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Posted by pawan maru
Madhya Pradesh
13-03-2020 07:23 PM
Punjab
03-13-2020 07:34 PM
श्रीमान जी कीट के हमले की रोकथाम के लिए आप Imidacloprid@1.5ml प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे कर सकते हैं
Posted by Harsh Deep Singh
Punjab
13-03-2020 07:13 PM
Punjab
03-13-2020 07:23 PM
Shri maan g Tilt ik fungicide hai jo fungus di roktham de lyi spray kr skde ho,, bengn te sundi di roktham de lyi tuc Cartap Sc @200ml per acre spray kr skde ho.....
Posted by Deepak kumar
Uttar Pradesh
13-03-2020 07:10 PM
Punjab
03-14-2020 05:20 PM
deepak ji parwal kaddu jaati ki poshtik sabji hai.parwal ki kheti ke liye garm aur adhik adrta vali jalwayu ki upyukt hoti hai.bihar ki ganda aur son gandak diyara shetro men parval ki kheti ki ja sakti hai.achi paidavar ke liye domat blui mitti ki kheti ki ja sakti hai.May-june mahine ke mitti paltane vale hal se khet ko ekbar jutayi karke khula chod de.ropayi ke lagbhag 83-85 quintal prati acre ke dar se daale.
Posted by sardeep singh pannu
Punjab
13-03-2020 07:06 PM
Punjab
03-13-2020 07:16 PM
Sardeep ji tuci goat farming di training lain lai apne nazdiki krishi vigyan kendra nal sampark kr skde ho uthe sme sme te kisana di manng de anusar training diti jndi hai tuci uthe ja ke apna training wala farm bhar aao fir jddo v training howegi ohh tuhanu phone krke dass denge, training lain lai tuci KRISHI VIGYAN KENDRA PATIALA, Village. Rauni, Nabha Road, VPO Ranbirpura, Distt Patiala, Pin-147001, Phone:- 0175-2225473, Mobile:- 09417360460 nal sampark kr skde ho ate training lai skde ho.
Posted by ARASH BRAR
Punjab
13-03-2020 07:00 PM
Punjab
03-14-2020 05:22 PM
Arsh ji tuc gandoye lain de layi Angrej Singh nal sampark kar sakde ho. ehna da sampark number 9417613396 hai .
Posted by shiv prasad
Uttar Pradesh
13-03-2020 06:57 PM
Punjab
03-14-2020 04:26 PM
शिव जी कृपया सवाल विस्तार से पूछें कि आप कौन सी फसल की खेती करना चाहते है ताकि आपको इसके बारे में पूरी जानकारी दी जा सके
Posted by kapil
Haryana
13-03-2020 06:56 PM
Punjab
03-13-2020 07:29 PM
श्री मान गेहूं में NPK 13:00:45@1kg प्रती एकड़ सप्रे कर सकते हो
Posted by Jaskaran Singh
Punjab
13-03-2020 06:51 PM
Punjab
03-14-2020 04:16 PM
jaskaaran ji tuc makki diyan kisman jive PMH2,parkash,megha kisam di bijai kar sakde ho.dhanwad
Posted by Gurpreet Chahal
Punjab
13-03-2020 06:36 PM
Punjab
03-13-2020 07:17 PM
Gurpreet ji tuci uss nu Vitamor-H liquid 10-10ml swere sham deo ate uss nu Metabolite powder di rojana 1 pudi deni suru kro ehna nal usda lewa ate dudh vddh jawega.
Posted by RINKU KAMBOJ
Punjab
13-03-2020 06:34 PM
Punjab
03-13-2020 07:29 PM
ਰਿੰਕੂ ਜੀ ਇਸਦਾ ਕੋਈ ਇਲਾਜ ਨਹੀਂ ਹੈ ਇਹ ਗਰਮੀ ਵਿਚ ਹੈ ਇਸ ਨੂੰ ਤੁਸੀ ਸਰੋਂ ਦਾ ਤੇਲ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰੋ, ਇਸ ਨਾਲ ਥੋੜਾ ਫਰਕ ਪੈ ਜਾਵੇਗਾ..
Posted by Bijender Singh
Uttar Pradesh
13-03-2020 06:34 PM
Punjab
03-14-2020 04:12 PM
बिजेंद्र जी किसानो के साथ जानकारी सांझी करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद
Posted by amit pandey
Uttar Pradesh
13-03-2020 06:12 PM
Punjab
03-13-2020 09:24 PM
Amit iske liye aap usko liver tonic jaise Vitakind liv, Brotone, Livtantra koi v 50-50ml rojana de skte hai aur Buffzone powder 50gm rojana de skte hai, yaddi aap mitha soda 20gm rojana dete hai tab v ph thik rehta hai.
Posted by ranjeet singh
Rajasthan
13-03-2020 06:08 PM
Punjab
03-13-2020 07:27 PM
यदि आप पोल्टरी की ट्रेनिंग लेकर नाबार्ड से लोन लेते हैं तो आपको 25 से 35 प्रतिशत तक सब्सिडी मिल जाती है लेान एप्लाई करने के लिए पूरी जानकारी आपको विभाग की तरफ से ट्रेनिंग के बाद दी जाती है ट्रेनिंग लेने के लिए आप अपने नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र से या गुरू अंगद देव वैटनरी युनिवर्सिटी से संपर्क कर सकते हैं या à.... (Read More)
यदि आप पोल्टरी की ट्रेनिंग लेकर नाबार्ड से लोन लेते हैं तो आपको 25 से 35 प्रतिशत तक सब्सिडी मिल जाती है लेान एप्लाई करने के लिए पूरी जानकारी आपको विभाग की तरफ से ट्रेनिंग के बाद दी जाती है ट्रेनिंग लेने के लिए आप अपने नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र से या गुरू अंगद देव वैटनरी युनिवर्सिटी से संपर्क कर सकते हैं या फिर आप किसी भी दिन अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र पर जाकर ट्रेनिंग लेने के लिए फार्म भर आयें उसके बाद जब भी पोल्टरी की ट्रेनिंग आयेगी तो आपको के वी के की तरफ से कॉल करके बता दिया जायेगा बहुत बढ़िया काम है
Posted by jagseer singh
Punjab
13-03-2020 06:05 PM
Uttar Pradesh
03-13-2020 06:12 PM
जगसीर सिंह जी हां आप पंजाब में संतरे का बगीचा लगा सकते हैं..! संतरे की फसल को शुष्क तथा उपोष्ण दशाएं अच्छी लगती है, इसमें पाले से बड़ी हानी होती है अच्छी वानस्पतिक बृद्धि के लिए 16 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल होता है, वैसे यह फसल 32 से 40 डिग्री सेल्सियस का अधिकतम तथा यह 17 से 27 डिग्री सेल्सियस का न्यूनतम ताà.... (Read More)
जगसीर सिंह जी हां आप पंजाब में संतरे का बगीचा लगा सकते हैं..! संतरे की फसल को शुष्क तथा उपोष्ण दशाएं अच्छी लगती है, इसमें पाले से बड़ी हानी होती है अच्छी वानस्पतिक बृद्धि के लिए 16 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल होता है, वैसे यह फसल 32 से 40 डिग्री सेल्सियस का अधिकतम तथा यह 17 से 27 डिग्री सेल्सियस का न्यूनतम तापमान सह सकती है
Posted by jagveer singh
Rajasthan
13-03-2020 06:04 PM

Punjab
03-14-2020 07:34 PM
Jagveer ji jo bakri palan ki project report hai woh CA tyar krke dega, aap unse sampark kr skte hai.
Posted by Gurdhian Singh
Punjab
13-03-2020 06:02 PM

Uttar Pradesh
03-13-2020 06:26 PM
सत श्री अकाल जी, परिचय पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं पेड़ के ऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होत.... (Read More)
सत श्री अकाल जी, परिचय पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं पेड़ के ऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है आजकल नयी जातियों में बिना बीज के पपीते की किस्में ईजाद की गई हैं   एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है पपीते के पेड़ नर और मादा के रुप में अलग-अलग होते हैं लेकिन कभी-कभी एक ही पेड़ में दोनों तरह के फूल खिलते हैं हवाईयन और मेक्सिकन पपीते बहुत प्रसिद्ध हैं भारतीय पपीते भी अत्यन्त स्वादिष्ट होते हैं अलग-अलग किस्मों के अनुसार इनके स्वाद में थोड़ी बहुत भिन्नता हो सकती है भूमिका पपीता स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए से भरपूर फल होता है पपीता ट्रापिकल अमेरिका में पाया जाता है पपीते का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है पपीता कैरिकेसी परिवार का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है पपीता एक बहुलिडीस पौधा है तथा मुरकरटय से तीन प्रकार के लिंग नर, मादा तथा नर व मादा दोनों लिंग एक पेड़ पर होते हैं पपीता के पके व कच्चे फल दोनो उपयोगी होते हैं कच्चे फल से पपेन बनाया जाता है जिसका सौन्दर्य जगत में तथा उद्योग जगत में व्यापक प्रयोग किया जाता है पपीता एक सदाबहार मधुर फल है, जो स्वादिष्ट और रुचिकर होता है यह हमारे देश में सभी जगह उत्पन्न होता है यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फ़रवरी-मार्च और मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है पपीता पित्त का शमन तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है पपीता बहुत ही जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है साधारण ज़मीन, थोड़ी गरमी और अच्छी धूप मिले तो यह पेड़ अच्छा पनपता है, पर इसे अधिक पानी या ज़मीन में क्षार की ज़्यादा मात्रा रास नहीं आती इसकी पूरी ऊँचाई क़रीब 10-12 फुट तक होती है जैसे-जैसे पेड़ बढ़ता है, नीचे से एक एक पत्ता गिरता रहता है और अपना निशान तने पर छोड़ जाता है तना एकदम सीधा हरे या भूरे रंग का और अन्दर से खोखला होता है पत्ते पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्से में ही होते हैं एक समय में एक पेड़ पर 80 से 100 फल तक भी लग जाते हैं पपीता पोषक तत्वों से भरपूर अत्यंत स्वास्थ्यवर्द्धक जल्दी तैयार होने वाला फल है जिसे पके तथा कच्चे रूप में प्रयोग किया जाता है आर्थिक महत्व ताजे फलों के अतिरिक्त पपेन के कारण भी है जिसका प्रयोग बहुत से औद्योगिक कामों में होता है अतः इसकी खेती की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह हमारे देश का पांचवा लोकप्रिय फल है, देश की अधिकांश भागों में घर की बगिया से लेकर बागों तक इसकी बागवानी का क्षेत्र निरंतर बढ़ता जा रहा है देश की विभिन्न राज्यों आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिजोरम में इसकी खेती की जा रही है अतः इसके सफल उत्पादन के लिए वैज्ञानिक पद्धति और तकनीकों का उपयोग करके कृषक स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से लाभान्वित कर सकते हैं इसके लिए तकनीकी बातों का ध्यान रखना चाहिए पपीते की किस्में पपीते की मुख्य किस्मों का विवरण निम्नवत है- पूसा डोलसियरा यह अधिक ऊपज देने वाली पपीते की गाइनोडाइसियश प्रजाति है जिसमें मादा तथा नर-मादा दो प्रकार के फूल एक ही पौधे पर आते हैं पके फल का स्वाद मीठा तथा आकर्षक सुगंध लिये होता है पूसा मेजेस्टी यह भी एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है इसकी उत्पादकता अधिक है, तथा भंडारण क्षमता भी अधिक होती है रेड लेडी 786 