25* C होना चाहिए यह फसल बहुत तरह की मिट्टी जैसे कि रेतली, नमक वाली, दोमट और चिकनी मिट्टी में उगाई जा सकती है अच्छे जल निकास वाली, जैविक तत्व भरपूर, रेतली से दरमियानी ज़मीन में फसल अच्छी पैदावार देती है यह फसल नमक वाली तेजाबी ज़मीनों में भी उगाई जा सकती है पर बहुत ज्यादा जल जमाव और .... (Read More)
विनीत जी, आलू की खेती के लिए तापमान 14-25* C होना चाहिए यह फसल बहुत तरह की मिट्टी जैसे कि रेतली, नमक वाली, दोमट और चिकनी मिट्टी में उगाई जा सकती है अच्छे जल निकास वाली, जैविक तत्व भरपूर, रेतली से दरमियानी ज़मीन में फसल अच्छी पैदावार देती है यह फसल नमक वाली तेजाबी ज़मीनों में भी उगाई जा सकती है पर बहुत ज्यादा जल जमाव और खारी या नमक वाली ज़मीन इस फसल की खेती के लिए उचित नहीं होती इसकी किस्मे जैसे के Kufri Bahar, Kufri Badshah, Kufri Sutlaj, Kufri Anand, Kufri Pukhraj, Kufri Chipsona 2, Kufri Chipsona 1, Kufri Chandramukhi, Kufri Jyoti, Kufri Ashoka, Kufri Lalima की बुवाई कर सकते है खेत को एक बार 30 सैं.मी. गहरा जोतकर अच्छे ढंग से बैड बनाएं जोताई के बाद 2-3 बार तवियां फेरें और फिर 2-3 बार सुहागा फेरें बिजाई से पहले खेत में नमी की मात्रा बनाकर रखें बिजाई के लिए दो ढंग मुख्य तौर पर प्रयोग किए जाते हैं 1. मेंड़ और खालियों वाला ढंग 2. समतल बैडों वाला ढंग अगेती बिजाई के लिए, सितंबर के आखिरी सप्ताह से अक्तूबर का पहला सप्ताह खेती के लिए उपयुक्त होता है मुख्य फसल के लिए अक्तूबर का दूसरे से चौथा सप्ताह बिजाई के लिए उपयुक्त समय होता है गांठों के आकार के अनुसार रोपाई का फासला विभिन्न होता है बिजाई के लिए कतार से कतार में 60 सैं.मी. और पौधे से पौधे में 20 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें बीज बोने के बाद बीजों को 8-10 सैं.मी. तक मिट्टी की परत से ढक दें बिजाई के लिए ट्रैक्टर से चलने वाली सेमी ऑटोमेटिक या ऑटोमैटिक प्लांटर का प्रयोग करें रोपाई के लिए बड़ी आकार की गांठों का प्रयोग किया जाता है बिजाई के लिए 13-15 क्विंटल बीज प्रयोग किए जाते हैं बिजाई के लिए सेहतमंद आलू ही चुने बिजाई से पहले आलुओं को कोल्ड स्टोर से निकालकर 1-2 सप्ताह के लिए छांव वाले स्थान पर रखें ताकि वे अंकुरित हो जायें आलुओं के सही अंकुरन के लिए उन्हें जिबरैलिक एसिड 1 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर एक घंटे के लिए उपचार करें फिर छांव में सुखाएं और 10 दिनों के लिए हवादार कमरे में रखें फिर काटकर आलुओं को मैनकोजेब 0.5 प्रतिशत घोल (5 ग्राम प्रति लीटर पानी) में 10 मिनट के लिए भिगो दें इससे आलुओं को शुरूआती समय में गलने से बचाया जा सकता है आलुओं को गलने और जड़ों में कालापन रोग से बचाने के लिए साबुत और काटे हुए आलुओं को 6 प्रतिशत मरकरी के घोल (टैफासन) 0.25 प्रतिशत (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) में डालें यदि संभव हो, तो आलू की रोपाई से पहले, हरी खाद वाली फसलें जैसे सनई, जंतर आदि फसलें उगायें और उन्हें मिट्टी में अच्छी तरह दबायें यदि हरी खाद उपलब्ध ना हो तो गली सड़ी रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर 60-80 क्विंटल प्रति एकड़ में खेत की तैयारी के समय रोपाई से दो सप्ताह पहले डालें फसल की उचित वृद्धि के लिए नाइट्रोजन 40-50 किलो (90-110 किलो यूरिया), फासफोरस 24-32 किलो (150-200 किलो सिंगल सुपर फासफेट) और पोटाश 40-50 किलो (66-85 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश) की मात्रा प्रति एकड़ में डालें बिजाई से पहले सिंचाई करें बिजाई के बाद 10-12 दिनों के अंदर अंदर पहली सिंचाई करें दूसरी सिंचाई पहली सिंचाई के 7 दिनों के बाद करें बाकी की सिंचाइयां जलवायु की परिस्थितियों और जरूरत के अनुसार करें गांठे बनने की अवस्था सिंचाई के लिए बहुत महत्तवपूर्ण होती है इस अवस्था में पानी की कमी ना होने दें ज्यादा सिंचाई ना करें इससे गलने की बीमारी का खतरा बढ़ता है पुटाई से 10-12 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें धन्यवाद
Posted by Rajat kumar
Punjab
03-11-2019 06:00 PM
ਸ੍ਰੀ ਮਾਨ ਜੀ ਕਿਸਮ ਸੁਪਰ 272 ਅਤੇ 252 ਦੀ ਬਿਜਾਈ ਅਕਤੂਬਰ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਨਵੰਬਰ ਮਹੀਨੇ ਦੇ ਚੌਥੇ ਹਫਤੇ ਤੱਕ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ

Posted by prashant sinha
Chattisgarh
03-11-2019 05:57 PM
प्रशांत जी स्टीविया को हनी प्लांट के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह स्वाद में मीठा होता है यह एक प्राकृतिक स्वीटनर होता है जो कि शूगर के मरीजों को उनके शरीर में इंसुलन की मात्रा को संतुलित रखता है यह मिट्टी की व्यापक किस्मों में उगाया जा सकता है इसे रेतली दोमट से दोमट मिट्टी जिसमें जैविक तत्वों की उच्च मात.... (Read More)
प्रशांत जी स्टीविया को हनी प्लांट के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह स्वाद में मीठा होता है यह एक प्राकृतिक स्वीटनर होता है जो कि शूगर के मरीजों को उनके शरीर में इंसुलन की मात्रा को संतुलित रखता है यह मिट्टी की व्यापक किस्मों में उगाया जा सकता है इसे रेतली दोमट से दोमट मिट्टी जिसमें जैविक तत्वों की उच्च मात्रा हो और अच्छे जल निकास वाली हो, में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है खारी मिट्टी में खेती करने से परहेज करें क्योंकि यह स्टीविया के लिए हानिकारक होती है पौधे के विकास के लिए मिट्टी का pH 6-8 होना चाहिए MDS -14 और MDS-13स्टीविया की किस्में हैं स्टीविया की खेती के लिए, अच्छी तरह से तैयार खेत की आवश्यकता होती है मिट्टी के भुरभुरा होने तक, खेत की 2-3 बार जोताई करें जोताई के समय मिट्टी में ट्राइकोडरमा अच्छे से मिलायें और आखिरी जोताई के समय रूड़ी की खाद मिट्टी में अच्छे से मिलायें स्टीविया की रोपाई तैयार बैडों पर की जाती है इसकी बिजाई के लिए फरवरी से मार्च का समय उचित होता है नए पौधों में 18 इंच का फासला और पंक्ति के बीच का फासला 20-24 इंच रखें स्टीविया के बीजों को 6-8 सप्ताह तक कंटेनरों के भीतर बोया जाता है बिजाई के बाद बैडों को मिट्टी से ढक दें मिट्टी में नमी रखने के लिए पानी देते रहें झाड़ियों के बढ़िया विकास के लिए रोपाई से पहले पौधे के शिखर को काट दें
पौधों की रोपाई 60 सैं.मी. चौड़े और 15 सैं.मी. ऊंचाई वाले तैयार बैडों पर की जाती है पौधे 6-8 सप्ताह में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं रोपाई से 24 घंटे पहले पौधों को पानी देना चाहिए ताकि उन्हें आसानी से बैडों में से निकाला जा सके खेत की तैयारी के समय, रूड़ी की खाद 200 क्विंटल, गाय का गोबर या मूत्र और गंडोया खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें नाइट्रोजन 11 किलो (यूरिया 24 किलो), फासफोरस 45 किलो (सिंगल सुपर फासफेट 282 किलो), पोटाश 45 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 75 किलो) प्रति एकड़ में डालें सिंगल सुपर फासफेट की पूरी मात्रा शुरूआती खुराक के तौर पर डालें नाइट्रोजन और पोटाश की मात्रा प्रति महीना 10 खुराकें दी जाती है
अधिक सूखे पत्तों कीपैदावार के लिए बोरोन और मैगनीज़ की स्प्रे करें खेत में से नदीनों को निकालने के लिए मुख्यत: हाथों से गोडाई करें रोपाई के एक महीना बाद पहली गोडाई की जाती है और फिर हर दो सप्ताह में लगातार गोडाई की जाती है नदीनों को बाहर निकालने के लिए गोडाई करें क्योंकि फसल तैयार किये बैडों पर विकास करते है और यह मजदूरों के लिए भी आसान होता है सिंचाई मुख्य रूप से फुव्वारा और ड्रिप सिंचाई द्वारा की जाती है पौधे को ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती इसलिए नियमित अंतराल पर हल्की सिंचाई करें गर्मियों में, 8 दिनों के फासले पर सिंचाई करें खेत में पानी ना खड़ा होने दें यह फसल के लिए नुकसानदायक है बिजाई के बाद 3 महीने में पौधा पैदावार देना शुरू कर देता है कटाई 90 दिनों के फासले पर लगातार की जाती है इस बात का ध्यान रखें कि कटाई करते समय 5-8 सैं.मी. तने को दोबारा पनपने के लिए जमीनी स्तर पर छोड़ देना चाहिए एक वर्ष में लगभग चार बार कटाई की जाती है दोबारा प्रक्रिया के लिए, पत्तों का प्रयोग किया जाता है धन्यवाद
Posted by vimal sachan
Uttar Pradesh
03-11-2019 05:37 PM
Vimal ji, kripya ap apna sawal vishthar se puche taki apko iski puri jankari di ja sake, dhanywad
Posted by Rahul Dedha
Uttar Pradesh
03-11-2019 05:05 PM
राहुल जी यदि आपके जानवरों को ब्याने के बाद समय पर ज़ेर नहीं पड़ती तो आप ब्याने से पहले 1 महीना पहले Dcad minus पाउडर 50—50 सुबह शाम, Vitum-H liquid 10-10ml सुबह शाम देना शुरू करें इससे लेव, दूध अच्छी तरह तैयार हो जाएगा