पपीते की एक नई किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा विकसित की गई है, जिसे रेड लेडी 786 नाम दिया है यह एक संकर किस्म है इस किस्म की खासीयत यह है कि नर व मादा फूल ही पौधे पर होते हैं, लिहाजा हर पौधे से फल  मिलने की गारंटी होती है पपीते की अन्य किस्मों में नर व मादा फूल अलग-अलग पौधे पर लगते हैं, ऐसे में फूल निकलने तक यह पहचानना कठिन होता है कि कौन सा पौध नर है और कौन सा मादा इस नई किस्म की एक खासीयत यह है कि इसमें साधरण पपीते में लगने वाली पपायरिक स्काट वायरस नहीं लगता है यह किस्म सिर्फ  9 महीने में तैयार हो जाती है इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी ज्यादा होती है पपीते में एंटी आक्सीडेंट पोषक तत्त्व कैरोटिन,पोटैशियम,मैग्नीशियम, रेशा और विटामिन ए, बी, सी सहित कई अन्य गुणकारी तत्व भी पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तकरीबन 3 सालों की खोज के बाद इसे पंजाब में उगाने के लिए किसानों को दिया वैसे इसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और राजस्थान में भी उगाया जा रहा है पपीते का फूल पूसा जाइन्ट यह किस्म बहुत अधिक वृद्धि वाली मानी जाती है नर तथा मादा फूल अलग-अलग पौधे पर पाये जाते हैं पौधे अधिक मज़बूत तथा तेज़ हवा से गिरते नहीं हैं पूसा ड्रवार्फ यह छोटी बढ़वार वाली डादसियश किस्म कही जाती है जिसमें नर तथा मादा फूल अलग अलग पौधे पर आते हैं फल मध्यम तथा ओवल आकार के होते हैं पूसा नन्हा इस प्रजाति के पौधे बहुत छोटे होते हैं तथा यह गृहवाटिका के लिए अधिक उपयोगी होता है साथ साथ सफल बागवानी के लिए भी उपयुक्त है कोयम्बर-1 पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है फल मध्य आकार के तथा गोलाकार होते हैं कोयम्बर-3 यह एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है पौधा लम्बा, मज़बूत तथा मध्य आकार का फल देने वाला होता है पके फल में शर्करा की मात्रा अधिक होती है तथा गूदा लाल रंग का होता है हनीइयू (मधु बिन्दु) इस पौधे में नर पौधों की संख्या कम होती है,तथा बीज के प्रकरण अधिक लाभदायक होते हैं इसका फल मध्यम आकार का बहुत मीठा तथा ख़ुशबू वाला होता है पपीते का पेड़ कूर्गहनि डयू यह गाइनोडाइसियश जाति है इसमें नर पौधे नहीं होते हैं फल का आकार मध्यम तथा लम्बवत गोलाकार होता है गूदे का रंग नारंगी पीला होता है वाशिगंटन यह अधिक उपज देने वाली विभिन्न जलवायु में उगाई जाने वाली प्रजाति है इस पौधे की पत्तियों के डंठल बैगनी रंग के होते हैं जो इस किस्म की पहचान कराते हैं यह डाइसियन किस्म हैं फल मीठा,गूदा पीला तथा अच्छी सुगंध वाला होता है पन्त पपीता-1 इस किस्म का पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है फल मध्यम आकार के गोल होते हैं फल मीठा तथा सुगंधित तथा पीला गूदा होता है यह पककर खाने वाली अच्छी किस्म है तथा तराई एवं भावर जैसे क्षेत्र में उगाने के लिए अधिक उपयोगी है पपीते के लिए आबोहवा पपीता एक उष्ण कटिबंधीय फल है,परंतु इसकी खेती समशीतोष्ण आबोहवा में भी की जा सकती है ज्यादा ठंड से पौधे के विकास पर खराब असर पड़ता है इसके फलों की बढ़वार रूक जाती है फलों के पकने व मिठास बढ़ने के लिए गरम मौसम बेहतर है पपीता की खेती योग्य भूमि या मृदा इस पपीते के सफल उत्पादन के लिए दोमट मिट्‌टी अच्छी होती है खेत में पानी निकलने का सही इंतजाम होना जरूरी है, क्योंकि पपीते के पौधे की जड़ों व तने के पास पानी भरा रहने से पौधे का तना सड़ने लगता है इस पपीते के लिहाज से मिट्‌टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए पपीता के लिए हलकी दोमट या दोमट मृदा जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वश्रेष्ठ है इसलिए इसके लिए दोमट, हवादार, काली उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिए और इसका अम्ल्तांक 6.5-7.5 के बीच होना चाहिए तथा पानी बिलकुल नहीं रुकना चाहिए मध्य काली और जलोढ़ भूमि इसके लिए भी अच्छी होती है यह मुख्य रूप से उष्ण प्रदेशीय फल है इसके उत्पादन के लिए तापक्रम 22-26 डिग्री से०ग्रे० के बीच और 10 डिग्री से०ग्रे० से कम नहीं होना चाहिए क्योंकि अधिक ठंड तथा पाला इसके शत्रु हैं, जिससे पौधे और फल दोनों ही प्रभावित होते हैं इसके सकल उत्पादन के लिए तुलनात्मक उच्च तापक्रम, कम आर्द्रता और पर्याप्त नमी की जरुरत है पपीता में नियंत्रित परगन के अभाव और बीज प्रवर्धन के कारण क़िस्में अस्थाई हैं और एक ही क़िस्म में विभिन्नता पाई जाती है अतः फूल आने से पहले नर और मादा पौधों का अनुमान लगाना कठिन है इनमें कुछ प्रचलित क़िस्में जो देश के विभिन्न भागों में उगाई जाती हैं और अधिक संख्या में मादा फूलों के पौधे मिलते हैं मुख्य हैं हनीडियू या मधु बिंदु, कुर्ग हनीडियू, वाशिंगटन, कोय -1, कोय- 2, कोय- 3, फल उत्पादन और पपेय उत्पादन के लिए कोय-5, कोय-6, एम. ऍफ़.-1 और पूसा मेजस्टी मुख्या हैं उत्तरी भारत में तापक्रम का उतर चढ़ाव अधिक होता है अतः उभयलिंगी फूल वाली क़िस्में ठीक उत्पादन नहीं दे पाती हैं कोय-1, पंजाब स्वीट, पूसा देलिसियास, पूसा मेजस्टी, पूसा जाइंट, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा (म्यूटेंट) आदि क़िस्में जिनमे मादा फूलों की संख्या अधिक होती है और उभयलिंगी हैं, उत्तरी भारत में काफी सफल हैं हवाई की सोलो क़िस्म जो उभयलिंगी और मादा पौधे होते है, उत्तरी भारत में इसके फल छोटे और निम्न कोटि के होते हैं पपीते की बोआई पपीते का व्यवसाय उत्पादन बीजों द्वारा किया जाता है इसके सफल उत्पादन के लिए यह जरूरी है कि बीज अच्छी क्वालिटी का हो बीज के मामले में निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए : 1. बीज बोने का समय जुलाई से सितम्बर और फरवरी-मार्च होता है 2. बीज अच्छी किस्म के अच्छे व स्वस्थ फलों से लेने चाहिए चूंकि यह नई किस्म संकर प्रजाति की है, लिहाजा हर बार इसका नया बीज ही बोना चाहिए 3. बीजों को क्यारियों, लकड़ी के बक्सों, मिट्‌टी के गमलों व पोलीथीन की थैलियों में बोया जा सकता है 4. क्यारियाँ जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंची व 1 मीटर चौड़ी होनी चाहिए 5. क्यारियों में गोबर की खाद, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट काफी मात्रा में मिलाना चाहिए पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए और बीजों को 0.1 फीसदी कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए 6. जब पौधे 8-10 सेंटीमीटर लंबे हो जाएँ, तो उन्हें क्यारी से पौलीथीन में स्थानांतरित कर देते हैं 7. जब पौधे 15 सेंटीमीटर ऊँचे हो जाएँ, तब 0.3 फीसदी फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम पर्याप्त होती है बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे की जार या बोतल में रखा हो जिसका मुँह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को उपचारित करना चाहिए बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊँची उठी हुई संकरी होनी चाहिए इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू, तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्र में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं जिस स्थान पर नर्सरी हो उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई,करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ़ कर देना चाहिए तथा ज़मीन को 2 प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए वह स्थान जहाँ तेज़ धूप तथा अधिक छाया न आये चुनना चाहिए एक एकड़ के लिए 4059 मीटर ज़मीन में उगाये गए पौधे काफी होते हैं इसमें 2.5 x 10 x 0.5 आकर की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें, और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2 गहराई पर 3 x 6 के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दे और फिर 1/2 गोबर की खाद के मिश्रण से ढ़क कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाये यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें तो इनमे भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें बोई गयी क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह शाम होज द्वारा पानी दें बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं जब इन पौधों में 4-5 पत्तियाँ और ऊँचाई 25 से.मी. हो जाये तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सड़न और उकठा रोग लग जाता है उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल,जून-अगस्त में उगाने चाहिए पपीते का रोपण अच्छी तरह से तैयार खेत में 2 x2 मीटर की दूरी पर 50x50x50 सेंटीमीटर आकार के गड्‌ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिएं, ताकि गड्‌ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाएँ पौधे लगाने के बाद गड्‌ढे को मिट्‌टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊँचा रहे गड्‌ढे की भराई के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे मिट्‌टी अच्छी तरह बैठ जाए वैसे पपीते के पौधे  जून-जुलाई या फरवरी -मार्च में लगाए जाते हैं, पर ज्यादा बारिश व सर्दी वाले इलाकों में सितंबर या फरवरी -मार्च में लगाने चाहिए जब तक पौधे अच्छी तरह पनप न जाएँ, तब तक रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए प्लास्टिक थैलियों में बीज उगाना इसके लिए 200 गेज और 20 x 15 सेमी आकर की थैलियों की जरुरत होती है जिनको किसी कील से नीचे और साइड में छेड़ कर देते हैं तथा 1:1:1:1 पत्ती की खाद, रेट, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं प्रत्येक थैली में दो या तीन बीज बो देते हैं उचित ऊँचाई होने पर पौधों को खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं प्रतिरोपण करते समय थाली के नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए गड्ढे की तैयारी तथा पौधारोपण पौध लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ताकि पानी न भर सकें फिर पपीता के लिए 50x50x50 से०मी० आकार के गड्ढे 1.5x1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बी.एच.सी. 10 प्रतिशत डस्ट मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए ऊँची बढ़ने वाली क़िस्मों के लिए1.8x1.8 मीटर फासला रखते हैं पौधे 20-25 से०मी० के फासले पर लगा देते हैं पौधे लगते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए जिससे पानी तने से न लगे खाद व उर्वरक का प्रयोग पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरुरत है अतः अच्छी फ़सल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फ़ॉस्फ़रस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधे 20-25 कि०ग्रा० गोबर की सड़ी खाद, एक कि०ग्रा० बोनमील और एक कि०ग्रा० नीम की खली की जरुरत पड़ती है खाद की यह मात्र तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्तूबर महीनों में देनी चाहिए पपीता जल्दी बढ़ने व फल देने वाला पौधा है, जिसके कारण भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्व निकल जाते हैं लिहाजा अच्छी उपज हासिल करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे हर साल देना चाहिए नाइट्रोजन की मात्रा को 6 भागों में बाँट कर पौधा रोपण के 2 महीने बाद से हर दूसरे महीने डालना चाहिए फास्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए उर्वरकों को तने से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधें के चारों ओर बिखेर कर मिट्‌टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा फरवरी-मार्च और आधी जुलाई-अगस्त में देनी चाहिए उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए पाले से पेड़ की रक्षा पौधे को पाले से बचाना बहुत आवश्यक है इसके लिए नवम्बर के अंत में तीन तरफ से फूंस से अच्छी प्रकार ढक दें एवं पूर्व-दक्षिण दिशा में खुला छोड़ दें बाग़ के चारों तरफ रामाशन से हेज लगा दें जिससे तेज़ गर्म और ठंडी हवा से बचाव हो जाता है समय-समय पर धुआँ कर देना चाहिए उष्ण प्रदेशीय जलवायु में जाड़े और गर्मी के तापमान में अधिक अंतर नहीं होता है और आर्द्रता भी साल भर रहती है पपीता साल भर फलता फूलता है लेकिन उत्तर भारत में यदि खेत में प्रतिरोपण अप्रैल-जुलाई तक किया जाय तो अगली बसंत ऋतू तक पौधे फूलने लगते हैं और मार्च-अप्रैल या बाद में लगे फल दिसम्बर-जनवरी में पकने लगते हैं यदि फल तोड़ने पर दूध, पानी से तरह निकलने लगता है तब पपीता तोड़ने योग्य हो जाता है अच्छी देख-रेख करने पर प्रति पौधे से 40-50 किलो उपज मिल जाती है पपीते में कीट, बीमारी व उनकी रोकथाम प्रमुख रूप से किसी कीड़े से नुकसान नहीं होता है परन्तु वायरस, रोग फैलाने में सहायक होते हैं इसमें निम्न रोग लगते हैं- तने तथा जड़ के गलने से बीमारी इसमें भूमि के तल के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है और जड़ भी गलने लगती है पत्तियाँ सुख जाती हैं और पौधा मर जाता है इसके उपचार के लिए जल निकास में सुधार और ग्रसित पौधों को तुंरत उखाड़कर फेंक देना चाहिए पौधों पर एक प्रतिशत वोरडोक्स मिश्रण या कोंपर आक्सीक्लोराइड को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करने से काफ़ी रोकथाम होती है डेम्पिग ओंफ इसमें नर्सरी में ही छोटे पौधे नीचे से गलकर मर जाते हैं इससे बचने के लिए बीज बोने से पहले सेरेसान एग्रोसन जी.एन. से उपचारित करना चाहिए तथा सीड बेड को 2.5 % फार्मेल्डिहाइड घोल से उपचारित करना चाहिए मौजेक (पत्तियों का मुड़ना) : इससे प्रभावित पत्तियों का रंग पीला हो जाता है व डंठल छोटा और आकर में सिकुड़ जाता है इसके लिए 250 मि. ली. मैलाथियान 50 ई०सी० 250 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना काफ़ी फायदेमंद होता है चैंपा : इस कीट के बच्चे व जवान दोनों पौधे के तमाम हिस्सों का रस चूसते हैं और विषाणु रोग फैलाते हैं इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर या पफास्पफोमिडाल 5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें लाल मकड़ी : इस कीट का हमला पत्तियों व फलों की सतहों पर होता है इसके प्रकोप के कारण पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बाद में लाल भूरे रंग की हो जाती है इसकी रोकथाम के लिए थायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें पद विगलन : यह रोग पीथियम फ्रयूजेरियम नामक पफपफूंदी के कारण होता है रोगी पौधें की बढ़वार रूक जाती है पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौध सड़कर गिर जाता है इसकी रोकथाम के लिए रोग वाले हिस्से को खुरचकर उस पर ब्रासीकोल 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें श्याम वर्ण: इस रोग का असर पत्तियों व फलों  पर होता है, जिससे इनकी वृद्धि रूक जाती है इससे फलों  के ऊपर  भूरे रंग के धब्बे  पड़ जाते हैं इसकी रोकथाम के लिए ब्लाईटाक्स 3 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई पानी की कमी तथा निराई-गुड़ाई न होने से पपीते के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है अतः दक्षिण भारत की जलवायु में जाड़े में 8-10 दिन तथा गर्मी में 6 दिन के अंतर पर पानी देना चाहिए उत्तर भारत में अप्रैल से जून तक सप्ताह में दो बार तथा जाड़े में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पानी तने को छूने न पाए अन्यथा पौधे में गलने की बीमारी लगने का अंदेशा रहेगा इसलिए तने के आस-पास मिट्टी ऊँची रखनी चाहिए पपीता का बाग़ साफ़ सुथरा रहे इसके लिए प्रत्येक सिंचाई के बाद पेड़ों के चारो तरफ हल्की गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का सही इंतजाम बेहद जरूरी है गर्मियों में 6-7 दिनों के अंदर पर और सर्दियों में 10-12 दिनों के अंदर सिंचाई करनी चाहिए बारिश के मौसम में जब लंबे समय तक बरसात न हो, तो सिंचाई की जरूरत पड़ती है पानी को तने के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए इसके लिए तने के पास चारों ओर मिट्‌टी चढ़ा देनी चाहिए खरपतवार नियंत्रण पपीते के बगीचे में तमाम खरपतवार उग आते हैं, जो जमीन से नमी, पोषक तत्त्वों, वायु व प्रकाश वगैरह के लिए पपीते के पौधे से मुकाबला करते हैं, जिससे पौधे की बढ़वार व उत्पादन पर उल्टा असर पड़ता है खरपतवारों से बचाव के लिए जरूरत के मुताबिक निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए बराबर सिंचाई करते रहने से मिट्‌टी की सतह काफी कठोर हो जाती है, जिससे पौधे की बढ़वार पर उल्टा असर पड़ता है लिहाजा 2-3 बार सिंचाई के बाद थालों की हल्की निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए पपीते की उपज आमतौर पर पपीते की उन्नत किस्मों से प्रति पौध 35-50 किलोग्राम उपज मिल जाती है, जबकि इस नई किस्म से 2-3 गुणा ज्यादा उपज मिल जाती है  
Posted by Gurdhian Singh
Punjab
13-03-2020 06:01 PM
Uttar Pradesh
03-13-2020 06:19 PM
परिचय पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं पेड़ केऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है आजकल नयी जाति.... (Read More)
परिचय पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं पेड़ केऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है आजकल नयी जातियों में बिना बीज के पपीते की किस्में ईजाद की गई हैं   एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है पपीते के पेड़ नर और मादा के रुप में अलग-अलग होते हैं लेकिन कभी-कभी एक ही पेड़ में दोनों तरह के फूल खिलते हैं हवाईयन और मेक्सिकन पपीते बहुत प्रसिद्ध हैं भारतीय पपीते भी अत्यन्त स्वादिष्ट होते हैं अलग-अलग किस्मों के अनुसार इनके स्वाद में थोड़ी बहुत भिन्नता हो सकती है भूमिका पपीता स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए से भरपूर फल होता है पपीता ट्रापिकल अमेरिका में पाया जाता है पपीते का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है पपीता कैरिकेसी परिवार का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है पपीता एक बहुलिडीस पौधा है तथा मुरकरटय से तीन प्रकार के लिंग नर, मादा तथा नर व मादा दोनों लिंग एक पेड़ पर होते हैं पपीता के पके व कच्चे फल दोनो उपयोगी होते हैं कच्चे फल से पपेन बनाया जाता है जिसका सौन्दर्य जगत में तथा उद्योग जगत में व्यापक प्रयोग किया जाता है पपीता एक सदाबहार मधुर फल है, जो स्वादिष्ट और रुचिकर होता है यह हमारे देश में सभी जगह उत्पन्न होता है यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फ़रवरी-मार्च और मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है पपीता पित्त का शमन तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है पपीता बहुत ही जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है साधारण ज़मीन, थोड़ी गरमी और अच्छी धूप मिले तो यह पेड़ अच्छा पनपता है, पर इसे अधिक पानी या ज़मीन में क्षार की ज़्यादा मात्रा रास नहीं आती इसकी पूरी ऊँचाई क़रीब 10-12 फुट तक होती है जैसे-जैसे पेड़ बढ़ता है, नीचे से एक एक पत्ता गिरता रहता है और अपना निशान तने पर छोड़ जाता है तना एकदम सीधा हरे या भूरे रंग का और अन्दर से खोखला होता है पत्ते पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्से में ही होते हैं एक समय में एक पेड़ पर 80 से 100 फल तक भी लग जाते हैं पपीता पोषक तत्वों से भरपूर अत्यंत स्वास्थ्यवर्द्धक जल्दी तैयार होने वाला फल है जिसे पके तथा कच्चे रूप में प्रयोग किया जाता है आर्थिक महत्व ताजे फलों के अतिरिक्त पपेन के कारण भी है जिसका प्रयोग बहुत से औद्योगिक कामों में होता है अतः इसकी खेती की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह हमारे देश का पांचवा लोकप्रिय फल है, देश की अधिकांश भागों में घर की बगिया से लेकर बागों तक इसकी बागवानी का क्षेत्र निरंतर बढ़ता जा रहा है देश की विभिन्न राज्यों आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिजोरम में इसकी खेती की जा रही है अतः इसके सफल उत्पादन के लिए वैज्ञानिक पद्धति और तकनीकों का उपयोग करके कृषक स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से लाभान्वित कर सकते हैं इसके लिए तकनीकी बातों का ध्यान रखना चाहिए पपीते की किस्में पपीते की मुख्य किस्मों का विवरण निम्नवत है- पूसा डोलसियरा यह अधिक ऊपज देने वाली पपीते की