Posted by Tauseef
Uttar Pradesh
03-11-2019 05:03 PM
Tauseef ji , kripya ap bataye ke ap kis podhe ke growth ki baat kar rahe hain, taki apko uski puri jankari di ja sake, dhanywad

Posted by prashant
Uttar Pradesh
03-11-2019 05:01 PM
श्रीमान जी अब आप गाजर, मूली, शल्गम, मिर्च, मटर, गोभी लगा सकते है

Posted by Nissan singh
Punjab
03-11-2019 05:00 PM
jii.

Posted by Anil malik
Uttar Pradesh
03-11-2019 04:57 PM
Anil ji, please ask your question in detail so that we can provide you full information regarding that , thank you

Posted by Sukhjinder Singh
Punjab
03-11-2019 04:47 PM
Sukhjinder ji, Kirpa kar ke das ke tuc kis butte de kehre keede di roktham janna chohnde ho, tajo tuhnu sudi puri jankari diti ja sake, dhanwad

Posted by imran khan
Uttar Pradesh
03-11-2019 04:36 PM
Imran ji, gehun ke beej lene ke liye ap Dr Dalip Gosain 9215757800 ji ke sath samparak karein, dhanywad

Posted by Ramesh kumawat
Madhya Pradesh
03-11-2019 04:36 PM
रमेश जी, इसे किसी भी तरह की हल्की से भारी ज़मीनों में उगाया जा सकता है गहरी मैरा, अच्छी जल निकास वाली, पानी को बांध कर रखने वाली और अच्छी जैविक खनिजों वाली ज़मीन सब से अच्छी रहती है नर्म और रेतली ज़मीनें इसके लिए अच्छी नहीं होती क्योंकि इसमें बनी गांठे जल्दी खराब हो जाती हैं ज़मीन की तैयारी के लिए मिट्टी के भुरभुर.... (Read More)
रमेश जी, इसे किसी भी तरह की हल्की से भारी ज़मीनों में उगाया जा सकता है गहरी मैरा, अच्छी जल निकास वाली, पानी को बांध कर रखने वाली और अच्छी जैविक खनिजों वाली ज़मीन सब से अच्छी रहती है नर्म और रेतली ज़मीनें इसके लिए अच्छी नहीं होती क्योंकि इसमें बनी गांठे जल्दी खराब हो जाती हैं ज़मीन की तैयारी के लिए मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत को 3-4 बार जोताई करें और मिट्टी में जैविक खनिजों को बढ़ाने के लिए रूड़ी की खाद डालें खेत को समतल करके क्यारियों और खालियों में बांट दें बिजाई के लिए सही समय सितंबर के आखिरी सप्ताह से अक्तूबर का पहला सप्ताह माना जाता है पौधे से पौधे का फासला 7.5 सैं.मी. और कतारों में फासला 15 सैं.मी. रखें लहसुन की गांठों को 3-5 सैं.मी. गहरा और उसका उगने वाला हिस्सा ऊपर की तरफ रखें इसकी बिजाई के लिए केरा ढंग का प्रयोग करें बिजाई हाथों से या मशीन से की जा सकती है लहसुन की गांठों को मिट्टी से ढककर हल्की सिंचाई करें बीज की मात्रा 225-250 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें बिजाई से 10 दिन पहले खेत में 2 टन रूड़ी की खाद डालें 50 किलो नाइट्रोजन (110 किलो यूरिया) और 25 किलो फासफोरस (155 किलो एस एस पी) प्रति एकड़ डालें सारी एस एस पी बिजाई से पहले और नाइट्रोजन तीन हिस्सों में बिजाई के 30, 45 और 60 दिन बाद डालें शुरू में लहसुन का पौधा धीरे धीरे बढ़ता है इसलिए नदीन नाशकों का प्रयोग गोडाई से बढ़िया रहता है नदीनों को रोकने के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति 200 लीटर पानी प्रति एकड़ में डालकर बिजाई से 72 घंटो में स्प्रे करें इसके बिना नदीन नाशक ऑक्सीफ्लोरफेन 425 मि.ली. प्रति 200 लीटर पानी में डालकर स्प्रे बिजाई के 7 दिन बाद करें नदीनों की रोकथाम के लिए 2 गोडाई की जरूरत है पहली गोडाई बिजाई से 1 महीने बाद और दूसरी गोडाई बिजाई के 2 महीने बाद करें वातावरण और मिट्टी की किस्म के आधार पर सिंचाई करें बिजाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें और आवश्यकता के आधार पर 10-15 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें कटाई करने और सूखाने के बाद गांठों को आकार के अनुसार छांटे, धन्यवाद