गाइनोडाइसियश प्रजाति है जिसमें मादा तथा नर-मादा दो प्रकार के फूल एक ही पौधे पर आते हैं पके फल का स्वाद मीठा तथा आकर्षक सुगंध लिये होता है पूसा मेजेस्टी यह भी एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है इसकी उत्पादकता अधिक है, तथा भंडारण क्षमता भी अधिक होती है रेड लेडी 786 पपीते की एक नई किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा विकसित की गई है, जिसे रेड लेडी 786 नाम दिया है यह एक संकर किस्म है इस किस्म की खासीयत यह है कि नर व मादा फूल ही पौधे पर होते हैं, लिहाजा हर पौधे से फल  मिलने की गारंटी होती है पपीते की अन्य किस्मों में नर व मादा फूल अलग-अलग पौधे पर लगते हैं, ऐसे में फूल निकलने तक यह पहचानना कठिन होता है कि कौन सा पौध नर है और कौन सा मादा इस नई किस्म की एक खासीयत यह है कि इसमें साधरण पपीते में लगने वाली पपायरिक स्काट वायरस नहीं लगता है यह किस्म सिर्फ  9 महीने में तैयार हो जाती है इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी ज्यादा होती है पपीते में एंटी आक्सीडेंट पोषक तत्त्व कैरोटिन,पोटैशियम,मैग्नीशियम, रेशा और विटामिन ए, बी, सी सहित कई अन्य गुणकारी तत्व भी पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तकरीबन 3 सालों की खोज के बाद इसे पंजाब में उगाने के लिए किसानों को दिया वैसे इसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और राजस्थान में भी उगाया जा रहा है पपीते का फूल पूसा जाइन्ट यह किस्म बहुत अधिक वृद्धि वाली मानी जाती है नर तथा मादा फूल अलग-अलग पौधे पर पाये जाते हैं पौधे अधिक मज़बूत तथा तेज़ हवा से गिरते नहीं हैं पूसा ड्रवार्फ यह छोटी बढ़वार वाली डादसियश किस्म कही जाती है जिसमें नर तथा मादा फूल अलग अलग पौधे पर आते हैं फल मध्यम तथा ओवल आकार के होते हैं पूसा नन्हा इस प्रजाति के पौधे बहुत छोटे होते हैं तथा यह गृहवाटिका के लिए अधिक उपयोगी होता है साथ साथ सफल बागवानी के लिए भी उपयुक्त है कोयम्बर-1 पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है फल मध्य आकार के तथा गोलाकार होते हैं कोयम्बर-3 यह एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है पौधा लम्बा, मज़बूत तथा मध्य आकार का फल देने वाला होता है पके फल में शर्करा की मात्रा अधिक होती है तथा गूदा लाल रंग का होता है हनीइयू (मधु बिन्दु) इस पौधे में नर पौधों की संख्या कम होती है,तथा बीज के प्रकरण अधिक लाभदायक होते हैं इसका फल मध्यम आकार का बहुत मीठा तथा ख़ुशबू वाला होता है पपीते का पेड़ कूर्गहनि डयू यह गाइनोडाइसियश जाति है इसमें नर पौधे नहीं होते हैं फल का आकार मध्यम तथा लम्बवत गोलाकार होता है गूदे का रंग नारंगी पीला होता है वाशिगंटन यह अधिक उपज देने वाली विभिन्न जलवायु में उगाई जाने वाली प्रजाति है इस पौधे की पत्तियों के डंठल बैगनी रंग के होते हैं जो इस किस्म की पहचान कराते हैं यह डाइसियन किस्म हैं फल मीठा,गूदा पीला तथा अच्छी सुगंध वाला होता है पन्त पपीता-1 इस किस्म का पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है फल मध्यम आकार के गोल होते हैं फल मीठा तथा सुगंधित तथा पीला गूदा होता है यह पककर खाने वाली अच्छी किस्म है तथा तराई एवं भावर जैसे क्षेत्र में उगाने के लिए अधिक उपयोगी है पपीते के लिए आबोहवा पपीता एक उष्ण कटिबंधीय फल है,परंतु इसकी खेती समशीतोष्ण आबोहवा में भी की जा सकती है ज्यादा ठंड से पौधे के विकास पर खराब असर पड़ता है इसके फलों की बढ़वार रूक जाती है फलों के पकने व मिठास बढ़ने के लिए गरम मौसम बेहतर है पपीता की खेती योग्य भूमि या मृदा इस पपीते के सफल उत्पादन के लिए दोमट मिट्‌टी अच्छी होती है खेत में पानी निकलने का सही इंतजाम होना जरूरी है, क्योंकि पपीते के पौधे की जड़ों व तने के पास पानी भरा रहने से पौधे का तना सड़ने लगता है इस पपीते के लिहाज से मिट्‌टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए पपीता के लिए हलकी दोमट या दोमट मृदा जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वश्रेष्ठ है इसलिए इसके लिए दोमट, हवादार, काली उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिए और इसका अम्ल्तांक 6.5-7.5 के बीच होना चाहिए तथा पानी बिलकुल नहीं रुकना चाहिए मध्य काली और जलोढ़ भूमि इसके लिए भी अच्छी होती है यह मुख्य रूप से उष्ण प्रदेशीय फल है इसके उत्पादन के लिए तापक्रम 22-26 डिग्री से०ग्रे० के बीच और 10 डिग्री से०ग्रे० से कम नहीं होना चाहिए क्योंकि अधिक ठंड तथा पाला इसके शत्रु हैं, जिससे पौधे और फल दोनों ही प्रभावित होते हैं इसके सकल उत्पादन के लिए तुलनात्मक उच्च तापक्रम, कम आर्द्रता और पर्याप्त नमी की जरुरत है पपीता में नियंत्रित परगन के अभाव और बीज प्रवर्धन के कारण क़िस्में अस्थाई हैं और एक ही क़िस्म में विभिन्नता पाई जाती है अतः फूल आने से पहले नर और मादा पौधों का अनुमान लगाना कठिन है इनमें कुछ प्रचलित क़िस्में जो देश के विभिन्न भागों में उगाई जाती हैं और अधिक संख्या में मादा फूलों के पौधे मिलते हैं मुख्य हैं हनीडियू या मधु बिंदु, कुर्ग हनीडियू, वाशिंगटन, कोय -1, कोय- 2, कोय- 3, फल उत्पादन और पपेय उत्पादन के लिए कोय-5, कोय-6, एम. ऍफ़.-1 और पूसा मेजस्टी मुख्या हैं उत्तरी भारत में तापक्रम का उतर चढ़ाव अधिक होता है अतः उभयलिंगी फूल वाली क़िस्में ठीक उत्पादन नहीं दे पाती हैं कोय-1, पंजाब स्वीट, पूसा देलिसियास, पूसा मेजस्टी, पूसा जाइंट, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा (म्यूटेंट) आदि क़िस्में जिनमे मादा फूलों की संख्या अधिक होती है और उभयलिंगी हैं, उत्तरी भारत में काफी सफल हैं हवाई की सोलो क़िस्म जो उभयलिंगी और मादा पौधे होते है, उत्तरी भारत में इसके फल छोटे और निम्न कोटि के होते हैं पपीते की बोआई पपीते का व्यवसाय उत्पादन बीजों द्वारा किया जाता है इसके सफल उत्पादन के लिए यह जरूरी है कि बीज अच्छी क्वालिटी का हो बीज के मामले में निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए : 1. बीज बोने का समय जुलाई से सितम्बर और फरवरी-मार्च होता है 2. बीज अच्छी किस्म के अच्छे व स्वस्थ फलों से लेने चाहिए चूंकि यह नई किस्म संकर प्रजाति की है, लिहाजा हर बार इसका नया बीज ही बोना चाहिए 3. बीजों को क्यारियों, लकड़ी के बक्सों, मिट्‌टी के गमलों व पोलीथीन की थैलियों में बोया जा सकता है 4. क्यारियाँ जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंची व 1 मीटर चौड़ी होनी चाहिए 5. क्यारियों में गोबर की खाद, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट काफी मात्रा में मिलाना चाहिए पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए और बीजों को 0.1 फीसदी कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए 6. जब पौधे 8-10 सेंटीमीटर लंबे हो जाएँ, तो उन्हें क्यारी से पौलीथीन में स्थानांतरित कर देते हैं 7. जब पौधे 15 सेंटीमीटर ऊँचे हो जाएँ, तब 0.3 फीसदी फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम पर्याप्त होती है बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे की जार या बोतल में रखा हो जिसका मुँह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को उपचारित करना चाहिए बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊँची उठी हुई संकरी होनी चाहिए इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू, तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्र में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं जिस स्थान पर नर्सरी हो उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई,करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ़ कर देना चाहिए तथा ज़मीन को 2 प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए वह स्थान जहाँ तेज़ धूप तथा अधिक छाया न आये चुनना चाहिए एक एकड़ के लिए 4059 मीटर ज़मीन में उगाये गए पौधे काफी होते हैं इसमें 2.5 x 10 x 0.5 आकर की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें, और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2 गहराई पर 3 x 6 के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दे और फिर 1/2 गोबर की खाद के मिश्रण से ढ़क कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाये यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें तो इनमे भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें बोई गयी क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह शाम होज द्वारा पानी दें बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं जब इन पौधों में 4-5 पत्तियाँ और ऊँचाई 25 से.मी. हो जाये तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सड़न और उकठा रोग लग जाता है उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल,जून-अगस्त में उगाने चाहिए पपीते का रोपण अच्छी तरह से तैयार खेत में 2 x2 मीटर की दूरी पर 50x50x50 सेंटीमीटर आकार के गड्‌ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिएं, ताकि गड्‌ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाएँ पौधे लगाने के बाद गड्‌ढे को मिट्‌टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊँचा रहे गड्‌ढे की भराई के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे मिट्‌टी अच्छी तरह बैठ जाए वैसे पपीते के पौधे  जून-जुलाई या फरवरी -मार्च में लगाए जाते हैं, पर ज्यादा बारिश व सर्दी वाले इलाकों में सितंबर या फरवरी -मार्च में लगाने चाहिए जब तक पौधे अच्छी तरह पनप न जाएँ, तब तक रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए प्लास्टिक थैलियों में बीज उगाना इसके लिए 200 गेज और 20 x 15 सेमी आकर की थैलियों की जरुरत होती है जिनको किसी कील से नीचे और साइड में छेड़ कर देते हैं तथा 1:1:1:1 पत्ती की खाद, रेट, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं प्रत्येक थैली में दो या तीन बीज बो देते हैं उचित ऊँचाई होने पर पौधों को खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं प्रतिरोपण करते समय थाली के नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए गड्ढे की तैयारी तथा पौधारोपण पौध लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ताकि पानी न भर सकें फिर पपीता के लिए 50x50x50 से०मी० आकार के गड्ढे 1.5x1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बी.