Posted by महेंद्र मेघवाल
Rajasthan
03-11-2019 04:35 PM
महेंद्र जी, जीरा भारत का महत्तवपूर्ण मसाला है अच्छे निकास वाली और उच्च कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है जीरे की खेती के लिए उस ज़मीन का चयन करें जहां 3-4 वर्ष जीरे की खेती ना की गई हो प्रसिद्ध किस्में:-RZ 19,RZ 209,Gujarat Jeera 2,RZ 223,GC 4 जीरे की खेती के लिए अच्छी तरह से जोती गई और समतल ज़मीन की आवश्यक.... (Read More)
महेंद्र जी, जीरा भारत का महत्तवपूर्ण मसाला है अच्छे निकास वाली और उच्च कार्बनिक पदार्थों वाली मिट्टी जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है जीरे की खेती के लिए उस ज़मीन का चयन करें जहां 3-4 वर्ष जीरे की खेती ना की गई हो प्रसिद्ध किस्में:-RZ 19,RZ 209,Gujarat Jeera 2,RZ 223,GC 4 जीरे की खेती के लिए अच्छी तरह से जोती गई और समतल ज़मीन की आवश्यकता होती है मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की जोताई करें और मिट्टी को समतल करने के लिए सुहागा फेरें जीरे की बिजाई के लिए 15 से 30 नवंबर सही समय होता है कतारों में बिजाई के लिए दो पंक्तियों में 30 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें बीजों को 10 सैं.मी. की गहराई में बोयें बिजाई के लिए बुरकाव ढंग या कतार में बिजाई ढंग का प्रयोग करें एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 4-6 किलो बीज पर्याप्त होते हैं बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें यह बीजों का फंगस संक्रमक से बचाव करेगा खादों की सही मात्रा के लिए और अतिरिक्त प्रयोग ना करने के लिए मिट्टी की जांच सबसे महत्तवपूर्ण कदम है फसल की अच्छी वृद्धि और अच्छी उपज के लिए नाइट्रोजन 15 किलो (यूरिया 32 किलो) फासफोरस 11 किलो (एस एस पी 66 किलो) और पोटाश 7 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 12 किलो) को गाय के गले हुए गोबर 2 टन के साथ प्रति एकड़ में डालें नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें बाकी बची नाइट्रोजन की आधी मात्रा बिजाई के 35 दिनों के बाद डालें बिजाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें दूसरी सिंचाई बिजाई के 10 दिनों के बाद अंकुरण के समय करें उसके बाद तीन सिंचाइयां पर्याप्त होती हैं बाकी की सिंचाइयां बिजाई के 35वें, 60वें और 85वें दिन बाद करें एक बार फसल पक जाये तब सिंचाई ना करें बीज भरने की अवस्था में सिंचाई पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग, चेपे और झुलस रोग के हमले को बढ़ाती है जीरे की फसल में नदीन गंभीर समस्या होते हैं नदीनों की जांच के लिए लगातार गोडाई और निराई करें पहली गोडाई बिजाई के 30-35 दिनों के बाद करें जब जीरे की फसल 5 सैं.मी. कद की हो जाये दूसरी गोडाई पहली गोडाई के 20-25 दिन बाद करें और खेत को नदीन रहित रखें रासायनिक रोकथाम के लिए बिजाई के 1-2 दिन बाद पैंडीमैथालीन 1 लीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें जीरे की फसल 100-115 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है कटाई दरांती की सहायता से की जाती है फसल की कटाई के बाद पौधों को फर्श पर खिलार दें और धूप में सुखाने के लिए छोड़ दें धूप में अच्छे से सुखाने के बाद पौधों से दाने अलग कर लें, धन्यवाद

Posted by मनोहर सिंह इन्दा
Rajasthan
03-11-2019 04:35 PM
मनोहर जी, गाजर की जड़ों के अच्छे विकास के लिए गहरी, नर्म और चिकनी मिट्टी की जरूरत होती है बहुत ज्यादा भारी और ज्यादा नर्म मिट्टी गाजरों की फसल के लिए अच्छी नहीं मानी जाती अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी की पी एच 5.5 से 7 होनी चाहिए (अच्छी पैदावार के लिए 6.5 पी एच लाभदायक होती है) Early Nantes: इस किस्म की जड़ें बेलनाकार और छोटी नो.... (Read More)
मनोहर जी, गाजर की जड़ों के अच्छे विकास के लिए गहरी, नर्म और चिकनी मिट्टी की जरूरत होती है बहुत ज्यादा भारी और ज्यादा नर्म मिट्टी गाजरों की फसल के लिए अच्छी नहीं मानी जाती अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी की पी एच 5.5 से 7 होनी चाहिए (अच्छी पैदावार के लिए 6.5 पी एच लाभदायक होती है) Early Nantes: इस किस्म की जड़ें बेलनाकार और छोटी नोक वाली होती है इसका गुद्दा संतरी रंग का होता है और यह किस्म 110 दिनों में तैयार हो जाती है इसकी औसतन पैदावार 62.5-80 क्विंटल प्रति एकड़ होती है Chantenay: इस किस्म के फल का निचला भाग नुकीला और ऊपर वाला भाग चौड़ा होता है यह किस्म संतरी रंग की होती है यह 110-130 दिनों में पुटाई के लिए तैयार हो जाती है इसकी औसतन पैदावार 84-94 क्विंटल प्रति एकड़ होती है Pusa Yamdagni: इसकी जड़ें लम्बी और कम तीखी, नोक दरमियानी, संतरी रंग का गुद्दा होता है, और यह किस्म 80-120 दिनों में तैयार हो जाती है इसकी औसतन पैदावार 80-105 क्विंटल प्रति एकड़ होती है यूरोपियन किस्में:- European Carrot: इस किस्म की जड़ें आकर्षक बेलनाकार, दरमियानी लम्बी (18-20 सैं.मी.), नर्म और संतरी रंग की, सामन्य नोक वाली होती हैं यह किस्म केराटिन का उच्च स्त्रोत है यह किस्म 100-110 दिनों में तैयार हो जाती हैं इसकी औसतन पैदावार 94-115 क्विंटल प्रति एकड़ होती है खेत को अच्छी तरह जोत कर नदीनों से मुक्त कर लेना चाहिए और कंकड़ों को अच्छी तरह तोड़कर समतल कर लें खेत की जोताई समय 10 टन रूड़ी की खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें ताजे गोबर और कम गली खाद को डालने से परहेज़ करें क्योंकि इससे जड़ें नर्म हो जाती हैं मैदानी क्षेत्रों में, अगस्त से शुरूआती अक्तूबर का समय बिजाई के लिए उपयुक्त होता है पहाड़ी क्षेत्रों में, मार्च-जुलाई में बिजाई पूरी कर लें कतार से कतार में 30 से 45 सैं.मी. और पौधे से पौधे में 8-10 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें विरलन के बाद पौधे से पौधे में 4-5 सैं.मी. का फासला रखें बीज की गहराई अच्छी वृद्धि के लिए बीज को 1.5 सैं.मी. की गहराई पर बोयें बिजाई के लिए गड्ढा खोदकर विधि का प्रयोग किया जाता है और बुरकाव ढंग का भी प्रयोग किया जाता है एक एकड़ में बिजाई के लिए 4-5 किलो बीज पर्याप्त होते हैं बिजाई से पहले बीज को 12-24 घंटे पानी में भिगो दें इससे बीज के अंकुरन में वृद्धि होती है गाजर की फसल को 20-30 टन गली हुई रूड़ी की खाद के साथ नाइट्रोजन 20 किलो (45 किलो यूरिया), फासफोरस 16 किलो (100 किलो सिंगल सुपर फासफेट) और पोटाश 18 किलो (30 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश) की मात्रा की प्रति एकड़ में आवश्यकता होती है गाय का गोबर, फासफोरस, पोटाश और नाइट्रोजन की आधी मात्रा खेती की तैयारी के समय डालें बाकी बची आधी मात्रा को बिजाई के बाद 45 से 50 दिनों के बाद डालें नदीन की रोकथाम के लिए, निराई और गोडाई करते रहें और मिट्टी को हवादार बनाएं शुरूआती अवस्था में नदीनों का नियंत्रण आवश्यक है बिजाई के बाद, पैंडीमैथालीन 1 लीटर की प्रति एकड़ में स्प्रे करें नदीनाशक के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद होनी चाहिए बिजाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें यह अंकुरन में सहायता करती है उसके बाद मिट्टी की किस्म और जलवायु के आधार पर बाकी सिंचाइयां गर्मियों में 6-7 दिनों के फासले पर करें और सर्दियों के महीने में 10-12 दिनों के अंतराल पर करें आमतौर पर गाजर को तीन से चार सिंचाइयां की जरूरत होती है ज्यादा सिंचाई से परहेज़ करें क्योंकि इससे जड़ों के गलने का डर रहता है कटाई से दो या तीन हफ्ते पहले सिंचाई रोक दें इससे गाजर की मिठास और स्वाद बढ़ जाता है, धन्यवाद