एच.सी. 10 प्रतिशत डस्ट मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए ऊँची बढ़ने वाली क़िस्मों के लिए1.8x1.8 मीटर फासला रखते हैं पौधे 20-25 से०मी० के फासले पर लगा देते हैं पौधे लगते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए जिससे पानी तने से न लगे खाद व उर्वरक का प्रयोग पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरुरत है अतः अच्छी फ़सल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फ़ॉस्फ़रस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधे 20-25 कि०ग्रा० गोबर की सड़ी खाद, एक कि०ग्रा० बोनमील और एक कि०ग्रा० नीम की खली की जरुरत पड़ती है खाद की यह मात्र तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्तूबर महीनों में देनी चाहिए पपीता जल्दी बढ़ने व फल देने वाला पौधा है, जिसके कारण भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्व निकल जाते हैं लिहाजा अच्छी उपज हासिल करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे हर साल देना चाहिए नाइट्रोजन की मात्रा को 6 भागों में बाँट कर पौधा रोपण के 2 महीने बाद से हर दूसरे महीने डालना चाहिए फास्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए उर्वरकों को तने से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधें के चारों ओर बिखेर कर मिट्‌टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा फरवरी-मार्च और आधी जुलाई-अगस्त में देनी चाहिए उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए पाले से पेड़ की रक्षा पौधे को पाले से बचाना बहुत आवश्यक है इसके लिए नवम्बर के अंत में तीन तरफ से फूंस से अच्छी प्रकार ढक दें एवं पूर्व-दक्षिण दिशा में खुला छोड़ दें बाग़ के चारों तरफ रामाशन से हेज लगा दें जिससे तेज़ गर्म और ठंडी हवा से बचाव हो जाता है समय-समय पर धुआँ कर देना चाहिए उष्ण प्रदेशीय जलवायु में जाड़े और गर्मी के तापमान में अधिक अंतर नहीं होता है और आर्द्रता भी साल भर रहती है पपीता साल भर फलता फूलता है लेकिन उत्तर भारत में यदि खेत में प्रतिरोपण अप्रैल-जुलाई तक किया जाय तो अगली बसंत ऋतू तक पौधे फूलने लगते हैं और मार्च-अप्रैल या बाद में लगे फल दिसम्बर-जनवरी में पकने लगते हैं यदि फल तोड़ने पर दूध, पानी से तरह निकलने लगता है तब पपीता तोड़ने योग्य हो जाता है अच्छी देख-रेख करने पर प्रति पौधे से 40-50 किलो उपज मिल जाती है पपीते में कीट, बीमारी व उनकी रोकथाम प्रमुख रूप से किसी कीड़े से नुकसान नहीं होता है परन्तु वायरस, रोग फैलाने में सहायक होते हैं इसमें निम्न रोग लगते हैं- तने तथा जड़ के गलने से बीमारी इसमें भूमि के तल के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है और जड़ भी गलने लगती है पत्तियाँ सुख जाती हैं और पौधा मर जाता है इसके उपचार के लिए जल निकास में सुधार और ग्रसित पौधों को तुंरत उखाड़कर फेंक देना चाहिए पौधों पर एक प्रतिशत वोरडोक्स मिश्रण या कोंपर आक्सीक्लोराइड को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करने से काफ़ी रोकथाम होती है डेम्पिग ओंफ इसमें नर्सरी में ही छोटे पौधे नीचे से गलकर मर जाते हैं इससे बचने के लिए बीज बोने से पहले सेरेसान एग्रोसन जी.एन. से उपचारित करना चाहिए तथा सीड बेड को 2.5 % फार्मेल्डिहाइड घोल से उपचारित करना चाहिए मौजेक (पत्तियों का मुड़ना) : इससे प्रभावित पत्तियों का रंग पीला हो जाता है व डंठल छोटा और आकर में सिकुड़ जाता है इसके लिए 250 मि. ली. मैलाथियान 50 ई०सी० 250 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना काफ़ी फायदेमंद होता है चैंपा : इस कीट के बच्चे व जवान दोनों पौधे के तमाम हिस्सों का रस चूसते हैं और विषाणु रोग फैलाते हैं इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर या पफास्पफोमिडाल 5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें लाल मकड़ी : इस कीट का हमला पत्तियों व फलों की सतहों पर होता है इसके प्रकोप के कारण पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बाद में लाल भूरे रंग की हो जाती है इसकी रोकथाम के लिए थायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें पद विगलन : यह रोग पीथियम फ्रयूजेरियम नामक पफपफूंदी के कारण होता है रोगी पौधें की बढ़वार रूक जाती है पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौध सड़कर गिर जाता है इसकी रोकथाम के लिए रोग वाले हिस्से को खुरचकर उस पर ब्रासीकोल 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें श्याम वर्ण: इस रोग का असर पत्तियों व फलों  पर होता है, जिससे इनकी वृद्धि रूक जाती है इससे फलों  के ऊपर  भूरे रंग के धब्बे  पड़ जाते हैं इसकी रोकथाम के लिए ब्लाईटाक्स 3 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई पानी की कमी तथा निराई-गुड़ाई न होने से पपीते के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है अतः दक्षिण भारत की जलवायु में जाड़े में 8-10 दिन तथा गर्मी में 6 दिन के अंतर पर पानी देना चाहिए उत्तर भारत में अप्रैल से जून तक सप्ताह में दो बार तथा जाड़े में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पानी तने को छूने न पाए अन्यथा पौधे में गलने की बीमारी लगने का अंदेशा रहेगा इसलिए तने के आस-पास मिट्टी ऊँची रखनी चाहिए पपीता का बाग़ साफ़ सुथरा रहे इसके लिए प्रत्येक सिंचाई के बाद पेड़ों के चारो तरफ हल्की गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का सही इंतजाम बेहद जरूरी है गर्मियों में 6-7 दिनों के अंदर पर और सर्दियों में 10-12 दिनों के अंदर सिंचाई करनी चाहिए बारिश के मौसम में जब लंबे समय तक बरसात न हो, तो सिंचाई की जरूरत पड़ती है पानी को तने के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए इसके लिए तने के पास चारों ओर मिट्‌टी चढ़ा देनी चाहिए खरपतवार नियंत्रण पपीते के बगीचे में तमाम खरपतवार उग आते हैं, जो जमीन से नमी, पोषक तत्त्वों, वायु व प्रकाश वगैरह के लिए पपीते के पौधे से मुकाबला करते हैं, जिससे पौधे की बढ़वार व उत्पादन पर उल्टा असर पड़ता है खरपतवारों से बचाव के लिए जरूरत के मुताबिक निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए बराबर सिंचाई करते रहने से मिट्‌टी की सतह काफी कठोर हो जाती है, जिससे पौधे की बढ़वार पर उल्टा असर पड़ता है लिहाजा 2-3 बार सिंचाई के बाद थालों की हल्की निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए पपीते की उपज आमतौर पर पपीते की उन्नत किस्मों से प्रति पौध 35-50 किलोग्राम उपज मिल जाती है, जबकि इस नई किस्म से 2-3 गुणा ज्यादा उपज मिल जाती है स्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान, विकिपीडिया, दैनिक समाचार  
Posted by IRFAN KHAN
Rajasthan
13-03-2020 06:00 PM
Punjab
03-14-2020 12:28 PM
khan ji aap iske uper NPK 191919@1 kilo ko 150 litre pani ke hisab se spray kren.dhanywad
Posted by Harsh Deep Singh
Punjab
13-03-2020 05:58 PM
Uttar Pradesh
03-13-2020 06:30 PM
हर्षदीप सिंह जी नमस्कार , आपको बता दे बथुआ एक हर्ब है और इसके लिए आपको हर्बीसाइड प्रयोग करना चाहिए हर्बी साइड प्रयोग करना चाहिए बथुऐ पर अगर आप फंगीसाइड यूज करते हैं तो वह फंगस को मारने के लिए ही काम करेगा....!
Posted by parminder
Punjab
13-03-2020 05:49 PM
Punjab
03-13-2020 07:43 PM
ਉਸ ਨੂੰ Amoxirum 4.5gm injection , Megludyne injection 20ml , Isoflud 5ml , CRB(ascorbic acid) injection 20ml , Vitum-H 5ml ਲਗਵਾਓ ਇਹ ਸਾਰੇ 3 ਦਿਨ ਲਗਾਤਾਰ ਲਗਵਾਓ, ਇਸ ਨਾਲ ਫਰਕ ਪੈ ਜਾਵੇਗਾ..
Posted by ਜਗਦੀਪ
Punjab
13-03-2020 05:42 PM
Punjab
03-13-2020 07:44 PM
ਤੁਸੀ ਇਸਦੀ ਖੁਰਾਕ ਦਾ ਧਿਆਨ ਰੱਖੋ, ਰੋਜਾਨਾ 35-40 ਕਿਲੋ ਹਰਾ ਚਾਰਾ ਦਿਓ, ਬਾਕੀ ਤੁਸੀ ਇਹਨਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ Calpond ਪਾਊਡਰ 50 ਗ੍ਰਾਮ ਅਤੇ Milkout ਪਾਊਡਰ 2-2 ਚਮਚ ਸਵੇਰੇ ਸ਼ਾਮ ਦੇ ਕੇ ਦੇਖ ਸਕਦੇ ਹੋ
Posted by suresh kumar
Uttar Pradesh
13-03-2020 05:40 PM
Punjab
03-13-2020 07:46 PM
बकरी पालन बहुत ही लाभकारी काम है शुरूआत करने के लिए आप 10 बकरियों और 2 बकरे के साथ कर सकत हैं इन्हें खुराक कम चाहिए इसलिए इन्हें आसानी से पाल सकते हैं ये हर प्रकार के मौसम में पाली जा सकती हैं बकरियां 12-14 महीने में बच्चे देना शुरू कर देती है एक बकरी के लिए लगभग 12—15 वर्ग फीट जगह छती हुई और 25—30 वर्ग फीट जगह खुली चाहिए à¤.... (Read More)
बकरी पालन बहुत ही लाभकारी काम है शुरूआत करने के लिए आप 10 बकरियों और 2 बकरे के साथ कर सकत हैं इन्हें खुराक कम चाहिए इसलिए इन्हें आसानी से पाल सकते हैं ये हर प्रकार के मौसम में पाली जा सकती हैं बकरियां 12-14 महीने में बच्चे देना शुरू कर देती है एक बकरी के लिए लगभग 12—15 वर्ग फीट जगह छती हुई और 25—30 वर्ग फीट जगह खुली चाहिए बकरी का गर्भ समय 150 दिन का होता है और साल में 1-5 बच्चे देती है साल में दो बच्चे देना आम बात है बकरियां 8-10 वर्ष तक बच्चे देती हैं और अपन गिनती को तेजी से बढ़ा लेती हैं आप बारबरी, ब्लैक बंगाल, जैसी नसल पाल सकते हैं, लेकिन आप इस काम को करने से पहले अपने नज़दीकी कृषि विज्ञान केन्द्र से संपर्क कर सकते ​है
Posted by suresh kumar
Uttar Pradesh
13-03-2020 05:33 PM
Punjab
03-13-2020 07:52 PM
Suresh ji aap dairy farming suru krne se pehle iski training lene jrur lenn jo aap apne nazdiki krishi vigyan kendra se lee skte hai , uss training certificate se aap loan aur subsidy lee skte hai aur apko dairy farming ke kam ki puuri jankari ho jayegi, aap training lene ke liye Krishi Vigyan Kendra, Kathuara, PO-Kathaura (Jagdishpur Industrial Estate), Distt. AMETHI, Uttar Pradesh, Contact -Dr R K Anand, Head KVK, Contact No.: +91-9838952621 se sampark kr skte hai.