Posted by Satpal Solanki
Rajasthan
03-11-2019 04:32 PM
सतपाल जी, रेतली मिटटी में आप वोही फसलों को उगाय जो के रेतली जमीन में सफतलापूर्वक उग सकें जैसे के आप गेहूं की किस्मे जैसे के C 306, PBW 299 की बिजाई कर सकते है, यह रेलटी जमीन में उगने की क्षमता रखती है, सब्जियां जैसे के खीरा, ककड़ी, बैंगन, मिर्च, गाजर , चकुंदर, आलू की बुवाई करें और फल जैसे के खजूर, अनार, अमरुद, ड्रैगन फल, तरबू.... (Read More)
सतपाल जी, रेतली मिटटी में आप वोही फसलों को उगाय जो के रेतली जमीन में सफतलापूर्वक उग सकें जैसे के आप गेहूं की किस्मे जैसे के C 306, PBW 299 की बिजाई कर सकते है, यह रेलटी जमीन में उगने की क्षमता रखती है, सब्जियां जैसे के खीरा, ककड़ी, बैंगन, मिर्च, गाजर , चकुंदर, आलू की बुवाई करें और फल जैसे के खजूर, अनार, अमरुद, ड्रैगन फल, तरबूज, बेर की बुवाई की जा सकती है और फूल जैसे के ग्लैडलियस की बुवाई करें, धन्यवाद

Posted by Ramesh kumawat
Madhya Pradesh
03-11-2019 04:29 PM
रमेश जी , इसे किसी भी तरह की हल्की से भारी ज़मीनों में उगाया जा सकता है गहरी मैरा, अच्छी जल निकास वाली, पानी को बांध कर रखने वाली और अच्छी जैविक खनिजों वाली ज़मीन सब से अच्छी रहती है नर्म और रेतली ज़मीनें इसके लिए अच्छी नहीं होती क्योंकि इसमें बनी गांठे जल्दी खराब हो जाती हैं ज़मीन की तैयारी के लिए मिट्टी के भुरभुर.... (Read More)
रमेश जी , इसे किसी भी तरह की हल्की से भारी ज़मीनों में उगाया जा सकता है गहरी मैरा, अच्छी जल निकास वाली, पानी को बांध कर रखने वाली और अच्छी जैविक खनिजों वाली ज़मीन सब से अच्छी रहती है नर्म और रेतली ज़मीनें इसके लिए अच्छी नहीं होती क्योंकि इसमें बनी गांठे जल्दी खराब हो जाती हैं ज़मीन की तैयारी के लिए मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत को 3-4 बार जोताई करें और मिट्टी में जैविक खनिजों को बढ़ाने के लिए रूड़ी की खाद डालें खेत को समतल करके क्यारियों और खालियों में बांट दें बिजाई के लिए सही समय सितंबर के आखिरी सप्ताह से अक्तूबर का पहला सप्ताह माना जाता है पौधे से पौधे का फासला 7.5 सैं.मी. और कतारों में फासला 15 सैं.मी. रखें लहसुन की गांठों को 3-5 सैं.मी. गहरा और उसका उगने वाला हिस्सा ऊपर की तरफ रखें इसकी बिजाई के लिए केरा ढंग का प्रयोग करें बिजाई हाथों से या मशीन से की जा सकती है लहसुन की गांठों को मिट्टी से ढककर हल्की सिंचाई करें बीज की मात्रा 225-250 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें बिजाई से 10 दिन पहले खेत में 2 टन रूड़ी की खाद डालें 50 किलो नाइट्रोजन (110 किलो यूरिया) और 25 किलो फासफोरस (155 किलो एस एस पी) प्रति एकड़ डालें सारी एस एस पी बिजाई से पहले और नाइट्रोजन तीन हिस्सों में बिजाई के 30, 45 और 60 दिन बाद डालें शुरू में लहसुन का पौधा धीरे धीरे बढ़ता है इसलिए नदीन नाशकों का प्रयोग गोडाई से बढ़िया रहता है नदीनों को रोकने के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति 200 लीटर पानी प्रति एकड़ में डालकर बिजाई से 72 घंटो में स्प्रे करें इसके बिना नदीन नाशक ऑक्सीफ्लोरफेन 425 मि.ली. प्रति 200 लीटर पानी में डालकर स्प्रे बिजाई के 7 दिन बाद करें नदीनों की रोकथाम के लिए 2 गोडाई की जरूरत है पहली गोडाई बिजाई से 1 महीने बाद और दूसरी गोडाई बिजाई के 2 महीने बाद करें वातावरण और मिट्टी की किस्म के आधार पर सिंचाई करें बिजाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें और आवश्यकता के आधार पर 10-15 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें कटाई करने और सूखाने के बाद गांठों को
आकार के अनुसार छांटे धन्यवाद

Posted by tejinder singh
Punjab
03-11-2019 04:26 PM
Tejinder ji jddo cow heat vich aawe uss din he bhrwa deo ate 2 din lagatar bhrwao ji..

Posted by ਜਗਸੀਰ ਸਿੰਘ ਮਾਨ
Punjab
03-11-2019 04:14 PM
ਜਗਸੀਰ ਜੀ ਤੁਹਾਡੇ ਸਵਾਲ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦਿਤੇ ਗਏ ਹੈ ਤੁਸੀ ਐਪ ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਸਵਾਲ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦੇਖ ਸਕਦੇ ਹੋ
Posted by ਨਿਰਮਲ ਸਿੰਘ ਮਣਕੂ
Punjab
03-11-2019 04:04 PM
ji..
Posted by Rudra Pratap Singh
Uttar Pradesh
03-11-2019 04:02 PM
Rudra ji,iske liye ap quinalphos @ 4ml prati liter pani ke hisaab se spray karein, dhanywad

Posted by anilkumar
Uttar Pradesh
03-11-2019 04:02 PM
अनिल जी यदि आप बिल्कुल छोटे स्तर पर सुअर फार्मिंग करते है तो इसमें भी कम से कम 2—3 लाख तक खर्चा आ जाएगा धन्यवाद

Posted by ਜਗਸੀਰ ਸਿੰਘ ਮਾਨ
Punjab
03-11-2019 03:55 PM
ਜਗਸੀਰ ਜੀ ਤੁਹਾਡੇ ਸਵਾਲ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦਿਤੇ ਗਏ ਹੈ ਤੁਸੀ ਐਪ ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਸਵਾਲ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦੇਖ ਸਕਦੇ ਹੋ .