Posted by Prabhjeet Singh Pabhi Bawa
Punjab
13-03-2020 05:24 PM
Punjab
03-14-2020 11:45 AM
ਸਟੋਬਰੀ ਦੀ ਖੇਤੀ ਪੋਲੀਹਾਊਸ ਦੇ ਅੰਦਰ ਜਾਂ ਖੁੱਲੇ ਖੇਤ ਵਿੱਚ ਕਰ ਸਕਦੇਂ ਹੋ ਚੀਕਣੀ , ਬਾਲੂ ਅਤੇ ਚੰਗੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਨਿਕਾਸੀ ਵਾਲੀ ਜ਼ਮੀਨ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਲਈ ਚੰਗੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਏਸਿਡਿਕ ਵਿੱਚ PH level 5.0 to 6.5 ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਮਿੱਟੀ ਦੀ ਨਾਜੁਕਤਾ ਤੀਹ ਤੋਂ ਚਾਲ੍ਹੀ ਸੇਂਟੀਮੀਟਰ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੇ ਸਹੀ ਵਾਧੇ ਲਈ ਦਿਨ ਵੇਲੇ ਤਾਪਮਾਨ 20-25° ਡਿਗਰੀ ਅਤੇ ਰਾਤ ਵੇਲੇ 7-12° ਡਿਗਰੀ ਹੋਣਾ ਚਾà¨.... (Read More)
ਸਟੋਬਰੀ ਦੀ ਖੇਤੀ ਪੋਲੀਹਾਊਸ ਦੇ ਅੰਦਰ ਜਾਂ ਖੁੱਲੇ ਖੇਤ ਵਿੱਚ ਕਰ ਸਕਦੇਂ ਹੋ ਚੀਕਣੀ , ਬਾਲੂ ਅਤੇ ਚੰਗੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਨਿਕਾਸੀ ਵਾਲੀ ਜ਼ਮੀਨ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਲਈ ਚੰਗੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਏਸਿਡਿਕ ਵਿੱਚ PH level 5.0 to 6.5 ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਮਿੱਟੀ ਦੀ ਨਾਜੁਕਤਾ ਤੀਹ ਤੋਂ ਚਾਲ੍ਹੀ ਸੇਂਟੀਮੀਟਰ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੇ ਸਹੀ ਵਾਧੇ ਲਈ ਦਿਨ ਵੇਲੇ ਤਾਪਮਾਨ 20-25° ਡਿਗਰੀ ਅਤੇ ਰਾਤ ਵੇਲੇ 7-12° ਡਿਗਰੀ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਇਸ ਲਈ ਇਸਦੀ ਪਨੀਰੀ ਲਾਉਣ ਦਾ ਕੰਮ ਅੱਧ ਅਕਤੂਬਰ ਤੋਂ ਨਵੰਬਰ ਤਕ ਕਰ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਇਹਨਾਂ ਮਹੀਨਿਆਂ ਤੇ ਇਸਤੋਂ ਬਾਅਦ ਪੰਜਾਬ ਵਿਚ ਲਗਭਗ ਇਹੀ ਤਾਪਮਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੀ ਖੇਤੀ ਮਲਚਿੰਗ ਵਿਧੀ ਰਾਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਖੇਤ ਨੂੰ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਇਸ ਦੇ ਬਾਅਦ ਟਰੈਕਟਰ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਨਾਲ ਮਲਚਿੰਗ ਮਸ਼ੀਨ ਨੂੰ ਖੇਤ ਵਿੱਚ ਉਤਾਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਚਾਰ ਫੁੱਟ ਕਿਆਰੀ ਤਿਆਰ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਇਸ ਵਿੱਚ ਡਰਿੱਪ ਲਾਈਨ ਫਿੱਟ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਇਸ ਦੇ ਬਾਅਦ ਮਸ਼ੀਨ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਨਾਲ ਕਿਆਰੀਆਂ ਉੱਤੇ ਪਲਾਸਟਿਕ ਸ਼ੀਟ ਵਿਛਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਮਲਚਿੰਗ ਲਈ ਹਲਕਾ ਅਤੇ ਲਚਕੀਲਾ ਪਦਾਰਥ ਲਵੋ ਤਾਂ ਜੋ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੇ ਬੂਟੇ ਦੀ ਰਫ਼ਤਾਰ ਉੱਤੇ ਅਸਰ ਨਾ ਪਵੇ ਜਿਸਨੂੰ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਦੋਨਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਮਿੱਟੀ ਵਿੱਚ ਦਬਾ ਦਿਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਹੁਣ ਇਸ ਸ਼ੀਟ ਵਿਚ ਮੋਰੀਆਂ ਕੱਢ ਕੇ ਉਸ ਵਿਚ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੀ ਪਨੀਰੀ ਲਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਪਨੀਰੀ ਲਾਉਣ ਵੇਲੇ ਜੜ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਿੱਟੀ ਵਿੱਚ ਸੇਟ ਕਰ ਦਿਓ ਜੜ ਬਹਾਰ ਰਹਿਣ ਨਾਲ ਪੌਦੇ ਦੇ ਸੁੱਕਣ ਦਾ ਖ਼ਤਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਪੌਦੇ ਨੂੰ ਜਿਆਦਾ ਤਾਪਮਾਨ ਅਤੇ ਠੰਡ ਤੋਂ ਬਚਨ ਲਈ ਇਸਦੇ ਊਪਰ ਛਾਂ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਜੋ ਤੁਸੀਂ ਲੋ ਟਨਲ ਵਿਧੀ ਨਾਲ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ ਮੌਸਮ ਦਾ ਬਹੁਤ ਖਿਆਲ ਰੱਖਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ਥੋੜੀ ਜਿਹੀ ਲਾਪਰਵਾਹੀ ਨਾਲ ਸਾਰੀ ਫ਼ਸਲ ਖ਼ਰਾਬ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ ਪਹਿਲੇ ਸਾਲ ਆਪਣੇ ਖੇਤ ਵਿੱਚ ਸਟ੍ਰਾਬੇਰੀ ਦੀ ਖੇਤੀ ਕਰਨ ਦਾ ਕੁੱਲ ਖਰਚਾ ਢਾਈ ਤੋ ਤਿੰਨ ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਏਕੜ ਦੇ ਹਿਸਾਬ ਆ ਜਾਦਾ ਹੈ ਕਿਉਕਿ ਕਿਸਾਨ ਨੂੰ ਪਹਿਲੇ ਸਾਲ ਡਰਿੱਪ ਸਿਸਟਮ ਅਤੇ ਫੁਆਰਿਆਂ ਆਦਿ ਤੇ ਵੀ ਖਰਚ ਕਰਨਾ ਪੈਦਾ ਹੈ ਪਰ ਅਗਲੇ ਸਾਲਾ ਵਿੱਚ ਕਿਸਾਨ ਦਾ ਇਹ ਖਰਚ ਬਚ ਜਾਦਾ ਹੈ ਇਸਦੇ ਲਈ ਇੱਕ ਏਕੜ ਵਿੱਚ 40 ਬੈਡ ਬਣਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇੱਕ ਬੈਡ ਤੇ 1000 ਸਟ੍ਰਾਬੇਰੀ ਦੇ ਪੌਦੇ ਲੱਗਦੇ ਹਨ ਇਸ ਤਰਾਂ ਇੱਕ ਏਕੜ ਵਿੱਚ ਚਾਲੀ ਹਜ਼ਾਰ ਪੌਦੇ ਲਾਏ ਜਾਦੇ ਹਨ, ਇੱਕ ਪੌਦਾ 3 ਤੋ 4 ਰੁਪਏ ਤੱਕ ਮਿਲ ਜਾਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਦਾ ਝਾੜ 50 ਤੋ 60 ਕੁਇੰਟਲ ਤੱਕ ਨਿਕਲ ਆਉਦਾ ਹੈ 25-30 ਕੁਇੰਟਲ ਗੋਬਰ ਦੀ ਖਾਦ ਇੱਕ ਏਕੜ ਵਿੱਚ ਪਾਓ ਇਹ ਖਾਦ ਇੱਕ ਸਾਲ ਵਿੱਚ ਪਾਉਣੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਫਿਰ 20 : 40 : 40 NPK KG / ਹੇਕਟਏਰ ਪਾਉਣੀ ਹੈ ਚੰਗੀ ਫਸਲ ਲਈ ਯੂਰਿਆ ਦੋ ਫ਼ੀਸਦੀ ਜ਼ਿੰਕ ਸਲਫੇਟ , ਅੱਧਾ ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਕੈਲਸ਼ਿਅਮ ਸਲਫੇਟ ਅੱਧਾ ਫ਼ੀਸਦੀ ਅਤੇ ਬੋਰਿਕ ਏਸਿਡ 0 . 2 ਫ਼ੀਸਦੀ ਚੰਗੀ ਫਸਲ ਲਈ ਠੀਕ ਹੈ ਸਿੰਚਾਈ ਛੇਤੀ ਛੇਤੀ ਪਰ ਹਲਕੀ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਜਿਆਦਾ ਪਾਣੀ ਠੀਕ ਨਹੀਂ ਹੈ ਪੱਤੇ ਗਿੱਲੇ ਨਾ ਕਰੋ ਤੁਪਕਾ ਸਿੰਚਾਈ ਨਾਲ ਘੱਟ ਪਾਣੀ ਲੱਗ ਸਕਦਾ ਹੈ ਜੇਕਰ ਤੁਪਕਾ ਸਚਾਈ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਹੇ ਤਾਂ ਕਿਆਰੀਆਂ ਦੇ ਵਿਚਾਲੇ ਪਾਣੀ ਖਾਲ ਵਿੱਚ ਹੀ ਲਗਾਓ ਨਦੀਨ ਹੱਥ ਨਾਲ ਹਟਾਓ ਜਾਂ ਕੀੜੇ ਮਕੋੜੇ ਅਤੇ ਦੂਜੀਆ ਬਿਮਾਰਿਆ ਵੱਲ ਧਿਆਨ ਰੱਖਣਾ ਜਰੂਰੀ ਹੈ ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਪੋਦਾ ਜਿਆਦਾ ਖਰਾਬ ਹੈ ਉਹਨੂੰ ਹਟਾ ਦਿਓ ਜਦੋਂ ਫਲ ਦਾ ਰੰਗ 70% ਲਾਲ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਤੋੜ ਲੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਜੇਕਰ ਮਾਰਕਿਟ ਦੂਰੀ ਉੱਤੇ ਹੈ ਤਾਂ ਥੋੜ੍ਹਾ ਸਖ਼ਤ ਹੀ ਤੋੜਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਤੁੜਵਾਈ ਵੱਖ ਵੱਖ ਦਿਨਾਂ ਵਿਚ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੀ ਪੈਕਿੰਗ ਪਲਾਸਟਿਕ ਦੀਆਂ ਪਲੇਟਾਂ ਵਿੱਚ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਇਸਨ੍ਹੂੰ ਹਵਾਦਾਰ ਜਗ੍ਹਾ ਉੱਤੇ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਤਾਪਮਾਨ ਪੰਜ ਡਿਗਰੀ ਹੋ ਇੱਕ ਦਿਨ ਦੇ ਬਾਅਦ ਸਟਰਾਬੇਰੀ ਦੀ ਪੈਕਿੰਗ ਦਾ ਤਾਪਮਾਨ ਜ਼ੀਰੋ ਡਿਗਰੀ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਮਾਰਕੀਟ ਵਿੱਚ ਸਟ੍ਰਾਬੇਰੀ ਔਸਤ 200 ਰੁਪਏ ਪ੍ਰਤੀ ਤੱਕ ਵਿਕਦੀ ਹੈ ਇਸ ਤਰਾਂ ਪੰਜ ਲੱਖ ਪ੍ਰਤੀ ਏਕੜ ਤੋ ਇਸ ਦੀ ਆਮਦਨ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਕੇ ਅੱਗੇ ਆਪਣੀ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਕਿਸਾਨ ਆਮਦਨ ਵਿੱਚ ਭਰਪੂਰ ਵਾਧਾ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ਸਟ੍ਰਾਬੇਰੀ ਦੇ ਪੌਦੇ ਸਤੰਬਰ ਤੋ ਅਕਤੂਬਰ ਤੱਕ ਲਾਏ ਜਾਦੇ ਹਨ ਅਤੇ 3 ਮਹੀਨੇ ਬਾਦ ਇਹ ਫਲ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਇਸ ਦੀ ਫਸਲ ਅਪ੍ਰੈਲ ਤੱਕ ਚਲਦੀ ਹੈ ਇਸ ਦੀ ਮਾਰਕੀਟਿੰਗ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਤਰਾਂ ਦੀ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ਨਹੀ ਹੈ ਉਹ ਏਲਨਾਬਾਦ,ਸਿਰਸਾ,ਹਨੂੰਮਾਨਗੜ,ਗੰਗਾਨਗਰ ਤੋ ਇਲਾਵਾ ਬਠਿੰਡਾ,ਮੋਗਾ ਜਲੰਧਰ,ਲੁਧਿਆਣਾ ਵਿੱਚ ਇਸ ਦੀ ਮਾਰਕੀਟਿੰਗ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ਜੇਕਰ ਜ਼ਿਆਦਾ ਮਾਤਰਾ ਵਿੱਚ ਸਟ੍ਰਾਬੇਰੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਦਿੱਲੀ ਇਸ ਦੀ ਮੁੱਖ ਮਾਰਕੀਟ ਹੈ
Posted by Tarunbeer Singh
Punjab
13-03-2020 05:22 PM
Punjab
03-13-2020 05:24 PM
Tarunbeer ji corona virus de chalde PAU de mele multavi kar dite gaye han.