Posted by Ramesh kumawat
Madhya Pradesh
03-11-2019 03:55 PM
रमेश जी , बिजाई से 10 दिन पहले खेत में 2 टन रूड़ी की खाद डालें 50 किलो नाइट्रोजन (110 किलो यूरिया) और 25 किलो फासफोरस (155 किलो एस एस पी) प्रति एकड़ डालें सारी एस एस पी बिजाई से पहले और नाइट्रोजन तीन हिस्सों में बिजाई के 30, 45 और 60 दिन बाद डालें धन्यवाद
Posted by Rudra Pratap Singh
Uttar Pradesh
03-11-2019 03:50 PM
रूद्र जी, यह fungus का हमला हुआ है, कृपया आप इसमें tilt @ 200 ml प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें , धन्यवाद
Posted by Charan Singh
Uttar Pradesh
03-11-2019 03:47 PM
Charan ji, is keede ki roktham ke liye ap fenvelrate @ 2g prati liter pani ke hisaab se spray karein, dhanywad

Posted by manoj
Rajasthan
03-11-2019 03:28 PM
श्रीमान जी, आप अपनी मिटटी अपने पास के KVK से करवा सकते है जोके Jhunjhunu - Mandawa Road, pin : 333 001, KVK contact number : 01592-233420 , पर है, धन्यवाद
Posted by Neeraj Rathi
Uttar Pradesh
03-11-2019 03:27 PM
नीरज जी , सामान्य बिजाई के लिए कतारों में 20-22-5 सैं.मी. के फासले की सलाह दी जाती है यदि बिजाई देरी से करनी हो तो 15-18 सैं.मी. का फासला होना चाहिए लंबी किस्मों के लिए 6-7 सैं.मी. की गहराई का प्रयोग करें जबकि अन्य किस्मों के लिए 5-6 सैं.मी. की गहराई का प्रयोग करें आप बीज ड्रिल, बुरकाव विधि से बिजाई कर सकते है धन्यवाद

Posted by syed
Telangana
03-11-2019 03:23 PM
बकरी पालन बहुत ही लाभकारी काम है शुरूआत करने के लिए आप 10 बकरियों और 2 बकरे के साथ कर सकते हैं इन्हें खुराक कम चाहिए इसलिए इन्हें आसानी से पाल सकते हैं ये हर प्रकार के मौसम में पाली जा सकती हैं बकरियां 12-14 महीने में बच्चे देना शुरू कर देती है बकरी का गर्भ समय 150 दिन का होता है और साल में 1-5 बच्चे देती है साल में दो बच्.... (Read More)
बकरी पालन बहुत ही लाभकारी काम है शुरूआत करने के लिए आप 10 बकरियों और 2 बकरे के साथ कर सकते हैं इन्हें खुराक कम चाहिए इसलिए इन्हें आसानी से पाल सकते हैं ये हर प्रकार के मौसम में पाली जा सकती हैं बकरियां 12-14 महीने में बच्चे देना शुरू कर देती है बकरी का गर्भ समय 150 दिन का होता है और साल में 1-5 बच्चे देती है साल में दो बच्चे देना आम बात है बकरियां 8-10 वर्ष तक बच्चे देती हैं और अपन गिनती को तेजी से बढ़ा लेती हैं आप बारबरी, ब्लैक बंगाल, जैसी नसल पाल सकते हैं इसकी ट्रेनिेंग के लिए आप अपने कुषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करे या फिर जो बकरी पालन का व्यवसाय कर रहा कोई किसान उसका फार्म स्वंय जाकर देखकर आयें तो और भी बारीकियों का पता चल जायेगा, इसके इलावा आप बीटल नस्ल का रख सकते है क्योंकि ये नस्ल मीट और दूध दोंनो कामों के लिए अच्छी रहती है.

Posted by manoj
Rajasthan
03-11-2019 03:16 PM
Manoj ji faslon ke bhav dekhene ke liye ap app par mandi rate ki option ko click kar ke dekh sakte hain, dhanywad
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