Posted by Sandeep
Uttar Pradesh
13-03-2020 05:20 PM
Punjab
03-13-2020 05:24 PM
kripya aap iski cpompany ka nam bhi btaye taki aapko iske bare men poori jankari di ja sake,dhanywad
Posted by suresh kumar
Uttar Pradesh
13-03-2020 05:15 PM
Punjab
03-13-2020 05:25 PM
suresh ji khumb kayi prakar ki hoti hai jaise button mushroom, dhingri mushroom, shtaki mushroom, prali mushroom aur milky mushroom.inki bijai ka smay alag alag hota hai jaise button mushroom ka smay september se march. is smay aap is se do fasle le sakte hai.dhingri mushroom ki bijai ka smay october se march tak ka hota hai is smay aap 3 fasle le sakte hai.shtaaki mushroom ka smay october to february tak hota hai.prali mushroom men prali beej baans, seba ki jrurat hoti hai. Praali ke poole :- dhan ki prali ke 1-1 kilo ke poole dono siron par kaat kar brabar kiye jate hai. poolo ki kiyari lgana :- prali ke poolon ko saaf paani men 16-20 ghnto ke liye bhigo kar rakhe. geele poolon ko dhlan par rakh kar faaltu pani nikal de. kamre men ito aur baans ka ek platform bnaye. ek platform par 5 poo.... (Read More)
suresh ji khumb kayi prakar ki hoti hai jaise button mushroom, dhingri mushroom, shtaki mushroom, prali mushroom aur milky mushroom.inki bijai ka smay alag alag hota hai jaise button mushroom ka smay september se march. is smay aap is se do fasle le sakte hai.dhingri mushroom ki bijai ka smay october se march tak ka hota hai is smay aap 3 fasle le sakte hai.shtaaki mushroom ka smay october to february tak hota hai.prali mushroom men prali beej baans, seba ki jrurat hoti hai. Praali ke poole :- dhan ki prali ke 1-1 kilo ke poole dono siron par kaat kar brabar kiye jate hai. poolo ki kiyari lgana :- prali ke poolon ko saaf paani men 16-20 ghnto ke liye bhigo kar rakhe. geele poolon ko dhlan par rakh kar faaltu pani nikal de. kamre men ito aur baans ka ek platform bnaye. ek platform par 5 poolon ki ek teh lgaye jiske uper lagbhag 75 gram beej daale.iske uper vali teh bikul ult hogi. is trah 5-5 poolon ki 4 teh bna kar 300 gram beej daal kar ek kiyari bnaye.sabke ke uper 3 poole khol kar rakh diye jate hai.khumbo ka futna :- bijai ke 7-9 din tak khumb futna shuru kar deti hai.
Posted by Prince Rajput
Uttar Pradesh
13-03-2020 05:15 PM
Punjab
03-14-2020 11:34 AM
Prinnce ji UP men kheere ki kheti march mahine me ki jati hai.bijai ke liye ktaar men 1.5 mtr aur paudhe se paudhe 30-45cm ka faasla hona chahiye.beej ko 2-3cm gehrayi par beeje.ek acre men 800 gram -1200 gram beej ki jruarat [adti hai.dhanywad
Posted by ਜਤਿੰਦਰ ਸਿੰਘ
Punjab
13-03-2020 05:14 PM
Punjab
03-13-2020 09:26 PM
Tuci iss nu Ifer-H injection 5ml lgwao ate hafte badd dubara lgwao ate iss nu anthiomaline injection 10ml lgwao ate isde uppar topicure spray kro ate Actinovet homeopathic dwai dia 10-10 drops din vich 3 varr deni suru kro..
Posted by chinu
Punjab
13-03-2020 05:09 PM
Punjab
03-13-2020 07:54 PM
Hanji Chinu ji tuci isdi varto kr skde ho ehh tuci 50gm rojana de skde ho.
Posted by gill
Punjab
13-03-2020 05:09 PM
Punjab
06-08-2020 02:36 PM
ਗਿੱਲ ਜੀ ਤੁਸੀਂ Milk Producers Union Ltd. Verka Amritsar Dairy, Verka Chowk, Amritsar Ph. No. 73555-99892, 73555-48163 ਨਾਲ ਸੰਪਰਕ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ,ਧੰਨਵਾਦ
Posted by priyank tiwari
Madhya Pradesh
13-03-2020 05:08 PM
Punjab
03-13-2020 05:39 PM
प्रियंक जी लहसुन का भाव 7100-9300 रूपये प्रति क्विंटल के हिसाब से चल रहा है धन्यवाद
Posted by Pawandeep dhillon
Punjab
13-03-2020 04:51 PM
Punjab
03-17-2020 04:49 PM
पवनदीप जी यह गूलर फल है धन्यवाद
Posted by Billa kaler
Punjab
13-03-2020 04:45 PM
Punjab
03-13-2020 07:56 PM
Billa ji tuci Fish farming di training lain lai Sh.Rakesh Kumar, ADF S.CharanjIt Singh, CEO 01672-235079, 94174-77865, 94175-82117 nal sampark kr skde ho ate apne jille vich honn wali training vare pta kr skde ho.
Posted by sumit singla
Haryana
13-03-2020 04:41 PM
Punjab
03-13-2020 07:57 PM
आप मुर्रा भैंस का बच्चा लेने के लिए Saggu Dairy Farm 9034717330 Saggu Dairy Farm से संपर्क कर सकते है इनसे आपको अच्छी नस्ल का बच्चा मिल जाएगा
Posted by gurmeet Singh
Punjab
13-03-2020 04:28 PM
Punjab
03-14-2020 04:34 PM
डेयरी लोन के लिए आपके पास डेयरी ट्रैनिंग होनी जरूरी है डेयरी फार्मिंग के लिए लोन अलग अलग कामों के लिए मिलता है जैसे शेड के लिए पशुओं के लिए डेयरी मशीन के लिए लोन लेने के लिए आपके पास डेयरी ट्रेनिंग का सर्टिफिकेट होना जरुरी है लोन लेने संम्बन्धित अर्जी नजदीकी के dept director डेयरी को मिलकर दें इसके लोन पर 25% सब्सिडी à.... (Read More)
डेयरी लोन के लिए आपके पास डेयरी ट्रैनिंग होनी जरूरी है डेयरी फार्मिंग के लिए लोन अलग अलग कामों के लिए मिलता है जैसे शेड के लिए पशुओं के लिए डेयरी मशीन के लिए लोन लेने के लिए आपके पास डेयरी ट्रेनिंग का सर्टिफिकेट होना जरुरी है लोन लेने संम्बन्धित अर्जी नजदीकी के dept director डेयरी को मिलकर दें इसके लोन पर 25% सब्सिडी जनरल कैटागिरी के लिए है 33% अनुसूचित जातियों के लिए है बाकि ब्याज जो अलग अलग बैंक का होता है उस हिसाब से ही लगता है सबसे बढ़िया तरीका यही है आप अपने नजदीकी डेयरी डेवलपमेंट अफसर को मिलें वह आपको फाइल तैयार करने देंगे हर ज़िले में डायरेक्टर डेयरी (PDDB ) का दफ्तर बना है
Posted by Sanjai Kashyap
Uttar Pradesh
13-03-2020 04:24 PM
Punjab
03-14-2020 04:35 PM
Kashyap ji aap gir cow lene ke liye Sanju Bhalla 9873163741 Gir Cow Farm se sampark kr skte hai..
Posted by Neeraj kumar
Uttar Pradesh
13-03-2020 04:14 PM
Punjab
03-13-2020 04:27 PM
Neeraj ji abhi bhi do din barish rehne ki sambhavna hai jab barish khatm ho jaye tab aap iske uper propiconazole@200ml ko prati acre ke hisab se spray karen.dhanywad
Posted by bhawar lal gurjar
Rajasthan
13-03-2020 04:09 PM
Punjab
03-14-2020 04:38 PM
उसे आप रोजाना 35—40 किलो हरा चारा दें और हर तीन महीने के बाद पेट के कीड़ों के लिए गोली जरूर दें और उसे उसे आप 1 किलो गेहूं का दलिया, 250 ग्राम गुड को अच्छी तरह पकाकर 5—7 दिन खाने के लिए दें इसके साथ आप Calpond powder 50gm रोजाना और Glactogog पाउडर देना शुरू करें इसका रोजाना एक पाउच देना शुरू करें इससे दूध में फायदा होगा और यदि आप डेयरी फा.... (Read More)
उसे आप रोजाना 35—40 किलो हरा चारा दें और हर तीन महीने के बाद पेट के कीड़ों के लिए गोली जरूर दें और उसे उसे आप 1 किलो गेहूं का दलिया, 250 ग्राम गुड को अच्छी तरह पकाकर 5—7 दिन खाने के लिए दें इसके साथ आप Calpond powder 50gm रोजाना और Glactogog पाउडर देना शुरू करें इसका रोजाना एक पाउच देना शुरू करें इससे दूध में फायदा होगा और यदि आप डेयरी फार्म बड़े स्तर पर करना चाहते है तो आप पहले इस काम की ट्रेनिंग जरूर लें वहां से आपको इस काम की पूरी जानकारी मिलेगी फिर आप उस सटीर्फिकेट के हिसाब से लोन और ​सब्सिड़ी ले सकते है
Posted by narinder singh
Punjab
13-03-2020 04:07 PM
Punjab
03-14-2020 05:32 PM
ਨਰਿੰਦਰ ਜੀ ਤੁਸੀ ਬੱਕਰੀ ਪਾਲਣ ਦਾ ਕੰਮ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾ ਇਸਦੀ ਟ੍ਰੇਨਿੰਗ ਜਰੂਰ ਲਉ ਜਿਸ ਨਾਲ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਸ ਕੰਮ ਇਸ ਕੰਮ ਦੀ ਪੂਰੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਹੋਵੇਗੀ ਅਤੇ ਤੁਸੀ ਇਸ ਕੰਮ ਨੂੰ ਆਸਾਨੀ ਨਾਲ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਵਿਚ ਤੁਸੀ 2 ਬੱਕਰੇ ਅਤੇ 10 ਬੱਕਰੀਆਂ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰੋ ਅਤੇ ਤੁਸੀ ਬੀਟਲ, ਸਿਰੋਹੀ, ਬਰਬਰੀ ਨਸਲਾਂ ਨੂੰ ਰੱਖ ਸਕਦੇ ਹੋ ਅਤੇ ਟ੍ਰੇਨਿੰਗ ਲਈ ਤੁਸੀ KRISHI VIGYAN KENDRA GURU ANGAD DEV VETERINARY AND ANI.... (Read More)
ਨਰਿੰਦਰ ਜੀ ਤੁਸੀ ਬੱਕਰੀ ਪਾਲਣ ਦਾ ਕੰਮ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾ ਇਸਦੀ ਟ੍ਰੇਨਿੰਗ ਜਰੂਰ ਲਉ ਜਿਸ ਨਾਲ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਸ ਕੰਮ ਇਸ ਕੰਮ ਦੀ ਪੂਰੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਹੋਵੇਗੀ ਅਤੇ ਤੁਸੀ ਇਸ ਕੰਮ ਨੂੰ ਆਸਾਨੀ ਨਾਲ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਵਿਚ ਤੁਸੀ 2 ਬੱਕਰੇ ਅਤੇ 10 ਬੱਕਰੀਆਂ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰੋ ਅਤੇ ਤੁਸੀ ਬੀਟਲ, ਸਿਰੋਹੀ, ਬਰਬਰੀ ਨਸਲਾਂ ਨੂੰ ਰੱਖ ਸਕਦੇ ਹੋ ਅਤੇ ਟ੍ਰੇਨਿੰਗ ਲਈ ਤੁਸੀ KRISHI VIGYAN KENDRA GURU ANGAD DEV VETERINARY AND ANIMAL SCIENCES UNIVERSITY, Ludhiana VILLAGE- HANDIAYA, DISTRICT- BARNALA (PUNJAB) Contact:- +91 81960-80643 ਨਾਲ ਸੰਪਰਕ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ
Posted by karmjeet singh
Punjab
13-03-2020 04:05 PM
Punjab
03-14-2020 05:34 PM
Karmjeet ji tuci ludhiana vich goat farming di training lain lai KRISHI VIGYAN KENDRA LUDHIANA, Near Police Station, Ludhiana - Chandigarh Road , Samrala (District Ludhiana) , Pincode: 141114 Phone:- 01628-261597 nal sampark kr skde ho utho tuci goat farming di training vare ptta krr skde ho.
Posted by jaswinder singh
Punjab
13-03-2020 03:55 PM
Punjab
03-14-2020 05:40 PM
Jaswinder ji tuci beetal nasal dia bakria rakh skde ho iss nasal dia bakria dudh ate meat dona kama lai vdia rehndia hai, tuci bakri palan da kam suru krnn ton pehla iss kam di training apne nazdiki krishi vigyan kendra ton laa skde ho ate tuci bakria lain lai Birbal Ram Sharma 7009579091 nal sampark kr skde ho.
Posted by yogesh Kumar
Haryana
13-03-2020 03:42 PM
Punjab
03-13-2020 05:43 PM
Yogesh ji aap unko pene wale pani mai 1 chamch namak millker dena suru kren aur unn sabhi ko Ostovet calcium 30ml/100birds de hisab nal den aur B-complex liquid 20ml/100birds ke hisab se den, isse frak padd jayega.
Posted by durgesh kumar
Uttar Pradesh
13-03-2020 03:38 PM
Punjab
03-13-2020 04:36 PM
durgesh ji lobia ko mitti ki vibhin kismo mein ugaya ja sakta hai. aap kisme jaise Kashi Kanchan,Cowpea 88 ki bijai kar sakte hai.mitti ko bhurbua karne ke liye aap ek do bar jutayi karen. iski kheti march-madhya july tak ki jati hai.bijai ke liye pankti ka faasla 30cm aur paudhe se paudeh ka faasla 15 cm hona chahiye . beej ko 3-4 cm tak gehra beeje.iski bijai ke liye pora ya drill ka istemal karen.agar hare chare ke liye bijai karni hai to 20-22 kg beej prati acre aur agar beej ke liye 17 kg prati acre ke hisab se beej istemal karen.nadeeno ki roktham ke liye aap pendimethalin@1 litre ko bijai ke 24 ghnte pehle khet men chidkav karen.dhanywad
Posted by jaswinder singh
Punjab
13-03-2020 03:29 PM
Punjab
03-13-2020 04:50 PM
ਜਸਵਿੰਦਰ ਜੀ ਤੁਸੀ ਫਰਵਰੀ ਮਾਰਚ ਮਹੀਨੇ ਵਿਚ ਕੱਦੂ ਦੀ ਬਿਜਾਈ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ ਇਸਦੇ ਲਈ 2 ਕਿਲੋ ਬੀਜ ਪ੍ਰਤੀ ਏਕੜ ਦੇ ਹਿਸਾਬ ਨਾਲ ਵਰਤੋਂ 2.0 ਤੋਂ 2.5 ਮੀਟਰ ਚੌੜੀਆਂ ਕਿਆਰੀਆਂ ਬਣਾਓ ਅਤੇ 45-60 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ ਦੀ ਵਿੱਥ ਤੇ ਕਿਆਰੀ ਦੇ ਦੋਹੀਂ ਪਾਸੀਂ ਬੀਜ ਬੀਜੋ
Posted by jaswinder singh
Punjab
13-03-2020 03:23 PM
Punjab
03-14-2020 05:41 PM
ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਬਟੇਰ ਪਾਲਣ ਦਾ ਕੰੰਮ ਜਿੰਨੇ ਵੀ ਕਿਸਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ ਉਸ ਇਸ ਦਾ ਮੰਡੀਕਰਨ ਸਿਧੇ ਤੌਰ ਤੇ ਜਾ ਸ਼ੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਤੇ ਲਿਂਕ ਬਣਾ ਕੇ ਕਰਦੇ ਹਨ ਜੀ ਬਾਕੀ ਜੇਕਰ ਚੰਗੇ ਲਿੰਕ ਹਨ ਤਾਂ 35-40 ਦਿਨ ਦਾ ਬਟੇਰ 60-70 ਰੁਪਏ ਦਾ ਸੇਲ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਜਿਆਦਾਤਾਰ ਲੋਕ ਮੀਟ ਲਈ ਹੀ ਲੈ ਕੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ , ਇਸਦਾ ਅੰਡਾ 4-5 ਰੁਪਏ ਤੱਕ ਦਾ ਵਿਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ , ਬਾਕੀ ਮੰਡੀਕਰਨ ਲਈ ਵੱਡੇ ਹੋਟਲਾ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵੇਚ ਸਕਦੇ ਹੋ à.... (Read More)
ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਬਟੇਰ ਪਾਲਣ ਦਾ ਕੰੰਮ ਜਿੰਨੇ ਵੀ ਕਿਸਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ ਉਸ ਇਸ ਦਾ ਮੰਡੀਕਰਨ ਸਿਧੇ ਤੌਰ ਤੇ ਜਾ ਸ਼ੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਤੇ ਲਿਂਕ ਬਣਾ ਕੇ ਕਰਦੇ ਹਨ ਜੀ ਬਾਕੀ ਜੇਕਰ ਚੰਗੇ ਲਿੰਕ ਹਨ ਤਾਂ 35-40 ਦਿਨ ਦਾ ਬਟੇਰ 60-70 ਰੁਪਏ ਦਾ ਸੇਲ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਜਿਆਦਾਤਾਰ ਲੋਕ ਮੀਟ ਲਈ ਹੀ ਲੈ ਕੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ , ਇਸਦਾ ਅੰਡਾ 4-5 ਰੁਪਏ ਤੱਕ ਦਾ ਵਿਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ , ਬਾਕੀ ਮੰਡੀਕਰਨ ਲਈ ਵੱਡੇ ਹੋਟਲਾ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵੇਚ ਸਕਦੇ ਹੋ ਜੀ, ਤੁਸੀ ਇਸ ਕੰਮ ਦੀ ਟ੍ਰੇਨਿਗ ਅਤੇ ਬਟੇਰ ਲੈਣ ਲਈ Director Central Poultry Development Organization (Northern Region) Ministry of Agriculture & Farmers Welfare, Government of India Industrial Area, Phase-I, Chandigarh – 160 002 Tel.No: 0172-2655391 Tel.Fax: 0172-2655460 ਨਾਲ ਸੰਪਰਕ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ
Posted by MAHESH RAWATKER
Madhya Pradesh
13-03-2020 03:19 PM
Punjab
03-14-2020 05:45 PM
बकरी पालन बहुत ही लाभकारी काम है शुरूआत करने के लिए आप 10 बकरियों और 2 बकरे के साथ कर सकत हैं इन्हें खुराक कम चाहिए इसलिए इन्हें आसानी से पाल सकते हैं ये हर प्रकार के मौसम में पाली जा सकती हैं बकरियां 12-14 महीने में बच्चे देना शुरू कर देती है एक बकरी के लिए लगभग 12—15 वर्ग फीट जगह छती हुई और 25—30 वर्ग फीट जगह खुली चाहिए à¤.... (Read More)
बकरी पालन बहुत ही लाभकारी काम है शुरूआत करने के लिए आप 10 बकरियों और 2 बकरे के साथ कर सकत हैं इन्हें खुराक कम चाहिए इसलिए इन्हें आसानी से पाल सकते हैं ये हर प्रकार के मौसम में पाली जा सकती हैं बकरियां 12-14 महीने में बच्चे देना शुरू कर देती है एक बकरी के लिए लगभग 12—15 वर्ग फीट जगह छती हुई और 25—30 वर्ग फीट जगह खुली चाहिए बकरी का गर्भ समय 150 दिन का होता है और साल में 1-5 बच्चे देती है साल में दो बच्चे देना आम बात है बकरियां 8-10 वर्ष तक बच्चे देती हैं और अपन गिनती को तेजी से बढ़ा लेती हैं आप बारबरी, ब्लैक बंगाल, जैसी नसल पाल सकते हैं, लेकिन आप इस काम को करने से पहले अपने नज़दीकी कृषि विज्ञान केन्द्र से संपर्क कर सकते ​है..
Posted by gurmandeep singh
Punjab
13-03-2020 03:19 PM
Punjab
03-14-2020 05:54 PM
ਤੁਸੀ ਇਸਦੀ ਖੁਰਾਕ ਦਾ ਧਿਆਨ ਰੱਖੋ, ਰੋਜਾਨਾ 35-40 ਕਿਲੋ ਹਰਾ ਚਾਰਾ ਦਿਓ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਕਣਕ ਦਾ ਦਲੀਆ ਇਕ ਕਿਲੋ ਅਤੇ ਗੁੜ 250 ਗ੍ਰਾਮ ਮਿਕਸ ਕਰਕੇ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਰਿੰਨ ਕੇ ਫਿਰ ਉਸ ਵਿਚ 100 ਮਿਲੀ ਸਰੋਂ ਦਾ ਤੇਲ ਮਿਕਸ ਕਰਕੇ 5 -7 ਦਿਨ ਖਵਾਓ, ਤੁਸੀ ਉਸ ਨੂੰ Enerdyna liquid 100ml ਰੋਜਾਨਾ, Milkout powder 2-2 ਚਮਚ ਰੋਜਾਨਾ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰੋ, ਇਹਨਾਂ ਨਾਲ ਫਰਕ ਪੈ ਜਾਵੇਗਾ.
Posted by Bijender Singh
Uttar Pradesh
13-03-2020 03:16 PM

Punjab
03-13-2020 04:58 PM
बिजेंद्र जी किसानो के साथ जानकारी सांझी करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद
Posted by gurmandeep singh
Punjab
13-03-2020 03:16 PM
Punjab
03-14-2020 05:56 PM
tuci uss nu Utrevive liquid 100-100ml swere sham dena suru kro, iss nal frak paa jawega, baki usdi khurak da pura dian rkho..